खरी-खरी: कोलकाता में जो हुआ वह बीजेपी की हताशा से ज्यादा उसका चरित्र है, पर बंगाल नहीं है गुजरात

2014 में बीजेपी अपने चरम को पा चुकी है। लेकिन अब पोल खुल चुकी है जिसके बाद वोटर अब झांसे में नहीं आ रहा है। ऐसे में बीजेपी को यूपी के घाटे से इतर भी हर राज्य में नुकसान होने वाला है। मोदी-शाह को इस घाटे की भरपाई बंगाल से होने की उम्मीद थी, लेकिन ममता ने इन मंसूबों पर पानी फेर दिया।

फोटो : सोशल मीडिया
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ज़फ़र आग़ा

नरेंद्र मोदी और अमित शाह के नेतृत्व में बीजेपी से जो अपेक्षा की जा सकती है कोलकाता में वही हुआ। मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान राम के नाम पर अमित शाह ने कोलकाता में 14 मई को जो रोड शो किया, उसके पश्चात बीजेपी कार्यकर्ताओं के आतंक से बंगाल की राजनीति धधक उठी। बीजेपी के लिए यह कोई नहीं बात नहीं है। संघ पाठशाला में ट्रेंड बीजेपी आज तक दंगे एवं फसाद के रास्ते ही देश की राजनीति में यहां तक पहुंची है।

सन1990 के दशक में इसी बीजेपी ने राम मंदिर के नाम पर उत्तर प्रदेश में दंगों की कतार लगा दी थी। हिंदू-मुस्लिम नफरत और खाई के रास्ते इसी बीजेपी ने उत्तर प्रदेश की सत्ता पर कब्जा जमाया था। पर ‘जय श्रीराम’ का नारा लगाकर सत्ता पाने वाली बीजेपी ने आज तक राम मंदिर नहीं बनवाया। अरे, स्वयं नरेन्द्र मोदी का गुजरात का रिकार्ड देख लीजिए। सन् 2002 के गुजरात दंगों से पूर्व देश में नरेन्द्र मोदी की कोई पहचान नहीं थी। स्वतंत्र भारत के सबसे भीषण दंगों की आग से उबरे नरेन्द्र मोदी रातों रात ‘हिंदू हृदयसम्राट’ बन गए।

फिर 2014 में देश को विकास का झांसा देकर देश की सत्ता पर कब्जा कर बैठे। पांच वर्षों में झूठ एवं घमंड की प्रतिमा वाले मोदी के पैरों तले अब जमीन खिसक रही है, तो उनके कमांडर इन चीफ अमित शाह अब बंगाल को दूसरा गुजरात बनाने की फिराक में हैं। परन्तु बंगाल न तो गुजरात था और न ही बन सकता है। वहां ममता बनर्जी मोदी एवं शाह जैसों को सबक सिखाने को मौजूद हैं। तब ही तो बीजेपी की गुंडई का जवाब टीएमसी कार्यकर्ताओं ने भी जमकर दिया।

परन्तु 14 मई को कोलकाता में जो कुछ हुआ वह केवल झांकी थी। उत्तर प्रदेश, बंगाल एवं कोलकाता में समय-समय पर आतंक फैलाने एवं दंगे फसाद की राजनीति करने वाली संघ एवं बीजेपी आसानी से सत्ता छोड़ने को तैयार नहीं है। यदि नतीजे बीजेपी के पक्ष में नहीं आते, तो बीजेपी पूरे देश को नफरत की आग में झोंक सकते हैं। छह चरण के चुनाव के पश्चात यह दिखाई देने लग गया था कि एनडीए की सरकार बनाना लगभग असंभव है। इस लेख को लिखे जाने तक केवल एक चरण का चुनाव बचा है और यह स्पष्ट है कि अब बीजेपी की उम्मीद टूटचुकी है।

दरअसल, उत्तर प्रदेश ने बीजेपी की कमर तोड़ दी। जिस उत्तर प्रदेश ने बीजेपी एवं सहयोगियों को पिछली बार 80 में से 73 सीटें दी थीं, उसी उत्तर प्रदेश में इस बार बीजेपी की कम से कम 50 सीटें घटने वाली हैं। उत्तर प्रदेश 1993 विधानसभा चुनाव का इतिहास एक बार फिर दोहरा रहा है। उस चुनाव में पहली बार समाजवादी पार्टी एवं बहुजन समाज पार्टी के गठबंधन ने मिलकर विधानसभा चुनाव लड़ा था। चुनाव के नतीजे जब आए, तो हिंदुत्व के चेले-चपाटों के हाथों के तोते उड़ गए। उस समय पिछड़ों, दलितों एवं मुसलमानों के सामाजिक एवं राजनीतिक गठजोड़ ने अयोध्या आंदोलन की हवा निकाल दी और बीजेपी को करारी हार का सामना करना पड़ा था।

