आकार पटेल का लेख: क्या उम्मीद करें कि आने वाला साल भले ही अच्छे दिन न लाए, लेकिन कुछ तकलीफें तो कम हों...

बीते दो साल मानों एक ही जैसे गुजरे। वहीं तकलीफें, वही आंतरिक उथल-पुथल, वही आर्थिक दुश्वारियां...तो क्या आने वाले साल से कुछ उम्मीदें की जा सकती हैं। उम्मीद तो बस यही है कि भले ही अच्छे दिन न आ पाएं, लेकि कुछ तकलीफें तो जरूर कम हों।

फोटो : सोशल मीडिया
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आकार पटेल

अभी हाल ही में एहसास हुआ कि बीते दो साल एक जैसे ही लग रहे हैं। हमने 2020 की शुरुआत महामारी के साथ की और 2021 का अंत भी इस महामारी के साथ ही हो रहा है। लेकिन सिर्फ यही एक समानता नहीं है। आंतरिक उथल-पुथल, सीमा पर तनाव और एक ऐसी अर्थव्यवस्था जो 2017 से हिचकोले खा रही थी, कमोबेश उसी हालत में हमारे सामने है। ऐसे में हम 2022 से क्या उम्मीद कर सकते हैं? आइए इस पर विचार करें।

शायद हमें उस जगह से शुरुआत करनी चाहिए जो वक्त के साथ जमकर रह गई है। और वह जगह है: कश्मीर। हमने कश्मीरियों को हासिल संवैधानिक गारंटियां को तो खत्म कर दिया लेकिन उसके बदले में उन्हें इससे बेहतर कुछ नहीं दे पाए। वे आज (देश का एकमात्र ऐसा हिस्सा) लोकतांत्रिक रूप से शासित नहीं हैं, वहां किसी ने निवेश नहीं किया है, पंडित वापस नहीं आए हैं और हिंसा लगातार जारी है।

इस साल 2011 से 2015 के मुकाबले हर साल होने वाली हत्याओं की संख्या में इजाफा हुआ है और फिलहाल इनमें कमी आने के कोई संकेत नहीं दिख रहे हैं। वहां हमारी दिलचस्पी खत्म हो गई और हम एक राष्ट्र के रूप में आगे बढ़ गए हैं। यह बात कम ही लोगों को पता है कि श्रीनगर की मुख्य मस्जिद जुमे की नमाज के लिए बंद रहती है।

सरकार को चिंता है कि अगर इसकी अनुमति दी गई तो लोग जो महसूस कर रहे हैं उसका प्रदर्शन करेंगे। 2022 में, हमें इसके जारी रहने की ही उम्मीद है, क्योंकि जहां तक दिख रहा है, भारत के पास कश्मीर के लिए कोई योजना नहीं है।

ताजा खबरों की मानें तो लद्दाख में सीमा पर ठंड का असर देखने को मिल सकता है। लेकिन यह कमी विशुद्ध रूप से सिर्फ चीन की शर्तों पर होगी, क्योंकि हमने माना ही नहीं है कि चीन की तरफ से घुसपैठ गुई है, इसीलिए हमारी ओर से फरवरी 2020 की यथास्थिति में वापसी के लिए कोई दबाव नहीं है। यह बहुत कठिन इलाका है और तय है कि दोनों तरफ के हजारों सैनिक मुश्किल हालात में वहां हैं।

इसे देखते हुए, और इस तथ्य को देखते हुए कि चीन ने वह हासिल कर लिया है जो वह चाहता था यानी 1959 के दावे वाली लाइन तक पहुंच - हमें उनकी शर्तों पर तनाव में कुछ कमी देखनी चाहिए। राष्ट्रीय सुरक्षा पर लिखने वाले कुछ चंद लोग यही कहेंगे कि यह एक झटका है, लेकिन चूंकि सरकार कहानी को लगभग पूरी तरह से नियंत्रित करती है, इससे कोई फर्क नहीं पड़ेगा।

इस बीच चीन के खिलाफ अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया और जापान के साथ हमारा गठबंधन कमोबेश खत्म हो चुका है और अमेरिका ने ऑस्ट्रेलिया और ब्रिटेन के साथ चीन के खिलाफ सुरक्षा पर गठबंधन किया है।


