आकार पटेल का लेख: कोरोना पर तो हमने मान लिया कि दुनिया एक-दूसरे से जुड़ी है, सीएए-एनारसी पर भी सबक लेना होगा

दुनिया कितने गहरे तौर पर एक दूसरे से जुड़ी हुई है इसका एहसास करन के लिए हमें एक बीमारी की जरूरत है। दुनिया का कोई भी देश इस मामले में संप्रभु नहीं है कि वह दुनिया के विरोध के बीच मनमानी कर सके। सीएए और एनआरसी ऐसे ही मुद्दे हैं और भारत इनसे सबक ले रहा है।

फोटो : सोशल मीडिया
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आकार पटेल

भारत कितना संप्रभु है और यह किस हद तक अपनी इच्छा से वह सब कर सकता है जो यह चाहता है? हम दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र, दूसरे सबसे बड़े देश और हथियारों के आयातक, तीसरी सबसे बड़ी सेना और पांचवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था हैं। किसी भी ऐतबार से देखें तो काफी प्रभावशाली आंकड़े हैं, कम से कम संख्याके लिहाज़ से।

तो क्या हम वो सब कर सकते हैं जो हम दुनिया के विरोध के बावजूद करना चाहते हैं? हमें इस पर जरूर मंथन करना चाहिए क्योंकि इतिहास में पहली बार, भारत को वह सब बदलने के लिए वैश्विक दबाव का सामना करना पड़ रहा है जो हमने आंतरिक तौर पर किया है या कर रहे हैं।

संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार आयोग हमारे नागरिकता संशोधन कानून की संवैधानिकता को चुनौती देने वाली याचिका पर सुप्रीम कोर्ट मं दखल देना चाहता है। अमेरिका का हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स (उनकी लोकसभा) ने उस सबके खिलाफ निंदा प्रस्ताव पेश किया जो हमने कश्मीर में किया। इस प्रस्ताव को अमेरिका की दोनों पार्टियों के 66 सदस्यों का समर्थन है।

यूरोपीय संघ की संसद भी जल्द ही सीएए के लिए भारत के खिलाफ निंदा प्रस्ताव पर मतदान करने वाली है। अंतर्राष्ट्रीय धार्मिक स्वतंत्रता पर संयुक्त राष्ट्र आयोग, जो अमेरिकी राष्ट्रपति और कांग्रेस के लिए सिफारिशें करता है, ने 5 मार्च को सीएए और नेशनल रजिस्टर ऑफ सिटिजन्स यानी एनआरसी का मामला उठाया। यूएससीआईआरएफ की कमिश्नर अनुरिमा भार्गव ने कहा, "आशंका है कि यह कानून एक नियोजित राष्ट्रीय जनसंख्या रजिस्टर और संभावित एनआरसी के साथ मिलकर भारतीय मुसलमानों के व्यापक पैमाने पर नागरिकता खत्म करने के रूप में सामने आ सकता है। इसके बाद मुस्लिमों को लंबे समय तक हिरासत में रखने, निर्वासित करने हिंसा का सामने करने को मजबूर करेगा हम पहले से ही इस प्रक्रिया को पूर्वोत्तर राज्य असम में देख चुके हैं...एनआरसी किसी इलाके में अवैध प्रवासियों की पहचान करने के लिए एक तंत्र है। "

दिल्ली दंगों जैसी हालिया घटनाओं को लेकर अलग-अलग देशों ने भी भारत की निंदा या चेतावनी दी है। यूनाइटेड किंगडम संसद के दोनों सदनों में भारत के नागरिकता कानूनों और दंगों की आलोचना सुनाई दी। इंडोनेशिया, इस्लामिक काउंसिल का संगठन (जिसमें से भारत एक सदस्य बनना चाहता है), तुर्की और मलेशिया सभी ने हमारे खिलाफ बात की है। ईरान के राजनीतिक और धार्मिक नेताओं ने दिल्ली के दंगों की निंदा की और अल्पसंख्यकों की रक्षा नहीं करने के लिए भारत को दोषी ठहराया।

बाकी देशों ने भी विभिन्न तरीकों से विरोधी संकेत भेजे हैं। इस महीने होने वाली प्रधानमंत्री की बांग्लादेश यात्रा रद्द कर दी गई है। आधिकारिक कारण कोरोनावायरस बताया गया, लेकिन इस ऐलान से एक दिन पहले बांग्लादेश में सीएए के लिए भारत और मोदी की निंदा करने वाले कम से कम 5000 लोगों ने वहां विरोध प्रदर्शन किया। मोदी के आगमन पर कई और विरोध प्रदर्शनों की योजना भी थी वहां। ब्रसेल्स में होने वाली यूरोपीय संघ की शिखर बैठक के लिए भी पीएम का दौरा रद्द कर दिया गया। एक बार फिर वायरस को कारण के रूप में सामने रखा गया, लेकिन यूरोपीय संघ एमईपी द्वारा भारत के खिलाफ वोट होना है और हम इसे रोकने में नाकाम रहे हैं।

