गरीबी और असमानता दूर करने की सरकारी जिम्मेदारी से बचने के लिए लाई जा रही है यूपी में जनसंख्या नियंत्रण नीति

जनसंख्या नीति के बहाने उत्तर प्रदेश सरकार गरीबी और असमानता दूर करने की अपनी जिम्मेदारी से बच रही है। लोगों को अच्छी स्वास्थ्य-शिक्षा सुविधा उपलब्ध कराने की जिम्मेदारी से भी पल्ला झाड़ रही है और इन सबकी जिम्मेदारी आम लोगों पर ही डाल रही है।

फोटो : सोशल मीडिया
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ए जे प्रबल

उत्तर प्रदेश विधि आयोग के अध्यक्ष हाईकोर्ट के अवकाश प्राप्त जज न्यायमूर्ति ए एन मित्तल ने जो दलील दी है, उसके मुताबिक तो विकास के मामले में चीन की हालत सबसे खराब होनी चाहिए थी। कम-से-कम वह हमसे तो खराब ही स्थिति में होता। कारण, उसकी आबादी दुनिया में सबसे ज्यादा है और जाहिर है, हमसे अधिक तो है ही। जहां प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी खुद भारत की बड़ी आबादी को उसकी ताकत बताने से कभी नहीं थकते, वहीं, विधि आयोग और इसके अध्यक्ष हाईकोर्ट के अवकाश प्राप्त जज न्यायमूर्ति ए एन मित्तल को लगता है कि यूपी की बदहाली की वजह इसकी ज्यादा आबादी है।

हमारे सामने दो तरह के उदाहरण हैं। एक, ज्यादा आबादी वाले चीन का। अगर ए एन मित्तल की दलील सही होती तो चीन एक बच्चा नीति से पल्ला नहीं झाड़ लेता। चीन में पहले एक बच्चा नीति थी जिसे बाद में दो बच्चा नीति में बदला गया और अब तो वह तीन बच्चों को बढ़ावा दे रहा है। इसके अलावा, यूपी सरकार की जो दलील है, उसके मुताबिक तो नेपाल और भूटान जैसे देशों को आज की स्थिति से कहीं बेहतर होना चाहिए था। यूपी के प्रस्तावित जनसंख्या नियंत्रण कानून में ऐसे ही तमाम झोल हैं। न जाने क्यों विधि आयोग ने इस बात को नजरअंदाज कर दिया कि 1960 के दशक में लाए गए परिवार नियोजन लक्ष्य की वजह से कुल प्रजनन दर में कमी आई है।

यूपी सरकार जोर देकर कहती है कि विधि आयोग के अध्यक्ष करदाताओं का पैसा दो बच्चों से ज्यादा वालों पर जाया नहीं होने देंगे। इसके साथ ही यूपी सरकार के उस विज्ञापन पर भी गौर करना चाहिए जिसे न केवल यूपी के तमाम शहरों बल्कि देश की राजधानी दिल्ली में भी देखा जा सकता है। इसमें यूपी को देश का नंबर-1 राज्य बताया गया है और इस विज्ञापन में एक ओर मोदी तो दूसरी ओर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की तस्वीरें हैं। अगर वाकई यूपी नंबर-1 राज्य है तो भला हाईकोर्ट के अवकाश प्राप्त जज न्यायमूर्ति मित्तल इतने चिंतित क्यों हैं? और अगर वह करदाताओं के पैसे को लेकर इतने ही चिंतित हैं तो उनकी नजर और जगहों पर क्यों नहीं जाती? कायदे से तो न्यायमूर्ति मित्तल का ध्यान इस ओर जाना चाहिए था कि सरकार स्वास्थ्य और शिक्षा के मुकाबले विज्ञापन और प्रचार-प्रसार पर कितना खर्च करती है।

आयोग अध्यक्ष कहते हैं कि संसाधन सीमित हैं और लोगों को गर्भनिरोध के महत्व को समझना चाहिए। लेकिन यूपी सरकार की वेबसाइट पर अपलोड किए गए 18 पन्नों के मसौदे उत्तर प्रदेश जनसंख्या (नियंत्रण, स्थिरीकरण और कल्याण विधेयक, 2021) में ऐसी कोई जानकारी या डाटा नहीं है जो इस दलील को आधार देता हो। मसौदे में तो राज्य के मंत्रियों, विधायकों और सरकारी अधिकारियों के बच्चों की संख्या का भी विवरण नहीं है। ऐसा कोई प्रयास करके इस मसौदे को कुछ तो विश्वसनीय बनाया गया होता कि आखिर अभी यह सब करने की क्या जरूरत थी!


