क्या कहती है बारिश में 15% की कमी?
आंकड़े बताते हैं कि देश के 734 में से 342 जिलों में बारिश ‘कम’ या ‘बेहद कम’ हुई है। इनमें से 303 जिलों में सामान्य से कम और 39 में भारी कमी दर्ज की गई है। मानसून की 15 फीसदी राष्ट्रीय कमी के पीछे छिपे ग्रामीण भारत में गहराते आजीविका संकट की पड़ताल।

वर्ष 2025 में समस्या बेतहाशा बारिश की थी। दक्षिण-पूर्वी और मध्य महाराष्ट्र में मूसलाधार बारिश और बाढ़ के तांडव ने हजारों हेक्टेयर फसलें तबाह कर दी थीं। घर मलबे में तब्दील हो गए थे, बड़ी संख्या में मवेशी बह गए थे और हजारों परिवार बर्बादी के कगार पर पहुंच गए थे। ठीक एक साल बाद, उसी इलाके के वही गांव बिल्कुल उलट और भयावह तस्वीर पेश कर रहे हैं।
राज्य के मराठवाड़ा क्षेत्र के धाराशिव जिले की ही मिसाल लीजिए। जून और जुलाई में सामान्य बारिश के बाद अगस्त में सामान्य की तुलना में महज 27.9 प्रतिशत बारिश हुई, और 20 सितंबर तक तो यह आंकड़ा गिरकर सिर्फ 3.7 प्रतिशत पर सिमट गया। ऐन उस वक्त जब जिले की मुख्य नकदी फसल सोयाबीन में फूल आ रहे थे और फलियां बन रही थीं, आसमान से बादल गायब हो गए। कुल मिलाकर इस पूरे सीजन में जिले में दीर्घावधि औसत (603.1 मिमी) की तुलना में महज 310.7 मिमी बारिश दर्ज की गई यानी करीब 50 फीसदी की कमी। पिछले 80 दिनों से जिले की धरती पर बारिश की एक बूंद तक नहीं टपकी।
इसके नतीजे दिल दहला देने वाले हैं: भूजल स्तर सात मीटर से ज्यादा नीचे चला गया है, जो पांच साल के औसत स्तर से भी कहीं नीचे है। राजस्व अधिकारियों का प्राथमिक अनुमान है कि 80 से 85 प्रतिशत फसलें पूरी तरह बर्बाद हो चुकी हैं। किसान सूखे सोयाबीन के पौधों को चारे के रूप में इस्तेमाल करने को मजबूर हैं।
अकेले धाराशिव का दर्द नहीं
भारत से दक्षिण-पश्चिम मानसून विदा हो रहा है, और राष्ट्रीय स्तर पर बारिश में 15 प्रतिशत की कमी का अनुमान है। लेकिन यह औसत आंकड़ा संकट की उस भयावह गहराई को बिल्कुल उजागर नहीं करता जो जमीन पर पसरी है।
मौसम विभाग के 1 जून से 30 सितंबर तक के जिलेवार आंकड़े बताते हैं कि देश के 734 में से 342 जिलों में बारिश ‘कम’ (-20 से -59%) या ‘बेहद कम’ (-60 से -99%) हुई है। इनमें 303 जिलों में सामान्य से कम और 39 जिलों में भारी कमी दर्ज की गई। केवल 305 जिलों में बारिश सामान्य (-19 से +19%) दर्ज हुई है। यानी, आधे भारत ने एक बेहद खराब मानसून का दंश झेला है और देश का एक बहुत बड़ा हिस्सा सूखे और बदहाली को झेल रहा है।
ताजा संकेतों के मुताबिक, दक्षिणी प्रायद्वीप में औसतन 29 प्रतिशत बारिश की कमी का संकट है, जहां आंध्र प्रदेश सबसे बुरी मार (-43%) झेल रहा है। पूर्वी और पूर्वोत्तर भारत में 25 प्रतिशत की औसत कमी का अनुमान है, जिसमें पूर्व में बिहार (-36%) और पूर्वोत्तर में मेघालय (-59%) सबसे ज्यादा प्रभावित हैं। पंजाब, जिसने पिछले साल मूसलाधार बारिश और अचानक आई बाढ़ का कहर देखा, वहां इस बार 40 प्रतिशत तक बारिश की कमी का अंदेशा है।
मौसम विभाग के अनुसार महाराष्ट्र में मानसूनी बारिश की कुल कमी लगभग 17 प्रतिशत दिखती है। लेकिन हकीकत यह है कि राज्य के कुल 36 जिलों में से 20 जिले 'भारी कमी' वाली श्रेणी में दर्ज हैं। मराठवाड़ा के आठ जिलों में सामान्य से 30 से 50 प्रतिशत कम बारिश हुई है। यह वही इलाका है जहां औसत सालाना बारिश पहले ही महज 550 मिमी के आसपास रहती है। पश्चिमी विदर्भ का कपास बेल्ट भी प्यासा रह गया- यहां बारिश 30-40 प्रतिशत कम दर्ज की गई, और अगस्त महीने में 50 से 85 प्रतिशत की कमी ने कमर तोड़कर रख दी। लिहाजा, राष्ट्रीय औसत और महाराष्ट्र जैसे आंकड़े भले स्थिति को नियंत्रण में दिखाएं, लेकिन जब आप जिलों और तहसीलों को देखें, तो जमीनी हकीकत होश उड़ाने वाली है। इस संकट का सीधा असर खेती-किसानी की अर्थव्यवस्था पर पड़ रहा है। मानसून की यह बेरुखी आने वाले रबी (सर्दियों) की बुवाई को भी प्रभावित करेगी।
