‘पालतू’ पुलिस के बूते सरकारी कहर ढाने का उदाहरण है उत्तर प्रदेश

हमें रोम की उस कहावत को याद रखना चाहिए कि भय इस बात से पैदा नहीं होता कि सजा कितनी सख्त है, बल्कि इससे पैदा होता है कि सजा का मिलना कितना निश्चित है। इसलिए पुलिस सुधार जितना ही जरूरी है न्याय दिलाने की प्रक्रिया में सुधार करना।

फोटोः सोशल मीडिया
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विभूति नारायण राय

यह वो दौर था जिसके लिए कहावत थी कि अंग्रेजी हुकूमत में सूरज नहीं डूबता। ऐसा यूं ही नहीं कहा जाता था। पृथ्वी के पांचों महादेशों के बहुत बड़े भूभाग पर अंग्रेजों का शासन था और उन्होंने अपने अधीन लोगों पर शासन के लिए प्रशासन की तमाम आधुनिक संस्थाओं की बुनियाद रखी। इनमें एक थी पुलिस।

इस पर गौर करना दिलचस्प है कि उन्होंने अलग-अलग लोगों के लिए अलग-अलग पुलिस बनाई। इस अंतर का कारण सांस्कृतिक धारणाएं थीं और इसके परिणामस्वरूप विभिन्न संस्कृतियों के लोगों को अलग-अलग पुलिस मिली। भारत को भी उसके सांस्कृतिक हालात के अनुरूप ही पुलिस मिली। इसी वजह से भारतीय पुलिस को जनता के सच्चे दोस्त के तौर पर जाने जाने वाले लंदन के लोकप्रिय पुलिस कांस्टेबल बॉबी के नक्शेकदम पर चलने का कभी ख्याल नहीं आया।

हमारी रोजमर्रा की जिंदगी आमतौर पर जाति व्यवस्था से निर्धारित होती है जो समाज को अव्वल दर्जे का अलोकतांत्रिक बनाती है और इस कारण आबादी की काफी बड़ी संख्या जानवरों से भी बुरा जीवन जीने को अभिशप्त है। बहरहाल, इसमें संदेह नहीं कि हमने ऐसी पुलिस पाई है जिसमें कानूनी नजरिये से सबको समान समझने जैसे मूल्यों के प्रति जरा भी संवेदनशीलता नहीं है। हमारी पुलिस व्यवस्था 1860-61 में बने कानून पर आधारित है और इसका मुख्य उद्देश्य भारत में अंग्रेजी राज को मजबूत करना और इसे लंबा खींचना था।

इस कोण से देखें तो भारत की पुलिस ने अपने मालिकों के हितों को पूरा किया और उन्हें अगले नौ दशकों तक यहां टिके रहने में मददगार रही। लेकिन इस क्रम में संगठन जनविरोधी हो गया और क्रूरता, भ्रष्टाचार और षड्यंत्रकारी मिलीभगत इसके मनोविज्ञान में गहरे तक घर कर गए। एक बड़ा सवाल उठता है कि, फिर आजादी के बाद भी पुलिस व्यवस्था में बुनियादी बदलाव की कोशिश क्यों नहीं की गई, जबकि तब के नेताओं ने स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान पुलिसिया जोर-जबरदस्ती का व्यक्तिगत तौर पर अनुभव भी किया था।

एक मुख्यमंत्री वैसे थानेदार को पसंद करता है जो उसे खुश करने के लिए उसके विरोधियों की पसलियां तोड़ सके और समर्थकों की बड़ी से बड़ी गलतियों की ओर से आंखें मूंद ले। वह ऐसे पुलिस अधिकारी को पसंद करता है जो अपनी अंतरात्मा की परवाह किए बिना उसके तमाम गैरकानूनी आदेशों पर अमल करता हो। 1970 के दशक में चुनावों में बड़े पैमाने पर हुई गड़बड़ियों में पुलिस शामिल रही थी। इसलिए इस बात में आश्चर्य नहीं होना चाहिए कि हमारे शासकों ने कभी पुलिस को जनता के प्रति दोस्ताना, प्रोफेशनल और यहां तक कि कानून से डरने वाली संस्था बनाने में गंभीर दिलचस्पी नहीं दिखाई। फिर, आम लोगों ने अपने जीवन को सबसे ज्यादा प्रभावित करने वाली पुलिस व्यवस्था में सुधार के लिए आंदोलन क्यों नहीं किया? काबिले गौर है कि किसी भी चुनाव में पुलिस सुधार को प्रमुख मुद्दों में शुमार भी नहीं किया गया।

