मोदी सरकार ने कर दी भारतीय रेल के निजीकरण की शुरुआत, देखना है हश्र क्या होता है?

गाड़ियों के परिचालन के लिए आईआरसीटीसी किसी निजी कंपनी से अनुबंध करेगी अथवा संविदा पर कर्मचारियों को रखकर काम कराएगी। जिस तरह से सार्वजनिक क्षेत्र की एयर इंडिया के विनिवेश की दिशा में प्रयास अभी तक असफल रहे हैं, देखना है कि रेलवे का क्या हश्र होता है?

फोटोः सोशल मीडिया
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मोदी सरकार का कहना है कि भारतीय रेल अपने कुछ कम बोझ और पर्यटन वाले मार्गों पर रेल परिचालन के लिए निजी क्षेत्र की इकाइयों को आमंत्रित करेगी। शुरुआत में भारतीय रेल अपने ही उद्यम ‘इंडियन रेलवेज केटरिंग एवं टूरिज्म कॉरपोरेशन’ (आईआरसीटीसी) को दो गाड़ियां संचालन के लिए देगी, जिसमें सालाना किराए के बदले गाड़ियों का स्वामित्व उसे मिल जाएगा।

यह फैसला एक तरह से निजीकरण की शुरुआत है। आईआरसीटीसी सारा काम ठेके पर करवाती है। जाहिर है, गाड़ियों के संचालन के लिए भी वह किसी निजी कंपनी से अनुबंध करेगी अथवा संविदा पर कर्मचारियों को रखकर काम कराएगी। जिस तरह से सार्वजनिक क्षेत्र की एयर इंडिया के विनिवेश की दिशा में प्रयास अभी तक असफल रहे हैं, देखना है कि रेलवे का क्या हश्र होता है?

किंगफिशर एयरलाइन या जेट एयरवेज, जो एक जमाने में हवाई उड़ान के क्षेत्र में देशभर में दूसरे स्थान पर थीं, अंततः दिवालिया हो गईं। भारतीय रेल के 13.26 लाख कर्मचारियों के लिए यह चिंता की बात होनी चाहिए। अगर भारतीय रेल का निजीकरण होता है, तो उसके लिए वह खुद जिम्मेदार होगी। भारतीय रेल के गैर-जिम्मेदाराना रवैये का पता सामान्य श्रेणी (जनरल कंपार्टमेंट) में यात्रा करने वाले यात्रियों के प्रति उसके नजरिए से चलता है, जिसमें कई बार यात्री जानवरों के झुंड की तरह यात्रा करते हैं।

हालांकि यह बात सारे रेल अधिकारी नहीं मानेंगे, लेकिन सामान्य श्रेणी का डिब्बा रेल के शुरू या आखिर में लगाया जाता है, ताकि किसी दुर्घटना की स्थिति में गरीब लोग ही पहले नुकसान झेलें। यदि किसी रेलवे स्टेशन के प्लेटफार्म के एक छोर पर सामान्य श्रेणी के डिब्बे में चढ़ने का इंतजार कर रहा कोई यात्री चढ़ना नामुमकिन होने पर दूसरे छोर के सामान्य डिब्बों में चढ़ने को भागे, तो शायद तब तक गाड़ी चल पड़ेगी। इस यात्री के साथ महिलाएं, बुजुर्ग, छोटे बच्चे और सामान भी हो, तो हम यात्री की कठिनाई का अंदाजा लगा सकते हैं।

भारतीय रेल की सामान्य श्रेणी के असीमित टिकट बेचने की नीति है। इस श्रेणी में वरिष्ठ नागरिकों के लिए प्रथम श्रेणी, वातानुकूलित डिब्बों में मिलने वाली कोई छूट नहीं है। स्लीपर श्रेणी के टिकट की कीमत सामान्य श्रेणी से दोगुनी होती है, लेकिन स्लीपर श्रेणी और सामान्य श्रेणी में जमीन- आसमान का अंतर होता है। सामान्य श्रेणी में हो सकता है, खड़े होने तक की जगह न मिले।

इसी तरह वातानुकूलित तृतीय श्रेणी, द्वितीय श्रेणी और प्रथम श्रेणी के टिकट की कीमत सामान्य श्रेणी से क्रमशः 5, 7 और 9 गुना होती है। वातानुकूलित डिब्बे में चादर, तकिया, कंबल मिलते हैं, राजधानी-शताब्दी में खाना-नाश्ता भी मिलता है, किंतु सामान्य श्रेणी के यात्रियों को इन सुविधाओं से वंचित रखा जाता है, जबकि देखा जाए तो उन्हें ही इन सुविधाओं की सबसे ज्यादा जरूरत होती है।