हमारी प्रतिक्रिया या तो गुस्से वाली रही है और राजदूतों को बुलाकर उन्हें (ईरान जैसे मामलों में) यह बताने की रही है कि अगर आलोचना बंद नहीं की तो हम व्यापार रिश्ते (मलेशिया के संबंध में) या फिर हमने इस आलोचना को (अमेरिका जैसे शक्तिशाली राष्ट्र के सामने जहां हमारी अहमियत बहुत ज्यादा नहीं है) अनदेखा कर दिया है या यह दावा किया है कि यह हमारा संप्रभु मुद्दा है और इससे दुनिया को चिंतित होने की जरूरत नहीं है जैसा कि हमने संयुक्त राष्ट्र मानाधिकार आयोग के सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के मामले में किया।

हमारा विदेश मंत्रालय इतने बड़े पैमाने पर हो रही बदनामी और आलोचना को रोकने कमें सक्षम नजर नहीं आ रहा और 2020 में ये सब उस पर बहुत भारी पड़ रहा है। भारत पर विरोध और आलोचना के हमले करने वाले लोगों में से कई खुद भारतीय मूल के हैं, जैसे कि अमेरिकी कांग्रेस प्रस्ताव की लेखिका प्रमिला जयपाल। ऐसे में हमारे लिए आलोचना को न समझना या दुर्भावनापूर्ण बताकर अनदेखा करना मुनासिब नहीं है।

सवाल फिर वही है कि हम जो कुछ कर रहे हैं या करना चाहते हैं, उसे हम दुनिया के विरोध का सामना करते हुए करना चाहते हैं? अगर बीते कुछ वर्षो को याद करें तो हमने शायद 1991, 1998 और 2002 में ही बाहरी विरोद का सामना करना किया है। 2002 में दुनिया और खासतौर पर अमेरिका हमारे संसद पर हमले के बाद अमेरिका हमारे और पाकिस्तान पर जबरदस्त दबाव बना था कि हम युद्ध न शुरु करें। युद्ध नहीं हुआ, हालांकि भारत ने पाकिस्तान सीमा पर अपनी सेना का जमावड़ा कर लिया था। 1998 में अमेरिका इस बात से नाराज था कि हमने परमाणु परीक्षण कर लिया था, लेकिन इसके आगे कुछ नहीं हो सकता था क्योंकि परमाणु परीक्षण तो हो चुका था। 1991 में अमेरिका और दूसरी एजेंसियों ने भारत को आर्थिक उदारीकरण अपनाने के लिए मजबूर किया, जिसे हमने विधिवत मान लिया था।

इन उदाहरणों से साफ है कि हम बाहरी दबावों को मानते रहे हैं और उनके आगे झुकते भी रहे हैं। कुछ मामलों में, जैसा कि 1991 के आर्थिक उदारीकरण को ही लें तो हम कह सकते हैं कि इसमें हमारे राष्ट्रीय हित बाकी दुनिया के अनुरूप थे इसलिए हमने खुद को बदला।

वास्तविकता यह है कि दबाव मौजूद था, है और रहेगा क्योंकि आज की दुनिया आपस में जुड़ा हुआ एक मोहल्ला है। भले ही वैश्विक व्यापार कमजोर पड़ रहा हो लेकिन सभ देश एक दूसरे से इस तरह जुड़े हुए हैं कि हम कुछ भी करें एक दूसरे पर इसका प्रभाव पड़ता ही है।

शुक्रवार (13 मार्च) को प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी ने प्रस्ताव रखा कि भारत और उसके पड़ोसी देश मिलकर कोरोनोवायरस की समस्या का मुकाबला करेंगे हैं। इस संदेश पर हमारे पड़ोसियों और सार्क (दक्षेस) के सभी देशों की तरफ से सकारात्मक प्रतिक्रिया मिला, सिवाय पाकिस्तान के। भूटान के प्रधानमंत्री लोटे त्शेरिंग ने कहा: “इसे हम नेतृत्व कहते हैं। इस क्षेत्र के सदस्यों के रूप में, हमें ऐसे समय में एक साथ आना चाहिए। छोटी अर्थव्यवस्थाओं पर ज्यादा असर पड़ता है, इसलिए हमें समन्वय करना चाहिए। आपके नेतृत्व के साथ, मुझे कोई संदेह नहीं है कि हम तत्काल और प्रभावशाली परिणाम देखेंगे।”

यह हमें यह एहसास दिलाने के लिए एक बीमारी लेता है कि दुनिया उन तरीकों से जुड़ी हुई है जो अप्रभावी हैं लेकिन यह सच है। दुनिया का कोई भी राष्ट्र ऐसा नहीं है जो दूसरों के विरोध का सामना करना चाहता हो। सीएए और एनआरसी के मामले में, भारत सबक को कठिन तरीके से सीख रहा है।

यानी दुनिया कितने जटिल और गहरे तौर पर एक दूसरे से जुड़ी हुई है इसका एहसास करन के लिए हमें एक बीमारी की जरूरत है। दुनिया का कोई भी देश इस मामले में संप्रभु नहीं है कि वह दुनिया के विरोध के बीच मनमानी कर सके। सीएए और एनआरसी ऐसे ही मुद्दे हैं और भारत इनसे सबक ले रहा है।

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