कैसे पालतू पुलिस और अपने संदिग्ध एजेंडे वाली कोई सरकार जनता पर कहर ढा सकती है, इसे समझने के लिए उत्तर प्रदेश की मौजूदा सरकार एक अच्छा उदाहरण हो सकती है। पिछले ढाई साल में एक आम पुलिस वाले के मन में यह बात बैठ गई है कि अपराध को नियंत्रित करने का सबसे अच्छा तरीका कानून को तोड़ना और संविधान तथा देश के कानूनों को हाशिए पर डाल देना है। आए दिन आप इस तरह की खबरें पढ़ते हैं कि पुलिस ने मजिस्ट्रेट के सामने पेश करने से पहले किसी को पैरों में गोली मार दी। ऐसे तमाम ‘अपराधी’ होते हैं जो उतने भाग्यशाली नहीं होते। वे कभी अदालत में पेश नहीं हो पाते और ‘एनकाउंटर’ में मार दिए जाते हैं।

यूपी में बड़ी संख्या में असहाय पशु व्यापारियों की लिंचिंग हो गई और पालतू पुलिस वाली बेफिक्र सरकार ने अपने ही नागरिकों की जिंदगी हराम कर दी। हाल ही में जब संशोधित नागरिकता कानून और प्रस्तावित एनआरसी के खिलाफ यूपी में लोग प्रदर्शन कर रहे थे तो सांप्रदायिक भावना के साथ उनके खिलाफ बड़ी तादाद में पुलिस बल का इस्तेमाल किया गया।

यूपी पुलिस और इसकी शाखा पीएसी पर अक्सर राज्य के सबसे बड़े अल्पसंख्यक समुदाय मुसलमानों के प्रति सांप्रदायिकता से प्रेरित होकर पेश आने के आरोप लगते रहते हैं। यूपी पुलिस के व्यवहार पर गंभीर विचार-विमर्श की जरूरत है और इसमें पुलिस में नियुक्ति, प्रशिक्षण, कार्मिक प्रबंधन और समाज से इसके संबंधों जैसे विषयों को शामिल करना चाहिए। इस तरह की प्रक्रिया को देश के अन्य पुलिस संगठनों के संदर्भ में भी अपनाया जाना चाहिए।

इस विमर्श से जुड़ी एक बड़ी समस्या भारतीय समाज में पुलिसिया हिंसा के प्रति स्वीकार्यता के स्तर की है। जघन्य हत्या और बलात्कार के चार आरोपियों को तेलंगाना पुलिस द्वारा ठंडे दिमाग से मार दिए जाने को आमतौर पर लोगों ने सराहा था। प्रत्यक्ष तौर पर यह इस दुखद सच्चाई का उदाहरण है कि अक्सर पुलिस के गैरकानूनी कामों को समाज का खुला समर्थन भी हासिल होता है। कुछ दशक पहले भागलपुर के चर्चित अंखफोड़वा कांड को याद करना चाहिए, जब पूरा शहर पुलिस के पक्ष में खड़ा हो गया था। तब सही या गलत, लोगों के मन में यह बात बैठ गई थी कि न्याय-व्यवस्था बलात्कारी दरिंदों, हत्यारों और लुटेरों को सजा देने में अक्षम है, लिहाजा पुलिस ने जो किया सही किया।

न्याय के लिए हिंसा को साधन बनाए जाने के प्रति स्वीकार्यता धर्मनिरपेक्ष लोकतंत्र के स्वस्थ विकास के लिए हानिकारक है। हाल के समय में हम गोरक्षकों द्वारा सामूहिक हिंसा के सर्वाधिक बुरे मामलों के साक्षी बने हैं। उसी तरह, हम हाल के समय में पुलिस द्वारा ‘अपराधियों’ को गोली मारकर न्याय करने के बढ़ते मामलों को भी देख रहे हैं। खास तौर पर यूपी में ऐसे तमाम मामले सामने आए। सबसे बुरी बात यह है कि ज्यादातर मामलों के प्रति लोगों में आम तौर पर उदासीनता और कुछ मामलों में तो स्वीकार्यता भी रही।

ऐसा तब होता है जब लोगों का भरोसा सामान्य न्यायिक व्यवस्था से उठ जाता है और वे न्याय के लिए पुलिस की ओर देखना शुरू कर देते हैं। हमें रोम की उस कहावत को याद रखना चाहिए कि भय इस बात से पैदा नहीं होता कि सजा कितनी सख्त है, बल्कि इससे पैदा होता है कि सजा का मिलना कितना निश्चित है। इसलिए पुलिस सुधार जितना ही जरूरी है न्याय दिलाने की प्रक्रिया में सुधार करना। हाल-फिलहाल भारतीय पुलिस में क्रूरता, सांप्रदायिक पक्षपात, कानूनी प्रक्रिया की परवाह नहीं करने के जैसे लक्षण दिखे हैं, वे 1860 के दशक में बने इस संगठन में व्यापक सुधार की जरूरत को रेखांकित करते हैं।

(लेखक पूर्व आईपीएस अधिकारी और वरिष्ठ लेखक हैं)

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