वैसे भी, राज्य विधि आयोग मसौदे से जुड़ी औपचारिकताओं की बस खानापूर्ति करता दिख रहा है। 11 जुलाई को इसका मसौदा सार्वजनिक किया जाता है और इस पर आपत्तियां या सुझाव भेजने की समय सीमा एक हफ्ता (18 जुलाई) तय कर दी जाती है। उत्तर प्रदेश विधानसभा में मसौदे को पेश करने की तारीख 19 जुलाई मुकर्रर की गई है। इसका सीधा मतलब है कि वे मानकर चल रहे हैं कि चाहे कुछ भी आपत्ति या सुझाव हो, उनका मसौदा अंतिम है वर्ना आपत्तियों को मंगाने के बाद उन पर सोच-विचार और उसके मुताबिक संशोधन के लिए हाथ में कुछ तो समय रखते!

अगले विधानसभा चुनाव से महज सात महीने पहले इतनी हड़बड़ी का मकसद तो सिर्फ और सिर्फ सियासी ही हो सकता है। जनता का ध्यान भटकाने का भाजपा का जाना-पहचाना ‘टूलकिट’ एक बार फिर सामने आ गया है। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि विशेषज्ञ इसे तमाम खामियों वाला मानते हों। यह भी मायने नहीं रखता कि यह विधेयक कानूनी चुनौतियों का सामना करे और अंततः इस पर रोक लग जाए। विधेयक लाने का सियासी मकसद तो हर हाल में पूरा हो जाएगा।

यह भी गौर करने की बात है कि अगर करदाताओं के पैसे की इतनी ही फिक्र थी तो आम आदमी और चुनाव लड़ने वाले नेताओं तक ही आकर क्यों ठहर गए? इसके दायरे में संपन्न वर्ग, पुलिस, आईएएस अधिकारियों, मंत्रियों और विधायकों को भी ले आते?

भारत की आधी आबादी 25 वर्ष से कम आयु की है और यह मानकर चलने के पीछे कोई रॉकेट साइंस नहीं है कि भारत में नवजात शिशुओं की संख्या में उछाल आने वाली है। जब इस आयु वर्ग के लोग शादी की उम्र में आएंगे, उनके विवाह होंगे और फिर उनके बच्चे होंगे तो संसाधन पर भी दबाव होगा। तब हालात वैसे ही होंगे जैसे 1951 से 2011 के बीच रहा जब भारत की आबादी 36 करोड़ से बढ़कर 120 करोड़ हो गई। हालांकि विवाह और प्रजनन पर महामारी का क्या असर पड़ सकता है, इस बारे में अब तक कोई अध्ययन नहीं किया गया है लेकिन महामारी के पहले का ही जो अनुमान था, उसके मुताबिक भारत की आबादी 2019 और 2050 के बीच 27.3 करोड़ और बढ़ जाएगी और 2050 वह वर्ष होगा जब जनसंख्या के स्थिर हो जाने की उम्मीद है।

