नोटबंदीः कितना महंगा पड़ा यह पागलपन?

हर वर्ष अघोषित आय के लगभग आधे धन का निवेश संपत्ति में किया जाता है और लगभग 44-46% का निवेश सोने और आभूषणों में और बाकी को अवैध रूप से विदेश भेज दिया जाता है। सिर्फ 4-6 % ही नकद के रूप में रखा जाता है।

नोटबंदी की घोषणा करते प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी/ फोटो: सोशल मीडिया 
नोटबंदी की घोषणा करते प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी/ फोटो: सोशल मीडिया
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मोहन गुरुस्वामी

2011 के प्यू रिसर्च सर्वे के अनुसार 1955 या उससे पहले पैदा हुए 95% अमेरिकी लोगों का कहना था कि वे ठीक से याद कर बता सकते हैं कि वे उस समय कहां थे या क्या कर रहे थे, जब केनेडी की हत्या हुई थी। किसी घटना का गहरा आघात हमारी यादों में उस दिन को स्पष्टता से उकेर देता है। इंदिरा गांधी की 31 अक्टूबर, 1984 को हुई हत्या ऐसा ही एक और दिन है। हम में से ज्यादातर लोग जो उस समय थे, उस दिन की छोटी से छोटी बात को याद कर सकते हैं। आज भी मैं उस दिन की हर घटना और बातचीत को याद कर सकता हूं। पिछले साल 8 नवंबर को लागू हुई नोटबंदी का दिन भी ऐसा ही दिन बन गया है जो ज्यादातर लोगों के दिलोदिमाग में जिंदा है।

मैं कुछ दोस्तों के साथ सिकंदराबाद में अपने घर पर बैठा हुआ था, जब मैंने सुना कि प्रधानमंत्री देश को संबोधित करने जा रहे हैं।मैं और मेरे दोस्त टीवी के आसपास इकट्ठे हो गए और हमने नरेंद्र मोदी को नोटबंदी की घोषणा करते हुए सुना। उन्होंने कहा, “भाईयों और बहनों, कालाधन और भ्रष्टाचार खत्म करने के लिए हमने तय किया है कि वर्तमान में चल रहे 500 और 1000 रुपये के नोट आज 8 नवंबर 2016 की आधी रात से वैध नहीं रहेंगे।” मेरे पास जितने भी 500 और 1000 रुपये के नोट थे, वे उस दिन मेरी जेब में थे। नोट ज्यादा तो नहीं थे, लेकिन यह बात परेशान कर रही थी कि वे अब किसी काम के नहीं रह गए हैं। मुझे यह भी पता चला कि अब अपने बचत खाते से मैं हर हफ्ते सिर्फ 4000 रुपये निकाल सकता हूं। अचानक से मैंने खुद को न सिर्फ नंगा और निरीह, बल्कि बुरी तरह से अपमानित महसूस किया।

लगातार किए गए शोध से यह सामने आया है कि प्रत्येक वर्ष अघोषित आय के लगभग आधे धन का निवेश संपत्ति में किया जाता है और लगभग 44-46% का निवेश सोने और आभूषणों में और बाकी को अवैध रूप से विदेश भेज दिया जाता है। सिर्फ 4-6 % ही नकद के रूप में रखा जाता है।

उस रात हमारे साथ खाने पर मौजूद एक व्यक्ति ऐसे भी थे, जिनके बारे में हमें पता था कि उनके पास बहुत पैसा है। लेकिन वह थोड़ा सा भी परेशान नहीं नजर आ रहे थे। मैंने उनसे पूछा कि क्या आपको इससे नुकसान होगा? उन्होंने कहा, “आपसे जरा भी ज्यादा नहीं।” फिर उन्होंने कहा, ‘’कुछ चीजें मैं कभी नहीं भूलूंगा। वैसे लोग जिनके पास बहुत सारा दो नंबर का पैसा है,वे मूर्ख बन कर कभी अमीर नहीं बनते। जिस धन पर आयकर का भुगतान नहीं किया गया होता है, उसे हमेशा देश की वित्तीय व्यवस्था की पहुंच से बाहर रखा जाता है।‘’ मुझे पता था कि यह बात सही थी क्योंकि लगातार किए गए शोध से यह सामने आया है कि प्रत्येक वर्ष अघोषित आय के लगभग आधे धन का निवेश संपत्ति में किया जाता है और लगभग 44-46% का निवेश सोने और आभूषणों में और बाकी को अवैध रूप से विदेश भेज दिया जाता है। सिर्फ 4-6 % ही नकद के रूप में रखा जाता है।

