समझना होगा मनरेगा का आर्थिक-सामाजिक पक्ष
किसान और खेत मजदूर- दोनों का संघर्ष आगामी दशक की दस्तक है। इनको आमने-सामने करना सामाजिक न्याय के खिलाफ।

स्वराज या आजादी कभी एकतरफा नहीं होती। सत्यान्वेषण की ग़रज़ यह सिखाती है कि किसी भी मुद्दे के हर पहलू को खंगालना चाहिए। महात्मा गांधी नरेगा के तहत दिया गया काम मांगने का हक समाप्त हुआ। उसका स्थान एक योजना ने ले लिया। उस पर बहुत लिखा जा चुका है। पर मनरेगा के आर्थिक-सामाजिक पक्ष और राजनीतिक-आर्थिकी को समझना जरूरी है। वह काफी पेचीदा है। पूरे भारत में वह एक-सा नहीं है। उन इलाकों में जहां बारिश कम है और साल भर में बमुश्किल एक फसल होती है, वहां मनरेगा जीवनदायिनी साबित हुई। अन्य क्षेत्र में कृषि कार्य के आधिक्य से मनरेगा पर काम के बतौर निर्भरता कम थी। खासकर जहां कम-से-कम दो या तीन फसल की पैदावार होती है। इत्तेफाक से मध्यप्रदेश के पश्चिमी मालवा अंचल में समृद्ध खेती होती रही है, हालांकि जल स्तर घटने से वहां भी बदलाव आ रहा है।
अनेक ग्राम चौपालों में संवाद से कुछ तथ्य सामने आए। पहला सवाल तो यह था कि क्या ऐसे इलाके में मनरेगा की कोई जरूरत नहीं थी? तो क्या अब वहां इस हक की समाप्ति का कोई असर नहीं पड़ेगा? क्या मनरेगा को केवल ऐसे ही क्षेत्रों तक सीमित रखना चाहिए था, जहां खेती पर निर्भरता संभव नहीं? सो पुनः बहाल करने की मांग में इन क्षेत्र विशेष की आवश्यकता को ध्यान रखना चाहिए? क्या वह मात्र रोजगार सृजक हक है या कोई परिवर्तनकारी बुनियादी व्यवस्था?
मनरेगा, मजदूरों के लिए न्यूनतम मजदूरी की दर स्थापित करने वाली गारंटी है। जैसे न्यूनतम समर्थन मूल्य ने उपज के न्यूनतम दाम तय किए। आजादी के बाद के शुरुआती दशक के इस फैसले ने फसल को औने-पौने दाम में बिकने नहीं दिया। बाद की यूपीए सरकार ने लघु वनोपज का भी समर्थन मूल्य तय किया। बिचौलियों, शोषणकारी आढ़तियों के कब्जे को समाप्त किया। गोयाकि उसमें अब भी बहुत सुधार की जरूरत है। समर्थन मूल्य में दलहन-तिलहन की खरीद केवल उपज के 25 प्रतिशत की होती है। अनाज पर अधिकतम की सीमा नहीं है। सीमांत किसान के लिए यह बहुत सुखद नहीं होता। सामाजिक तौर पर भी यह किसान अंतिम पायदान पर होते हैं। मंडियों में सरकारी खरीद पर निजी व्यापारियों की चमक-दमक और दबदबा कायम रहता है। मगर सरकारी भाव की कानूनी बाध्यता तो है।
मनरेगा ने वैसा ही परिवर्तनकारी हक मजदूरों को दिया। आदिवासी बहुल जिले के पास निवास होने से समूचा बचपन सुबह चौक पर ट्रेन से उतरकर पहुंचे मजदूर स्त्री-पुरुष को देखते बीता है। लंबे समय तक आने और फिर दस-बीस रुपये जो बढ़कर पचास हुए से ऊपर कभी दिहाड़ी नहीं दी गई- चाहे घरेलू निर्माण कार्य हो या कटाई का काम।