अर्थव्यवस्था के मोर्चे पर सरकार पर हालात सुधारने का कोई दबाव नहीं है। हम ऐसा इसलिए कह सकते हैं क्योंकि जनवरी 2018 से जीडीपी में गिरावट देखी जा रही थी और यह महामारी और पहले लॉकडाउन से दो साल तीन महीने पहले तक जारी रही थी। इसलिए हम जिस संकट में हैं, उसका महामारी से कोई संबंध नहीं है। अगले साल हमारा सकल घरेलू उत्पाद उत्पादन उसी आकार का होगा जैसा कि महामारी से पहले था लेकिन महामारी से पहले हम पहले से ही लंबे समय से संघर्ष कर रहे थे और वह जारी ही रहेगा।

इसके दो मुख्य कारण अर्थशास्त्रियों के लिए पहेली बने रहेंगे। पहला तथ्य यह है कि भारत की श्रम भागीदारी की दर (काम करने वाले या काम की तलाश करने वाले) दुनिया में सबसे कम है। दूसरा यह कि निजी खपत, जो अब तक जीडीपी का सबसे बड़ा घटक है, महामारी से पहले के स्तर पर बनी हुई है और इसमें सुधार के कोई संकेत नहीं दिखाती है।

राजनीतिक रूप से तमाम किस्म की हलचलें हैं। जिन राज्यों में विधानसभा चुनाव होंगे उनमें गुजरात, पंजाब, गोवा और उत्तर प्रदेश मुख्य रूप से शामिल हैं। बीजेपी गुजरात में एक चौथाई सदी से पूर्ण या स्थायी बहुमत में है और उत्तर प्रदेश में उसका 40 प्रतिशत से अधिक वोट शेयर है। इसका अर्थ है कि फिलहाल आंकड़ों के हिसाब से बीजेपी को यूपी में सत्ता हासिल हो सकती है। यूपी चुनाव के ठीक बाद इसी साल राष्ट्रपति चुनाव भी है।

इनके अलावा और क्या? सेंट्रल विस्टा का उद्घाटन इस साल किया जा सकता है। साथ ही अयोध्या में मंदिर निर्माण का काफी काम हो जाएगा और कुछेक हिस्सा तो खोल ही दिया जाएगा। इस साल और भी बहुत कुछ वैसा देखने को मिल सकता है जैसा कि हमने काशी में देखा, और कुछ लोगों को यह सब भाता भी है।

इस समय भारत में लंबे समय तक विरोध प्रदर्शन करने वाले दूर-दूर तक नहीं दिख रहे हैं, जोकि 2020 की शुरुआत के बाद पहली बार हुआ है। लेकिन उत्तर पूर्व में सशस्त्र बल विशेषाधिकार अधिनियम (AFSPA) के खिलाफ आवाजें उठ रही हैं और केंद्र सरकार को यह सुनिश्चित करना होगा कि यह सब देश के उस हिस्से में समस्या में न तब्दील हो जो हमेशा से आमतौर पर अशांत रहता है। नागालैंड की विधानसभा (बीजेपी के विधायकों समेत) ने अपने राज्य में इस कानून को जारी रखने के खिलाफ एक सर्वसम्मत प्रस्ताव पारित किया है। केंद्र सरकार अगर इस वोट के बावजूद खुद को वहां थोपने का फैसला करती है तो यह उत्तर पूर्व में लोकतंत्र पर कड़ी टिप्पणी होगी। क्या होता है, हम देखेंगे।


महामारी तो जारी रहेगी, लेकिन हम उम्मीद कर सकते हैं कि अब वह वैसा कहर नहीं बरपाएगी जैसा कि 2020 या 2021 में देखने को मिला। हो सकता है कि इस बात की तरफ लोगों का ध्यान न गया हो, लेकिन महामारी के कारण देश के बच्चों और एक पीढ़ी की शिक्षा को ऐसा नुकसान हुआ है जिसका असर लंबे अर्से तक रहेगा। सवाल है कि आखिर कितने लोगों के पास 'घर से पढ़ाई या सीखने' का इंतजाम या क्षमता है और क्या उनके पास इस सबके लिए जरूरी उपकरण हैं? हकीकत यह है कि बड़ी संख्या में लोगों के पास ये सब नहीं है और उनकी शिक्षा और सीखने के पर गहरा असर पड़ा है जो कि महामारी के साथ आने वाले वक्त में हमारे सामने होगा।

बीते चार साल में यह साल भारत पर हर मोर्चे के लिहाज़ से बहुत मुश्किल भरा रहा है। उम्मीद करें कि 2022 भले ही बहुत कुछ अच्छे दिन न लेकर आए, लेकिन कम से कम तकलीफों में तो कमी हो।

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