सरकार ने अचानक से नोटबंदी कर व्यवस्था में मौजूद नकद का लगभग 87% या 15.44 लाख करोड़ रुपये को सोख लिया। प्रधानमंत्री ने देश को ‘काले धन’ से निजात दिलाने के लिए जब नोटबंदी का ऐलान किया तो सारे देश ने इसका स्वागत किया। यहां काले धन से उनका तात्पर्य वैसी आमदनी और वित्तीय लेन-देन से था जिसके लिए देश को टैक्स का भुगतान नहीं किया गया था। नोटबंदी के लिए सरकार ने एक और वजह यह बताई कि वह नकली नोटों के जाल और आतंकवाद के वित्तपोषण के तंत्र को तोड़ना चाहती थी।

निस्संदेह, 1000 रुपये के नकली नोटों के साथ वास्तव में समस्या थी। 2014-2015 में 22% की दर से बढ़कर इनकी संख्या 6 लाख पहुंच गई। 2015-2016 में पकड़े गए नकली नोटों में 100 के 35%, 500 के 415 और बाकी 1000 के नोट थे।

इस तथ्य को जहन में रखें कि इस साल अप्रैल में 500 के 1646 करोड़ और 100 के 1642 करोड़ नोट चलन में थे। इससे पता चलता है कि इसके मुकाबले नकली नोट बहुत कम संख्या में थे और व्यवस्था को कुछ खास नुकसान भी नहीं पहुंचा रहे थे। उच्च मूल्य के नोटों को व्यवस्थित ढंग से बदलने के लिए बेहतर तरीका ढूंढा जा सकता था। अब आरबीआई ने रिपोर्ट दी है कि पिछले साल की तुलना में वित्त वर्ष 2017 में नकली नोटों की पहचान 20.4 प्रतिशत अधिक रही है। वृद्धि के बावजूद नकली नोटों का कुल मूल्य 42 करोड़ रुपए के बराबर रहा। तो क्या यह बात मुसीबत मोल लेने लायक थी?

यह साफ है कि सरकार ऐसे किसी बड़े ‘सुधार’ के लिए तैयार नहीं थी। जब नोटों की कमी हो गई तो आरबीआई और बैंकों के पास दूसरे मूल्य के इतने नोट नहीं थे जिनसे किसी तरह भी कमी को दूर किया जाए। पूरा राष्ट्र की वित्तीय व्यवस्था चरमरा चुकी थी, इसकी वजह से उन करोड़ों लोगों को तकलीफ झेलनी पड़ी जो रोज कमाते-खाते थे

यह साफ है कि सरकार ऐसे किसी बड़े ‘सुधार’ के लिए तैयार नहीं थी। जब नोटों की कमी हो गई तो आरबीआई और बैंकों के पास दूसरे मूल्य के इतने नोट नहीं थे जिनसे किसी तरह भी कमी को दूर किया जाए। पूरा राष्ट्र की वित्तीय व्यवस्था चरमरा चुकी थी, इसकी वजह से उन करोड़ों लोगों को तकलीफ झेलनी पड़ी जो रोज कमाते-खाते थे या जल्द खराब हो जाने वाले सामानों का व्यापार करते थे। किसानों को भी काफी परेशानी उठानी पड़ी जिन्हें खाद्य पदार्थों, फलों और सब्जियों की रोपाई-कटाई के लिए निवेश करना था।

उच्च मूल्य के नोटों की जगह नए नोट लाने में आरबीआई को कई महीने लग गए। तब तक हाहाकार जारी रहा। इस लंबे हाहाकार का आर्थिक नुकसान तो होना ही था। राजनेता से भी ज्यादा एक बड़े अर्थशास्त्री के रूप में पहचाने जाने वाले पूर्व प्रधानमंत्री डॉ मनमोहन सिंह ने यह हिसाब लगाया था कि इससे देश का जीडीपी 2 फीसदी तक गिर जाएगा। अब वे सही साबित हो चुके हैं। जीडीपी के आधिकारिक आंकड़े इसे पुख्ता कर रहे हैं। नए 500 और 2000 के नोटों में खर्चे हुए लगभग 36 हजार करोड़ के अलावा, जीडीपी में हुए नुकसान की कीमत 3 लाख करोड़ रुपए होंगे। अब ये पैसे कभी भी वापस नहीं आएंगे। यह पूरी तरह एक पागलपन था।

