इंदौर में पानी से मौतेंः खतरे का घंटा बज रहा, पर कोई सुने तब तो
इंदौर में पानी सप्लाई तंत्र विकसित करने पर 2015 और 2021 के बीच 650 करोड़ रुपये खर्च किए गए। पेयजल आपूर्ति के लिए प्रधानमंत्री के ड्रीम प्रोजेक्ट अमृत के तहत यहां 1,073 करोड़ का ठेका दिया गया। स्मार्ट शहर योजना का खर्च अलग है। ये सब गए कहां?

मध्य प्रदेश की बीजेपी सरकार ने अपने को विशिष्ट साबित करने के खयाल से अलग किस्म का एक और काम किया है। इंदौर शहर को बीते सात साल से देश के सबसे साफ सुथरे शहर का सम्मान मिला हुआ है। वहां 18 से अधिक लोगों की मौत इसलिए हो गई क्योंकि सीवर लाइन और पाइप लाइन के जुड़ जाने की वजह से हो रहे लीकेज की चार महीने से अधिक समय से मिल रही शिकायतों पर कान देना किसी ने जरूरी नहीं समझा। हां, अब इंदौर को महामारी प्रभावित घोषित कर दिया गया है। मुख्य चिकित्सा और स्वास्थ्य अधिकारी (सीएमएचओ) डॉ. मधव हसनानी ने कहा कि 'जब किसी विशेष इलाके में सामान्य से अधिक मामले होते हैं, तब महामारी घोषित की जाती है। हम इस फैलाव को इसी पैमाने पर देख रहे हैं।'
इंदौर में एक औद्योगिक क्षेत्र से सटी भागीरथपुरा घनी बस्ती है। वहां लोग चार महीनों से शिकायत कर रहे थे कि उनके नलों से बदबूदार पानी आ रहा है। लगभग इतने ही समय से जल आपूर्ति पाइप बदलने के ठेके की फाईल नगर निगम में एक ही टेबल पर रखी रही। जब इस कारण लोगों की मौत होने लगी, तब अधिकारियों की नींद खुली। बीती 3 जनवरी से 7 जनवरी के बीच लगभग 40,000 लोगों की जांच की गई, जिनमें लगभग 2,456 लोगों में संक्रमण के लक्षण मिले। 162 से अधिक लोगों को अस्पतालों भर्ती किया गया जिनमें से लगभग 26 लोग आईसीयू में गंभीर हैं।
यह उस शहर का हाल है जिसके सांसद, सभी आठ विधायक, निगम महापौर बीजेपी के हैं। राज्य सरकार अैर केन्द्र सरकार तो बीजेपी की है ही। इंदौर के प्रभारी मंत्री खुद मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव हैं। राज्य के शहरी विकास मंत्री कैलाश विजयवर्गीय इसी शहर की एक सीट से चुने जाते रहे हैं।
इन सबके बावजूद साधना और सुनील साहू के उस नवजात बेटे समेत तमाम लोगों को नहीं बचाया जा सका जिनकी तड़प-तड़पकर मौत हो गई। साधना और सुनील को शादी के 10 साल बाद कई मन्नतों के बाद बेटा नसीब हुआ था। गर्भावस्था के दौरान मां को पूरे 9 महीने बेड रेस्ट करना पड़ा था। बच्चे को दिए जाने वाले दूध में मां ने नगर निगम के नल का पानी इसलिए मिलाया था कि वह इसे सुविधा से पचा ले। लेकिन इससे बच्चे को उल्टी और दस्त की गंभीर शिकायत हुई और उसने 29 दिसंबर 2025 को इलाज के दौरान दम तोड़ दिया।
यह बात इंदौर के महापौर पुष्यमित्र भार्गव सार्वजनिक रूप से कहते रहे हैं कि इंदौर के लोग पानी नहीं, घी पीते हैं क्योंकि यहां जल आपूर्ति बहुत महंगी है। इंदौर का मुख्य जल स्रोत नर्मदा नदी है जो शहर से लगभग 80 किलोमीटर दूर और समुद्र तल से बहुत नीचे बहती है। नर्मदा के पानी को खरगोन में जलूद पंपिंग स्टेशन से इंदौर लाने के लिए लगभग 500 से 600 मीटर (करीब 1,800 फीट) की ऊंचाई तक लिफ्ट करना पड़ता है।
इंदौर नगर निगम को इस पानी को पंप करने के लिए हर महीने लगभग 25 से 30 करोड़ रुपये केवल बिजली बिल के रूप में चुकाने पड़ते हैं। इंदौर में 1,000 लीटर (1 किलोलीटर) पानी पहुंचाने की लागत लगभग 21 से 25 रुपये के बीच है, जबकि इसी काम के लिए दूसरे शहरों में किया जाने वाला खर्च अधिकतम पांच या छह रुपये होता है। इंदौर नगर निगम पानी की आपूर्ति पर सालाना लगभग 350 करोड़ रुपये से अधिक खर्च करता है। उसमें से भी लगभग 35 से 40 प्रतिशत पानी या तो बह जाता है या इसकी चोरी हो जाती है जिसे सरकारी भाषा में 'अनअकाउंटेड फॉर वॉटर' (यूएफडब्लू ) हो जाता है। जाहिर है, यह राजस्व की बर्बादी है।