1971 में भारत की कुल प्रजनन दर (टीएफआर) 5.2 थी जिसका मतलब था कि तब औसतन हर महिला पांच से अधिक बच्चों को जन्म दे रही थी। 2011 में टीएफआर घटकर 2.7 हो गई और 2015-16 में एनएफएचएस डाटा ने टीएफआर को 2.2 पर रखा। इसके अलावा, 2020 में केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट को दिए एक हलफनामे में दावा किया कि भारत टीएफआर को 2.1 के स्तर पर लाने ही वाला है। दरअसल, 2001 और 2011 के बीच इसकी दशकीय विकास दर पिछले 100 वर्षों में सबसे कम रही। पिछली शताब्दी में भारतीयों- हिंदू हों या मुसलमान, के बड़े परिवार हुआ करते थे। इस बात की तस्दीक हम अपने आसपास के अनुभवों से भी कर सकते हैं। जबकि पाठ्य पुस्तकों ने समझाया कि गरीबों को अतिरिक्त हाथ की जरूरत है और उच्च बाल मृत्युदर को देखते हुए उन्होंने बड़े परिवार का विकल्प चुना। यहां तक कि अपेक्षाकृत संपन्न तबकों में भी परिवार बड़े ही होते थे। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी छह भाई-बहनों में से एक हैं जबकि विभिन्न स्रोतों से उपलब्ध जानकारी के मुताबिक, यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ चार या पांच भाई-बहनों में एक। पूर्व प्रधानमंत्री नरसिंह राव के आठ बच्चे थे और राजद नेता तेजस्वी यादव नौ भाई-बहनों में एक हैं।


द टाइम्स ऑफ इंडिया की एक रिपोर्ट, यूपी विधानसभा के रिकॉर्ड के हवाले से बताती है कि वर्तमान भाजपा विधायकों में से 50% के तीन या इससे अधिक बच्चे हैं। ये सभी निर्विवाद रूप से हिंदू हैं। उनमें से एक भाजपा विधायक के आठ बच्चे हैं, आठ के छह-छह और 15 विधायकों के पांच-पांच। यदि प्रस्तावित कानून उन पर लागू हो जाए तो वे चुनाव लड़ने या किसी भी सरकारी सुविधा का फायदा नहीं उठा पाएंगे।

पूर्व मुख्यचुनाव आयुक्त एस वाई कुरैशी ने बताया है कि लक्षद्वीप, केरल और श्रीनगर के 100 फीसदी मुस्लिम बहुल क्षेत्रों में तो प्रजनन दर 1.4 प्रतिशत ही है जबकि उत्तर प्रदेश में प्रजनन दर 2.4 प्रतिशत से अधिक है और यह इस मिथक को खारिज करता है कि जनसंख्या वृद्धि में मजहब की कहीं कोई भूमिका होती है।

मसौदा विधेयक सरकारी कर्मचारियों के लिए दो बच्चा नीति की बाध्यता नहीं करता। इतना तो किया ही जा सकता था कि दो से अधिक बच्चों वाले आईएएस अधिकारियों, पुलिस कर्मियों और अन्य सरकारी कर्मचारियों से यह लिखवा लेते कि वे आगे और बच्चे पैदा नहीं करेंगे।

मजेदार बात यह है कि एक ओर तो केंद्र सरकार रटंत तोते की तरह कहती है कि ‘अंतर्राष्ट्रीय अनुभव’ हमें बताते हैं कि बच्चों की एक निश्चित संख्या के लिए किसी भी प्रकार की जोर-जबरदस्ती प्रतिकूल नतीजे देने वाली होती है और यह ‘जनसांख्यिकीय विकृतियों’ की ओर ले जाती है, लेकिन भाजपा के सांसद भी ऐसे ही उपक्रम में जुटे हैं। यहां तक कि गोरखपुर से भाजपा सांसद रवि किशन जिनके चार बच्चे हैं, दो बच्चों के मानदंड को वैध बनाने के लिए निजी सदस्य विधेयक पेश करने को तैयार हैं। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि पिछले 50 वर्षों में संसद ने किसी भी निजी सदस्य विधेयक को पारित न किया हो। लेकिन इससे पार्टी और नेताओं का मकसद तो पूरा हो ही जाएगा। कुल मिलाकर, सरकार गरीबी और असमानता दूर करने की अपनी जिम्मेदारी से बच रही है। लोगों को अच्छी स्वास्थ्य-शिक्षा सुविधा उपलब्ध कराने की जिम्मेदारी से भी पल्ला झाड़ रही है और इन सबकी जिम्मेदारी आम लोगों पर ही डाल रही है।

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