एक तरह से सस्ती मजदूरी पर पूरी ग्रामीण आर्थिकी चलती थी। सज्जन मालिक थोड़ा अनाज ले जाने देते थे, वह भी जो कचरे से निकलता है। मनरेगा ने यह बदल दिया। कलेक्टर रेट ने पहले दौर में 150 रुपये, फिर बढ़ते-बढ़ते इस पश्चिमी मालवा क्षेत्र में मजदूरी की दर को न्यूनतम दो सौ बाईस कर दिया। आज कहीं भी तीन सौ से कम की मजदूरी नहीं होती। मनरेगा से मजदूरों की दिहाड़ी में क्रांति आई । आश्चर्य नहीं होना चाहिए कि बार-बार यह मांग उठी की मनरेगा को खेती से जोड़ा जाए। यह आज भी बहुत जगह कहा जाता है, खासकर बड़े किसान यह सिफारिश करते हैं।
मनरेगा को खेती से जोड़ा भी गया। सीमांत किसान को अपनी खेती की जमीन के उन्नयन का मौका दिया गया। वह अपने परिजन समेत काम करे, तो मजदूरी सरकार देती थी। यदि मनरेगा को संपूर्ण खेती से जोड़ा जाता, तो मजदूरी की दर फिर से गिर जाती। आज भी ऐसा ही होगा यदि पुनः विवेचना हुई। मजदूर सरकारी रेट तो पाएंगे, मगर प्रतिस्पर्धात्मक मजदूरी का अंतर चूक जाएंगे। केवल तय सरकारी रेट पर काम करना पड़ेगा।
नई योजना तो और भी घातक है। अब चूंकि काम मांग आधारित नहीं होगा, बारहमासी भी नहीं रहेगा, तो खेती के समय पर कोई विकल्प नहीं होगा। खेत मालिक की तय दर पर मजबूरी में मजदूरी करनी पड़ेगी। परिणामस्वरूप एक ही साल में मजदूरी की दर घटने लगेगी।
अनेक प्रगतिगामी मानते हैं कि ग्रामीण क्षेत्र में जहां खेत मालिक पिछड़े वर्ग से आते है, उन्हें यह नई व्यवस्था बहुत भाती है। पुरानी सामाजिक वर्चस्व की वापसी होगी। यह वर्ग सत्तारूढ़ दल के काफी निकट भी है। इसी वर्ग के एक छोटे समूह ने बहुसंख्यवादी विचार को प्रश्रय दिया है- वही समूह जो अनुसूचित वर्ग को ज़मीन के पट्टे देने के खिलाफ रहा, बैंकों के राष्ट्रीयकरण और सूदखोरी पर कानूनी प्रतिबंध से सख्त ऐतराज रखता है और दोषपूर्ण मनाता है। पर पिछले सालों में खेती पर दबाव बढ़ा है।
सीमांत किसान को भी बढ़ी मजदूरी की दर से ही भुगतान करना पड़ता है। संसाधन के अभाव में वे पिछड़ते हैं। फिर किसान की लागत हर तरफ से बढ़ी है। उस अनुपात में फसल के दाम नहीं बढ़े। कुछ क्षेत्र जहां पहले सोयाबीन जैसी फसल में मुनाफा मिलता था- 2011-12 में साढ़े चार हजार तक प्रति किलो भाव था- वहां आयातित सोयाबीन ने बाजार गिरा दिया। सरकार बड़े व्यवसायियों के अनुरूप सीमा शुल्क लगाती है और फॉर्चूनर तेल के साथ संबंधों को प्रगाढ़ बनाने में लिप्त है। सोयाबीन सस्ती होती है, तेल महंगा होता है। देश के भीतर खरीद मूल्यों में गिरावट आई। देश के बाहर भी वही हुआ। चीन जो सबसे बड़ा खरीदार था, वह ब्राजील से सस्ते में लेने लगा। ऐसे में बड़े किसान जो भूमि स्वामी हैं, पिछड़े तबके से हैं, उनकी आर्थिक दशा भी हाशिये पर आई। उन्हें बढ़ी लागत के साथ-साथ बढ़ी मजदूरी के दर का सामना करना पड़ा। उस अनुपात में कमाई नहीं हो रही है।
सरकार पर बस नहीं चला, तो सारी खीझ सबसे कमजोर पर निकली। इस वर्ग को इस बदलाव से राहत महसूस हो सकती है। कदाचित सत्तारूढ़ दल ने उनको अपने पक्ष में करने के लिए यह किया हो, ताकि जाति जनगणना और सामाजिक न्याय के अभियान को पलटा जाए। उनमें से अधिकांश पिछड़े वर्ग के संभ्रांत समुदाय हैं। राजनीतिकरण के अभाव में यह पैंतरा सुखद हो सकता है। सनद रहे कि सरकार ने इस वर्ग की पीड़ा को समझकर यह कदम कतई नहीं उठाया है- यह वर्ग अपनी मेहनत, हुनर और उद्यमशीलता से संभ्रांत हुआ है।