समय के साथ अन्य श्रेणियों की यात्रा की गुणवत्ता में सुधार हुआ है, लेकिन ऐसा प्रतीत होता है कि सामान्य श्रेणी की ओर कोई ध्यान ही नहीं दिया गया। उदाहरण के लिए पूरी वातानुकूलित डिब्बों वाली गाड़ियां तो चलीं, किंतु जिन मार्गों पर भीड़ ज्यादा है उनपर सभी सामान्य श्रेणी के डिब्बों वाली मेल-एक्सप्रेस गाड़ियां चलाने के बारे में नहीं सोचा गया। मान लिया गया कि सामान्य श्रेणी के यात्री के लिए पैसेंजर गाड़ी पर्याप्त है। एक लोकतंत्र में विभिन्न श्रेणी के डिब्बे अपने आप में विरोधाभास हैं। भारतीय रेल को मेट्रो की तरह एक ही श्रेणी के डिब्बों वाली सभी गाड़ियां चलानी चाहिए।

लंबी दूरी की गाड़ियों में शौचालयों में पानी भरना रेल कर्मचारियों के लिए, जब तक कोई शिकायत न करे, प्राथमिकता नहीं होती, जिससे यात्रियों को होने वाली असुविधा की कल्पना की जा सकती है। बायो-शौचालय लगाए जा रहे हैं, जिनमें से मीथेन गैस उत्सर्जित होती है। बंद जगह पर मीथेन से इंसान को घुटन महसूस होती है। भारत में प्रत्येक वर्ष सीवर में घुसने और मीथेन के घुटन से मरने वालों की संख्या औसतन 1,800 है। खुले आसमान में मीथेन छोड़ने से जलवायु परिवर्तन की स्थिति बदतर होगी। भारतीय रेलवे के पास मीथेन भंडारण या प्रबंधन की कोई व्यवस्था नहीं है।

उधर, आईआरसीटीसी खाने-पीने की चीजों पर ज्यादा कीमत वसूलता है। जो शाकाहारी खाना 50 रुपये में मिलना चाहिए उसका लगभग दोगुना पैसा लिया जाता है। पूछने पर बताया जाता है कि सब्जी में पनीर डाला गया है इसलिए ज्यादा कीमत वसूली जा रही है। परंतु यात्री को बिना पनीर की सब्जी का विकल्प ही नहीं दिया जाता और पनीर की सब्जी की भी औपचारिक कीमत तय होनी चाहिए।

आईआरसीटीसी जिस कीमत पर एक्वाफिना और किनले नाम की पानी की बोतलें बेचता है, उसी कीमत पर रेल में पानी बेचता है। रेलवे को इतना महंगा पानी बेचने की क्या आवश्यकता है? लोकसभा चुनाव से पहले वाराणसी रेलवे स्टेशन पर नलों में पानी नदारद था, क्योंकि आईआरसीटीसी को ठेके पर स्थापित की गई पानी की वेंडिंग मशीनों को बढ़ावा देना था। आईआरसीटीसी की आठ प्रतिशत आय पानी की ब्रिकी से होती है, जबकि रेलवे की यह जिम्मेदारी है कि वह यात्रियों को पीने का साफ पानी निःशुल्क उपलब्ध कराए।

भारतीय रेल का नकारापन देखना हो तो ‘सेंटर फॉर रेलवे इन्फॉर्मेशन सिस्टम्स’ द्वारा विकसित वेबसाइट देखी जा सकती है। इस वेबसाइट में प्रत्येक कदम पर एक जोड़-घटाव करके आगे बढ़ा जा सकता है। बाकी वेबसाइट में सुरक्षा के लिए एक बार नकल करके लिखना होता है, यह सुनिश्चित करने के लिए कि कोई कम्प्यूटर संचालित कर रहा है। किन्हीं दो स्टेशनों के बीच कौन-सी रेलगाड़ियां चलती हैं, यह पता करना हो तो जोड़-घटाना करना पड़ेगा। यदि भारतीय रेल ने गणित मजबूत करने की जिम्मेदारी ली है तो दूसरी बात है, नहीं तो यात्रियों के प्रति इस तरह की संवेदनहीनता उसे निजीकरण की दिशा में जाने से बहुत दिनों तक रोक नहीं पाएगी।

(संदीप पाण्डेय वैज्ञानिक और सामाजिक कार्यकर्ता हैं और बी.रामकृष्णम राजू एनएपीएम की सलाहकार परिषद के सदस्य हैं)

(सप्रेस से साभार)

Published: 12 Jul 2019, 10:07 PM
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