चुनाव में जीत भले ही मोदी-बीजेपी की हुई, लेकिन साबित हो गया- बहुसंख्यक आबादी अब भी भारतीय ‘नाजियों’ के खिलाफ

तमाम उम्मीदवारों समेत सैकड़ों एनजीओ चुनाव आयोग और न्यायपालिका की भूमिका पर सवाल उठा रहे हैं। लेकिन चारों ओर अजीब सन्नाटा है। हालांकि बहुसंख्यक आबादी अब भी उन्माद से प्रभावित नहीं है। यहां हमें नेहरू द्वारा 70 साल पहले जाहिर आशंकाओं को जरूर याद रखना चाहिए।

फोटोः सोशल मीडिया
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कुमार केतकर

ठीक चार सप्ताह पहले 23 मई को भारतीय राजनीति और समाज ने नई राह पकड़कर अनिश्चतता भरी नई दुनिया का रुख कर लिया। ऐसा नहीं है कि ऐसी "प्रति-क्रांति" के बीज मौजूद नहीं थे। प्रतिगामी प्रवृत्तियां पहले भी थीं लेकिन ज्यादातर मामलों में उनकी लगाम खींचकर रखी जाती थी और कई मौकों पर उन्हें हराने में भी कामयाबी मिल जाती थी। आंतरिक सामाजिक आयामों के परिप्रेक्ष्य में 2014 का चुनाव देखने के बाद अब हम 2019 के चुनाव के साक्षी बने।

यह हैरान करने वाली बात है कि अवनति का सबसे बुरा स्वरूप अनिवासी भारतीयों (एनआरआई) के बीच सबसे आम रहा, जो यकीनन अधिकतर भारतीयों की तुलना में कहीं अधिक शिक्षित हैं, आर्थिक रूप से कहीं अच्छी स्थिति में हैं, आधुनिक-महानगरीय समाज में रहते हैं और इंजीनियर, टेक्नोक्रेट और शोधकर्ताओं के तौर पर काम करते हैं।

फिर भी 1990 की रथ यात्रा और 1992 में बाबरी मस्जिद के ध्वंस के बाद एनआरआई की बड़ी जमात की सोच प्रतिगामी हो गई है। उनकी नजर तो भविष्य की ओर है, लेकिन वे मध्यकालीन युग में वापस लौट रहे हैं। आज बेशक लालकृष्ण आडवाणी दया के पात्र और एकाकी दिखते हों, लेकिन यह वही थे जिन्होंने जिन्न को बोतल से बाहर निकाला। जो आडवाणी ने शुरू किया, नरेंद्र मोदी और अमित शाह ने उसी को आगे बढ़ाया। लेकिन यह विचारधारा और इसका सांगठनिक स्वरूप तो 95 साल पहले 1925 में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना के साथ ही अस्तित्व में आ गया था।

भारत की आजादी के बाद अपने ऐतिहासिक संबोधन के बमुश्किल चार महीने बाद 7 दिसंबर, 1947 को पंडित जवाहरलाल नेहरू ने मुख्यमंत्रियों को लिखे पत्र में कहा था, “हमारे पास इस बात के पुख्ता सबूत हैं कि आरएसएस एक ऐसा संगठन है जो विशुद्ध नाजी विचारधारा पर चल रहा है और उसके हथकंडों पर अमल कर रहा है...। जर्मनी के युवा नाजी पार्टी के नकारात्मक प्रचार के झांसे में आ गए क्योंकि इसमें ज्यादा दिमाग लड़ाने की जरूरत नहीं थी... नाजी पार्टी ने जर्मनी को बर्बाद कर दिया और मुझे इस बात में जरा भी संदेह नहीं कि अगर इन प्रवृत्तियों को भारत में फलने-फूलने दिया गया तो ये देश को जबर्दस्त नुकसान पहुंचाएंगी... निःसंदेह भारत फिर भी बचा रहेगा। लेकिन राष्ट्र बुरी तरह घायल हो जाएगा और इसे उबरने में लंबा समय लगेगा।”

नेहरू कहा करते थे कि उनकी सबसे बड़ी चुनौती वैसे लोगों में धर्मनिरपेक्षता लाने की है जो अत्यधिक धार्मिक हैं। वह धर्म के खिलाफ नहीं थे, लेकिन वह धर्म को राजनीति में लाने के सख्त खिलाफ थे। वह जानते थे कि राजनीतिक एजेंडे के तौर पर धार्मिक आस्था देश का ध्रुवीकरण कर देगी। उन्होंने बंटवारे के समय का विध्वंस देखा था। ऐसा विभाजन सबसे पहले दिमाग और समाज को बांटता है, फिर देश को, जैसा उन्होंने दुनिया भर में होते देखा था।