आजादी के बाद के शुरुआती कानूनी सुधार जैसे मालगुजारी जमींदारी उन्मूलन, आयकर मुक्त और राहत सब्सिडी से हुआ है। इस वर्ग ने खेती में प्रयोग किए, पॉली हाउस से लेकर उद्यानिकी, औषधीय फसल, बगीचे आदि से खेती को लाभप्रद बनाने की भरसक कोशिश की है। इस वर्ग के खिलाफ कोई राय बनाना भी स्वराज के साथ बेईमानी होगी। मगर इस वर्ग को भी चाहिए कि अपने आर्थिक तनाव को कम करने के लिए सबसे कमजोर को लाचार न बनाए जाने दें। उनके लिए खड़े होकर हक की पैरवी करें। फिर साथ ही अपने लिए भी उचित भाव, फसल बीमा के युक्तियक्तकरण की मांग को बढ़ाएं।
हर राजनीतिक संगठन दोनों पक्ष को साथ उठाए। कृषि में भी बड़े बदलाव के बिना तनाव कम नहीं होगा। वाणिज्य विभाग में आयात-निर्यात नीति बनते वक्त केवल बड़े व्यापारी हावी होते हैं। वहां किसान की आवाज नहीं पहुंचती।
आज के टैरिफ दौर में सीमा शुल्क तय करते वक्त किसान को नजरअंदाज न करें। औसत नुकसान मापने की प्रक्रिया दोषपूर्ण है। किसान को विश्वास में नहीं लेती। वह एक क्षेत्र को इकाई मानती है न कि खेत को, जबकि नुकसान खेत का होने पर व्यक्तिगत किसान प्रभावित होता है। फसल बीमा निजी कंपनियों को लाभ देती हैं। किसान को कभी मुआवजा नहीं मिलता। वर्षा परिमापक यंत्र हर गांव में लगाया जा सकता है, पर पटवारी हल्के में लगता है। कम या अधिक बारिश की सही माप नहीं हो पाती। किसान से कभी कुल रकबे की चर्चा नहीं होती। पैदावार इतनी हो जाती है कि बाजार गिर जाता है जबकि ग्रामसेवक इसी कार्य के लिए वेतन लेते हैं। किसान औसत फसल छुपाते हैं कि व्यवस्था पर विश्वास नहीं। सो सही में जब कम पैदावार होती है, तब भी तीन साल की औसत में बराबरी दर्शाई जाती है। उसका नुकसान होता है।
स्वराज की सोच का मतलब और मकसद संपूर्ण ग्रामीण अर्थव्यवस्था को समझना, हर वर्ग के साथ संवेदनशील होना है। असल ग्रामीण स्वावलंबन और विकास तभी संभव है, जब खेत और मजदूर- दोनों को न्याय मिले। वह मजदूर की मजदूरी को कम करके नहीं होगा। यह खेत मालिकों को समझना होगा। मशीन से महंगी मजदूरी ही असल समृद्धि है। पर किसान को उचित दाम मिले, फसल बीमा में सुधार हो, किसान की वाणिज्य नीति में दखल हो, समर्थन मूल्य में खरीद हो, मंडियों में लोकतंत्र पुनः लौटे, ग्राम राजस्व व्यवस्था में आमूलचूल बदलाव आए। यह भी जरूरी है। यह सब मनरेगा को मारकर या सीमांत किसान के इतर की खेती से जोड़कर नहीं हो सकता। किसान और खेत मजदूर- दोनों का संघर्ष आगामी दशक की दस्तक है। इनको आमने-सामने करना सामाजिक न्याय के खिलाफ है।
Google न्यूज़, नवजीवन फेसबुक पेज और नवजीवन ट्विटर हैंडल पर जुड़ें
प्रिय पाठकों हमारे टेलीग्राम (Telegram) चैनल से जुड़िए और पल-पल की ताज़ा खबरें पाइए, यहां क्लिक करें @navjivanindia