अब देखिए कि इससे कितना बड़ा नुकसान हुआ। भारत में तकरीबन 45 करोड़ लोगों की श्रम शक्ति है। इनमें से सिर्फ 7 फीसदी संगठित क्षेत्र में हैं। संगठित क्षेत्र में 3 करोड़ 5 लाख लोगों में से 2 करोड़ 40 लाख लोग सरकार या सरकार द्वारा संचालित कंपनियों में काम करते हैं, बचे हुए लोग निजी क्षेत्र में कार्यरत हैं। 41.5 करोड़ लोगों को असंगठित क्षेत्र में रोजगार मिला हुआ है जिसमें लगभग आधे लोग कृषि में लगे हुए हैं, और 10-10 फीसदी निर्माण क्षेत्र, लघु उद्योग और खुदरा व्यापार में काम करते हैं। यह मुख्य रूप से रोज कमाने-खाने वाले लोग हैं और इनकी आय सरकार द्वारा घोषित न्यूनतम भत्ते से भी कम है। भले ही देश की अर्थव्यवस्था पूरी तरह नहीं रुकी हो, लेकिन करोड़ों घरों में नोटबंदी के तुरंत बाद चुल्हा नहीं जल रहा था। ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि रोजाना मजदूरी कमाने वालों को काम के पूरे क्या, आधे पैसे भी नहीं मिल रहे थे। और जब उन्हें पुराने नोटों में पैसे मिले भी और वे बैंक में घुस भी गए तो बैंक के पास उन्हें बदलने के लिए नए नोट नहीं थे।

सरकार ने 500 और 1000 के नोटों में मौजूद जिस कथित ‘काले धन’ को खत्म करने की ठानी थी, वे नोट दरअसल रोजमर्रा के लेन-देन में इस्तेमाल होने वाले पैसे थे। सरकार जिस पैसे को ढूंढ़ रही थी, वह व्यापारियों, नेताओं और नौकरशाहों के पास जमा उस पैसे का एक छोटा हिस्सा था। लेकिन उसे सामने लाने की घोषित बेचैनी में सरकार ने पूरी जनता को मुश्किल में डाल दिया।

और जरा इसे देखिए, प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (पिछले साल लगभग 44 करोड़ डॉलर) का कम से कम 55 फीसदी हिस्सा भारतीयों का पैसा है जो टैक्स चोरी से घूम-फिर कर अर्थव्यवस्था में शामिल हो गया। क्या सरकार अब इन ईसीबी से पूछेगी कि उस पैसे का स्त्रोत क्या है?

ऐसी उम्मीद की जा रही थी कि बहुत सारा नकद ‘काला धन’ बैंकों में वापस नहीं आएगा। उन्हें उम्मीद थी कि तकरीबन एक तिहाई नोट वापस नहीं आएंगे जो लगभग 4 लाख करोड़ रुपए होते। उस पैसे से सरकारी बैंकों के नुकसान की भरपाई की जा सकती थी जो बैंकों द्वारा दिए गए कर्ज की वजह से हुआ था। अक्टूबर में जारी आरबीआई की सालाना रिपोर्ट के मुताबिक, 98.96 फीसदी 500 और 1000 के पुराने नोट बैंकों में वापस आ गए।

इस आर्थिक हादसे का पूर्वानुमान लगाने में असफल प्रधानमंत्री ने एक नया गीत गाना शुरू कर दिया। उन्होंने चीखना शुरू किया कि वे गरीबों की एक बहुत बड़ी आबादी के लिए लड़ रहे हैं जिन्हें उच्च वर्ग के द्वारा दशकों के लूटा गया है। उन्होंने उच्च वर्गों का चरित्र हनन किया और एक वर्ग-युद्ध की पहली गोली चला दी। सौभाग्य या दुर्भाग्य से उनके सबसे बड़े समर्थक वे लोग हैं जिनके पास सबसे ज्यादा ‘काला धन’है।

नोटबंदी के बाद के दिनों में मोदी सरकार एक अप्रत्याशित लाभ का हवाला देने लगी। ऐसी उम्मीद की जा रही थी कि बहुत सारा नकद ‘काला धन’ बैंकों में वापस नहीं आएगा। उन्हें उम्मीद थी कि तकरीबन एक तिहाई नोट वापस नहीं आएंगे जो लगभग 4 लाख करोड़ रुपए होते। उस पैसे से सरकारी बैंकों के नुकसान की भरपाई की जा सकती थी जो बैंकों द्वारा दिए गए कर्ज की वजह से हुआ था। अक्टूबर में जारी आरबीआई की सालाना रिपोर्ट के मुताबिक, 98.96 फीसदी 500 और 1000 के पुराने नोट बैंकों में वापस आ गए। प्रतिबंधित नोटों में तकरीबन 15.28 लाख रुपए के नोट आरबीआई को मिल गए। 15.44 लाख रुपए के अवैध नोट 8 नवंबर 2016 तक बाजार में थे। इससे साफ है कि नोटबंदी का पूरा उद्देश्य ही असफल हो गया और यह पूरा कदम अर्थव्यवस्था के साथ एक भीषण छेड़छाड़ से कम नहीं था।

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