ऐसी ही कुछ स्थिति उत्तरप्रदेश में फिर स्पष्ट दिखाई पड़रही है। अधिकांश पिछड़े, दलित एवं मुसलमान वहां बीजेपी के खिलाफ एकजुट हो गए हैं। यही कारण है कि उत्तर प्रदेश बीजेपी के हाथों से लगभग पूर्णतया निकल गया। वाराणसी से तो मोदी जीत रहे हैं। परन्तु अंतिम चरण में योगी के घर गोरखपुर में भी सेंध लगने के आसार हैं। अर्थात बीजेपी का गढ़ उत्तर प्रदेश उसके हाथों से निकल गया। वहां बीजेपी को इतना बड़ा घाटा हो रहा है कि उसकी भरपाई कहीं और से नहीं हो पा रही है।

राजस्थान, मध्यप्रदेश, दिल्ली, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश, पंजाब, बिहार, झारखंड, छत्तीसगढ़, गुजरात एवं महाराष्ट्र और कर्नाटक वह प्रदेश हैं जहां 2014 में बीजेपी अपनी चरम सीमा पर चुनाव जीत चुकी थी। अब मोदी की पोल खुलने के पश्चात एवं नोटबंदी तथा जीएसटी की मार के पश्चात वोटर कहीं भी मोदी के झांसे में नहीं आ रहा है। इस स्थिति में उत्तर प्रदेश का घाटा पूरा होना तो दरकिनार हर प्रदेश में दो, चार, दस सीटें कम होने से बीजेपी पीछे ही होती चली जा रही है।

मोदी और शाह को आशा थी कि वह इस घाटे को बंगाल से पूरा कर लेंगे। परन्तु वहां ममता बनर्जी ने बीजेपी के मंसूबों पर पानी फेर दिया। कोलकाता में बीजेपी कार्यकर्ताओं ने 14 मई को जो दंगे फसाद फैलाए वह बीजेपी की खीज के प्रतीक थे।

परन्तु स्थिति गंभीर है। क्योंकि कोलकाता में जो कुछ हुआ वह केवल बीजेपी की खीज ही नहीं अपितु उसके चरित्र का भी प्रतीक है। दंगे एवं नफरत की राजनीति करने वाली पार्टी से यह अपेक्षा मत कीजिए कि वह शालीनता से सत्ता छोड़ देगी। बीजेपी कोई कांग्रेस नहीं कि इमरजेंसी जैसे काल के बाद चुनावी हार को शालीनता से स्वीकार कर सत्ता से बाहर हो जाए। याद रखिए संविधान एवं लोकतांत्रिक प्रणाली बीजेपी के लिए सत्ता प्राप्तिका केवल साधन है। एक बार सत्ता हाथ लग जाए तो यह जल्दी छोड़ने वाली नहीं।

अटल बिहारी वाजपेयी जी किसी दूसरी परंपरा के नेता थे। मोदी एवं शाह संघ के आचरण में डूबे हिंदू राष्ट्र निर्माण का सपना साकार किए बिना शालीनता से कैसे सत्ता से बाहर चले जाएंगे। चुनाव में मशीन की गड़बड़ी और बूथ कैपचिरिंग की खबरें आनी शुरू हो चुकी हैं। फरीदाबाद में जो कुछ हुआ वह बूथ कैपचिरिंग ही तो थी। फिर अमेठी जैसे क्षेत्र में ‘स्ट्रांगरूम’ से पोलिंग के पश्चात जिस प्रकार ईवीएम मशीनों को बाहर ले जाया गया वह भी एक प्रतीक है। यह तब हुआ जबकि चुनाव आयोग के नियमानुसार स्ट्रांगरूम से कोई ईवीएम मशीन अंदर या बाहर नहीं की जा सकती है।

चुनाव बस अब समाप्त हैं। इसी के साथ-साथ बीजेपी की हार भी साफ नजर आ रही है। परन्तु उसी के साथ-साथ लोकतंत्र के लिए एक नए संकट का खतरा उत्पन्न हो सकता है। 1925 से संघ ने जिस हिंदू राष्ट्र का सपना देखा था वह हिंदू राष्ट्र के नरेन्द्र मोदी के हाथों साकार होने की आशा थी।

क्या संघ एवं बीजेपी हिंदू हृदय सम्राट की हार को शालीनता से मान लेगी जिसके हाथों हिंदू राष्ट्रनिर्माण की उम्मीद थी। मुझे इस बात की उम्मीद बहुत कम दिखाई पड़ती है। इसलिए कल को देश के अधिकांश भाग्य को 14 मई के कोलकाता में बदल दिया जाए, तो आश्चर्यचकित होने की आवश्यकता नहीं है। हां, विपक्ष को ऐसी किसी भी स्थिति से निपटने के लिए तैयार रहने की जरूर आवश्यकता है।

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