आकार पटेल का लेख: खतरनाक मोड़ पर पहुंच गया है देश, अलग राय रखने वालों को घोषित किया जा रहा है राष्ट्र-विरोधी

गंदगी, नफरत और गुस्सा जो हमारे टेलीविजन बहसों में दिखता है और जो जटिल मसलों को भी साधारण और बच्चों जैसी राय में बदल देता है, वह अब सिर्फ मुख्यधारा का ही हिस्सा नहीं बन गया है बल्कि शासन में भी चला गया है।

फोटो: सोशल मीडिया
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आकार पटेल

इस सप्ताह हमारे ऑफिस पर छापा मारने आए जांच एजेंसी के एक व्यकित से मेरी बात हुई थी। वे मेरी ही उम्र के थे, लगभग 50, और मैं उन बातों को सुनकर आश्चर्यचकित था जो उन्होंने मुझसे कहीं। मैं कुछ देर में बताऊंगा कि वे बातें क्या थीं। पहले अमेरिका में हुई कुछ घटनाओं पर नजर डालते हैं। राष्ट्रपति ट्रंप की पार्टी के सदस्य के रूप में पहचाने गए एक व्यक्ति ने ट्रंप के विरोधियों को बम भेजे। उनमें पूर्व राष्ट्रपति बराक ओबामा, हिलेरी क्लिंटन, ट्रंप की आलोचना का शिकार बने गुप्तचर एजेंसी के सदस्य और संभवत: 2020 में राष्ट्रपति का चुनाव लड़ने जा रही भारतीय मूल की महिला कमला हैरिस शामिल थीं।

अमेरिका में होने वाली राजनीतिक बहसों की गुणवत्ता से हम सब वाकिफ हैं, खासतौर पर जब से ओबामा का कार्यकाल खत्म हुआ है। ट्रंप ने बच्चों जैसी साधारणता में मुद्दों को तब्दील कर दिया है। ज्यादातर चीजें अच्छी या बुरी, स्याह या सफेद हैं। भारत के राजनीतिक विमर्श की भाषा में चीजें या तो राष्ट्रवादी हैं या राष्ट्र-विरोधी।

अप्रवास के मुद्दे पर ट्रंप ने काफी आक्रामकता और गुस्से में कहा कि यह एक समस्या है और इसे खत्म होना चाहिए और वे ताकत का इस्तेमाल कर इसे खत्म करेंगे। वे शारीरिक बाधाएं पैदा कर रहे हैं, और वे बच्चों को उन लोगों के परिवारों से अलग कर रहे हैं जो कथित तौर पर बिना वीजा के अमेरिका गए थे।

डेमोक्रेटिक पार्टी के लोगों और व्यापारिक समुदाय का कहना है कि मैक्सिको से आए ब्लू कॉलर श्रमिकों से अमेरिका की अर्थव्यवस्था को फायदा पहुंचा है। सिलिकॉन वैली इस बात पर जोर दे रहा था कि भारतीय सॉफ्टवेयर इंजीनियरों को व्यापारिक वीजा नहीं देने का ट्रंप का प्रस्ताव वहां व्यापार को प्रभावित करेगा। लेकिन ट्रंप और उनके समर्थकों के लिए मुद्दा बिल्कुल साफ है: अमेरिका को पवित्र बनाए रखना है। मैक्सिको के लोग बलात्कारी और अपराधी होते हैं और भारतीय उन नौकरियों को छीन रहे हैं जो सही मायने में सिर्फ अमेरिकी नागरिकों को मिलनी चाहिए। जो देश श्वेत नहीं हैं उनके लिए ट्रंप ने भद्दी भाषा का इस्तेमाल भी किया। यह उस तरह की हिंसक मुहावरेबाजी है जिसे जब राजनीतिक बहसों में घुसाया जाता है तो वह हिंसा उत्पन्न करती है। यह आश्चर्यजनक नहीं है कि हाल के दिनों में जब आप ऐसी चीजों को पश्चिम में देखते हैं तो पता चलता है कि दक्षिणपंथी समूहों के सदस्य ही इसके लिए जिम्मेदार रहे हैं। प्रतिनिधि सभा के (हमारी लोकसभा जैसा उनका सदन) अमेरिकी सदस्य गैब्रियल गिफ्फोर्ड्स को 2011 में सिर में गोली मार दी गई थी और जिसने गोली मारी थी, उसकी पहचान टी पार्टी के सदस्य के रूप में हुई थी जो रिपब्लिकन पार्टी का चरमपंथी समूह है। 2016 में इंग्लैंड की प्रतिनिधि सभा (भारत के लोकसभा जैसा सदन) की महिला सदस्य जो कोक्स को एक ऐसे आदमी ने गोली मारकर जान से मार दिया। वह उनकी अप्रवासी समर्थक नीतियों का विरोध करता था और उन्हें “गोरे लोगों से गद्दारी करने वाला” मानता था। यह घटना ब्रेक्जिट पर होने वाले मतदान के पहले हुई थी, जब अप्रवासियों का मुद्दा सबसे अहम बना हुआ था।