उनकी सोच इतिहासकार की थी, दृष्टि सार्वभौमिक और मिजाज वैज्ञानिक। वह नहीं चाहते थे कि देश का और बंटवारा हो, हालांकि उन्हें इसकी आशंका थी, जैसा उन्होंने मुख्यमंत्रियों को भेजे पत्र में लिखा था। यह बताता है कि हिंदू-मुसलिम मतभिन्नता को लेकर उनके मन में गहरी आशंकाएं थीं और उन्हें अंदाजा था कि इसका अंजाम क्या हो सकता है। उनका मानना था कि भारत विभिन्न धर्मों, विभिन्न मतों, विभिन्न संस्कृतियों और विभिन्न भाषाओं वाला देश है जिसकी विविधता अद्भुत है और तकदीर ने इसे सहेजकर रखने की जिम्मेदारी हमें दी है।

ब्रिटिश शासन से स्वतंत्रता हासिल करने के लिए भारत के लोगों के गौरवशाली और प्रगतिशील आंदोलन को बेमानी बनाया जा रहा है। स्वतंत्रता आंदोलन एक ‘साम्राज्यवाद-विरोधी’ संघर्ष ही नहीं था, बल्कि एक ऐसा भारत बनाने का प्रयास था जो हिंसा और भेदभाव पर आधारित न होकर समानता, भाईचारे, करुणा और प्रेम पर आधारित समाज हो।

2014 और 2019 के चुनाव परिणाम इसके परिचायक हैं कि एक समाज के तौर पर हम कितने गिर गए हैं। हालांकि, इसके बाद भी कई ऐसी बातें हैं जिन्हें नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। बीजेपी का वोट प्रतिशत तरकीबन 38 फीसदी रहा और एनडीए का 45 फीसदी। अगर ये मान भी लें कि एनडीए के 45 फीसदी वोट उन्हीं ध्रुवीकृत ताकतों के हैं, तो भी 55 फीसदी वोटर तो वैसे हैं ही जो मोदी-शाह की जोड़ी और उनके संघी प्रचारकों द्वारा फैलाए गए उन्माद से प्रभावित नहीं हैं।

इसका सीधा सा मतलब है कि बहुसंख्यक अब भी पवित्र हैं। 23 मई के अप्रत्याशित नतीजे के बाद जिस तरह एक अजीब सा सन्नाटा छाया था, न कहीं पटाखे फूटे न लोगों ने धूम-धड़ाके से जश्न मनाया, न कहीं विजय जुलूस निकलने के कारण जाम लगा, यह प्रमाण है, उस 55 फीसदी वोटर के सोचने-समझने के तरीके का। ऐसा ही कुछ 16 मई, 2014 को भी हुआ था।

सच्चाई तो यह है कि किसी भी बड़ी जीत पर स्वतः स्फूर्त तरीके से जश्न का माहौल बन जाता है। लेकिन हैरत की बात है कि इस बार चुनाव परिणाम के दिन बीजेपी दफ्तरों और शिवसेना की शाखाओं में भी वैसा कुछ नहीं दिखा, यहां तक कि बाद के दिनों में भी नहीं। जबकि इस बात को सभी भली भांति जानते हैं कि शिवसैनिकों को तो बस बहाना चाहिए होता है किसी उन्मादी जश्न का। बात निगम और जिला परिषद के चुनाव में जीत की हो या फिर आईपीएल में मुंबई इंडियन की जीत का, वे ऐसे जश्न मनाने का मौका खोज लेते रहे हैं। लेकिन एनडीए की अभूतपूर्व जीत के बाद भी उनकी प्रतिक्रिया बड़ी ठंडी रही।

नतीजे आने से पहले किसी को भी इकतरफा परिणाम की उम्मीद नहीं थी। सभी को लग रहा था कि गठबंधन की सरकार बनेगी- चाहे नेतृत्व बीजेपी के हाथ रहे या कांग्रेस के। और तो और, संघ विचारक राम माधव तक नतीजों के पहले कह रहे थे कि बीजेपी अन्य दलों को साथ लेकर सरकार बनाएगी। उन्होंने अनुमान जताया था कि बीजेपी जादुई आंकड़े से पीछे रह सकती है। फिर भी नतीजे चौंकाने वाले साबित हुए।

अमित शाह और पीयूष गोयल जिस तरह के नतीजे की बात कर रहे थे, वे सही तो साबित हुए, लेकिन परिणाम आने से पहले किसी को उनकी बातों पर यकीन नहीं हो रहा था। मतगणना से हफ्तों पहले उनका यह अटल विश्वास वाकई रहस्यमय है। यह रहस्य और भी गहरा जाता है क्योंकि चुनाव आयोग ने अब भी हर लोकसभा क्षेत्र से जुड़ा अंतिम आंकड़ा जारी नहीं किया है। डाले गए वोट और गिने गए वोट के मामले में करीब 370 लोकसभा क्षेत्रों के आंकड़ों में बड़ा अंतर है।

तमाम उम्मीदवारों समेत सैकड़ों एनजीओ चुनाव आयोग और न्यायपालिका की भूमिका पर सवाल उठा रहे हैं। लेकिन चारों ओर अजीब सा सन्नाटा है। इस मुकाम पर हमें जवाहरलाल नेहरू द्वारा 70 साल पहले जाहिर की गई आशंकाओं को जरूर याद रखना चाहिए। हालांकि, हमें जीतना है और हम जीतेंगे। बहुसंख्यक अब भी हमारे साथ है।

(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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