भागीरथपुरा निम्न मध्य वर्ग की रिहाइश है। पास में ही औद्योगिक क्षेत्र है, सो यहां की बड़ी आबादी मजदूरी के लिए दशकों पहले बाहर से आई और फिर वह यहीं बस गई। प्राथमिक जांच में पाया गया है कि इलाके में पेयजल की मुख्य पाइपलाइन एक सार्वजनिक शौचालय के ठीक नीचे से गुजर रही थी। दशकों पुरानी इस पाइपलाइन में हुए लीकेज ने सीवर के पानी को सोख लिया। जब नलों से पानी की सप्लाई शुरू हुई, तो वह पानी नहीं बल्कि टायफॉइड, गैस्ट्रोएंटेराइटिस वगैरह पानी से होने वाली बीमारियोंं का स्रोत था। दरअसल, इन गलियों में कभी टेलीफोन वालों ने, तो कभी सीवर वालों ने खुदाई की और इस दौरान टूटे जल आपूर्ति पाईप को लापरवाही से जोड़ा।
अभी पांच दशक पहले तक इंदौर में दो नदियां थीं। यहां पचास से अधिक तालाब और कोई 650 कुएं-बावड़ी भी थे। नगरीकरण सभी को हजम करता गया और पीने के पानी के लिए नर्मदा पर निर्भरता टिक गई। कैसी विडंबना है कि जिस जिले में शहर से कुछ ही दूरी पर साढ़े सात नदियों का संगम हो, वह भारी-भरकम खर्च करने के बाद भी मांग से कोई 130 एमएलडी कम पानी ही आपूर्ति कर पा रहा है। जानापाव पहाड़ी से निकलने वाली चंबल, गंभीर, अंगरेड़, सुमरिया, बिरम, चोरल, कारम, नेकेड़ेश्वरी नदियों में से कुछ यमुना में और कुछ नर्मदा में मिलती हैं। फिर भी जर्जर पाइप से महंगा पानी भेजना मजबूरी नहीं, बड़ी साजिश लगती है।
इंदौर में नए पंपिंग स्टेशन लगाने, पुराने पाइपलाइनों को बदलने और पानी की आपूर्ति का नेटवर्क बढ़ाने पर 2015 और 2021 के बीच 650 करोड़ रुपये खर्च किए गए। मध्य प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के क्षेत्रीय कार्यालय ने 2016-17 और 2017-18 में शहर के 60 स्थानों से पीने के पानी के सैंपल लेकर जांच के लिए लैब भेजे थे। इसकी रिपोर्ट 2019 में आई। 60 में से 59 सैंपल फेल निकले थे। जिन 59 स्थानों पर पानी पीने योग्य नहीं मिला था, उनमें भागीरथपुरा गली नंबर 1 और 2 भी थी। बोर्ड ने 2022 तक नगर निगम को तीन बार पत्र लिखकर चेताया कि इन स्थानों पर पीने का पानी उपचार करने के बाद ही उपयोग किया जाए। जब निगम ने कोई कार्रवाई नहीं की, तो बोर्ड के क्षेत्रीय कार्यालय ने सेंट्रल ग्राउंड वॉटर बोर्ड, भोपाल को भी पत्र लिखकर इसकी जानकारी दी थी।
एक और बात। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का ड्रीम प्रोजेक्ट है- प्रधानमंत्री अमृत योजना इसका पूरा नाम अटल नवीनीकरण और शहरी परिवर्तन मिशन है। इसे प्रधानमंत्री ने जून 2015 में लॉन्च किया था। इसका उद्देश्य देश के सभी शहरों में पानी की जलापूर्ति और सीवेज कनेक्शन प्रदान करना है। अभी अगस्त 2025 में 'अमृत-2' के अंतर्गत इंदौर नगर निगम ने 1,073 करोड़ का ठेका एसपीएमएल इन्फ्रा लिमिटेड को पाइप लाइन बिछाने और नया वाटर ट्रीटमेंट प्लांट बनाने के लिए दिया है। इनके बावजूद इस तरह मौतें हो रही हैं।
इंदौर में स्मार्ट सिटी के नाम पर भी कई करोड़ खर्च हो चुके हैं। क्या वे पैसे भी नालियों में ही बह चुके हैं? इस घटना के बाद कुछ सीनियर अफसरों का तबादला कर दिया गया जबकि कुछ जूनियर अफसरों को निलंबित, तो जांच के लिए समिति बना दी गई है। लेकिन अब तक इस बात का उत्तर कोई देने को तैयार नहीं है कि पेयजल पाइप लाइन और सीवेज लाइन को सुरक्षित दूरी पर न बिछाए जाने का उत्तरदायी कौन है?
यह भी विडंबना ही है कि जिस भागीरथपुरा में इतनी बड़ी त्रासदी हुई है, उसके पार्षद कमल बघेला को इलाके में सड़कों और ड्रेनेज की बेहतर व्यवस्था करने के लिए महापौर भार्गव ने सर्वोत्तम पार्षद का पुरस्कार दिया था। भागीरथपुरा में मौतों के सिलसिले के बीच मौके से लौटकर जब एक टीवी चैनल पत्रकार अनुराग द्वारी ने शहरी विकास मंत्री कैलाश विजयवर्गीय से सवाल पूछे, तो उन्होंने कैमरे के सामने ही कहा कि वह तथ्यों के बारे में 'घंटा' जानते हैं। बाद में, कैलाश को ट्वीट कर इसके लिए माफी मांगनी पड़ी।
यह जरूर है कि कुछ अन्य कथित न्यूज वीडियो में, बाद में, यह भी दिखाया जाने लगा कि कैलाश कैसे रात में जागकर भी मौके पर लोगों की मदद कर रहे हैं। समस्या, दरअसल, सिर्फ इंदौर की है ही नहीं। वहां तो समस्या विकराल हो गई और मौतें हुईं, इसलिए दिख रही है। भोपाल, रतलाम ही नहीं, मुख्यमंत्री मोहन यादव के इलाके उज्जैन तक से भी गंदे पानी की सप्लाई होने की खबरें सामने आ रही हैं। पता नहीं, इस ओर अभी किसी का ध्यान है या नहीं!
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