इन सारे मामलों में और अन्यों में भी एक सामान्य बात है। व्यक्तियों को बहुत मजबूती से साधारण और अति राष्ट्रवादी मान्यताओं में विश्वास होने लगता है जो राजनीतिक नेताओं द्वारा सामने रखा जाता है। वह (और ऐसे व्यक्ति ज्यादातर पुरुष होते हैं) ऐसे लोगों को गद्दार या दुश्मन समझता है जो अलग राय रखते हैं। यह हैरान करने वाली बात है कि अमेरिका में बहस का स्तर इतना नीचे जा चुका है कि पूर्व राष्ट्रपति ओबामा को भी राष्ट्र-विरोधी व्यक्ति के रूप में देखा जाने लगा है।

अब मुझे उस व्यक्ति के बारे में बताने दीजिए जिसके बारे में मैं इस लेख की शुरूआत में बात कर रहा था। वह उस समूह के साथ आए थे जो छापा मार रहे थे और वह बहुत शांत और बुद्धिमान व्यक्ति लगे। जिस संस्था से वे ताल्लुक रखते हैं वह वित्त मंत्रालय के अधीन आता है। फिर भी, मुख्य रूप से उनकी दिलचस्पी हमारे काम में थी जो हम कर रहे थे जिसे वे राष्ट्र-विरोधी मानते हैं। उनमें से एक ने इस शब्द का इस्तेमाल भी किया।

मैं हैरान था कि यह अब सरकार के भीतर भी हो रहा है। गंदगी, नफरत और गुस्सा जो हमारे टेलीविजन बहसों में दिखता है और जो जटिल मसलों को भी साधारण और बच्चों जैसी राय में बदल देता है, वह अब सिर्फ मुख्यधारा का ही हिस्सा नहीं बन गया है बल्कि शासन में भी चला गया है। मैंने शांतचित्त होकर उनसे तर्क करने की कोशिश की, लेकिन उन्होंने मुझे रोक दिया। उन्होंने कहा कि उन्हें गुस्सा आ रहा है और यह सब सुनने का अब कोई मतलब नहीं रह गया है।

हमलोग इस देश में एक बहुत खतरनाक मोड़ पर आ गए हैं और हम यहां बहुत जल्दी पहुंचे हैं। हम कुछ विशेष समुदायों समेत ज्यादातर लोगों को दुश्मन के रूप में देखते हैं। लेकिन किसके दुश्मन? जवाब यह है कि वह उस विश्वदृष्टि और राजनीति के दुश्मन हैं जिसका एक पक्ष पालन करता है। अगर आप उस पक्ष से नहीं आते हैं, तो आप अपने देश से नफरत करते हैं और आप इसके हित के खिलाफ काम कर रहे हैं।

इन दिनों अक्सर जो लिंचिंग के मामले हमारे इर्द-गिर्द हो रहे हैं, वह उसी मानसिकता से आ रहा है जिस मानसिकता के तहत उस पागल आदमी ने उन लोगों को बम भेजा था जिन्हें वह ट्रंप और अपने दुश्मन के रूप में देखता है। राजनीतिक नारेबाजी के जरिये हिंसा उत्पन्न हो रही है और हम सब इससे प्रभावित हो रहे हैं। हमें एक गहरी सांस लेने की जरूरत है और इस बारे में सोचना है कि ऐसे वक्त में हमारे इर्द-गिर्द क्या हो रहा है जब हम अगले चुनाव के लिए एक लंबे और आक्रामक रास्ते पर बढ़ रहे हैं।

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Published: 28 Oct 2018, 8:59 AM