मानसून की नाकामी का पहला आर्थिक झटका नकदी के गहरे संकट के रूप में सामने आता है। बारिश पर निर्भर फसलों के लिए इसका मतलब है-पैदावार में गिरावट, सिंचाई और खाद-बीज पर अधिक लागत, खेत पर उपज के औने-पौने दाम और सीजन के शुरू में लिए गए फसली कर्ज को चुकाने में घोर लाचारी। समूचे भारत में किसान इस वक्त हाथ खाली होने के भयानक संकट से जूझ रहे हैं।
इसके बाद कर्ज का संकट गहराता है। खरीफ सीजन के शुरू में साहूकार या बैंक से कर्ज लेने वाले किसान को फसल मरे या जिए, कर्ज चुकाना ही पड़ता है। अगर फसल चौपट हो गई, तो किसान परिवार पिछला कर्ज चुकाने के लिए तो हाथ-पांव मारेगा ही, अगली फसल की लागत जुटाने के लिए भी मोहताज हो जाएगा। यह संकट सिर्फ किसान परिवार की नहीं। फसलें बर्बाद होने या पैदावार घटने से ग्रामीण दिहाड़ी मजदूरों के काम के अवसर भी छिन जाते हैं।
पूरे देश में यही ढांचा दोहराया जा रहा है, हालांकि कुछ फसलों पर इसकी मार कहीं ज्यादा विनाशकारी है। महाराष्ट्र, तेलंगाना और कर्नाटक की सोयाबीन और कपास पट्टियां भारी संकट में हैं। ऐसे ही महाराष्ट्र, कर्नाटक, तेलंगाना, आंध्र, राजस्थान और मध्य प्रदेश में दालों की फसलें दम तोड़ रही हैं। कई दक्षिणी और पूर्वी राज्यों में धान की रोपाई और फसल गहरे दबाव में है।
चावल का उत्पादन देश के सामने सबसे स्पष्ट खतरे की घंटी बजा रहा है। रॉयटर्स की एक रिपोर्ट के मुताबिक, 2026 में भारत के चावल उत्पादन में लगभग 1 करोड़ टन की कमी आ सकती है, जो दो दशकों की सबसे बड़ी गिरावट होगी। अगस्त में खाद्य मुद्रास्फीति पहले ही 5.95 प्रतिशत पर पहुंच चुकी थी। कमजोर मानसून और उत्पादन में गिरावट खाने-पीने की चीजों की कीमतों में आग लगाएगी।
17 सितंबर तक के आंकड़ों के मुताबिक, केन्द्रीय जल आयोग की निगरानी वाले 178 प्रमुख जलाशयों में पानी घटकर 131.17 अरब घन मीटर रह गया है। यह पिछले साल इसी अवधि के जलस्तर से 21 प्रतिशत कम है और पिछले 10 वर्षों के औसत से लगभग 9 प्रतिशत नीचे।
आईआईटी गांधीनगर के ‘इंडिया ड्रॉट मॉनीटर’ द्वारा बारिश और अन्य जल-जलवायु संकेतकों के आधार पर किए गए सूखे के आकलन से पता चलता है कि भारत का 53.2 प्रतिशत भू-भाग किसी न किसी स्तर के सूखे की चपेट में है। इसमें से 33.4 प्रतिशत इलाका मध्यम या उससे बदतर सूखे में है, 15.4 प्रतिशत हिस्सा गंभीर सूखे का सामना कर रहा है और 3.8 प्रतिशत भू-भाग अत्यंत गंभीर सूखे की आग में झुलस रहा है।
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इस बीच एक और कयामती घड़ी लगातार टिक-टिक कर रही है। 16 सितंबर को 188 पारिस्थितिकीविदों और पर्यावरण वैज्ञानिकों के समूह ने अपने साथियों, वित्तपोषक संस्थाओं और सरकारी एजेंसियों को 2026-27 में आने वाले तथाकथित ‘सुपर अल नीनो’ के मद्देनजर देशभर में अत्यधिक गर्म और शुष्क मौसम, समुद्री हीटवेव और जंगलों, घास के मैदानों, मीठे पानी के स्रोतों तथा तटीय पारिस्थितिकी तंत्र में व्यापक विनाश की आशंका जताई है।
वैज्ञानिकों का कहना है कि प्रशांत महासागर की सतह का तापमान अगस्त में सामान्य से 2.6 डिग्री सेल्सियस अधिक दर्ज किया गया, और उनका अनुमान है कि यह तापमान विसंगति 4 डिग्री सेल्सियस तक जा सकती है- जो पिछले 1,000 वर्षों के ऐतिहासिक स्तर को भी पार कर जाएगी।
यह समझना जरूरी है कि ये वैज्ञानिकों के अनुमान हैं, और ‘सुपर अल नीनो’ कोई ऐसा औपचारिक पैमाना नहीं जिसे भारतीय मौसम विभाग अपने काम में इस्तेमाल करता हो। लेकिन यह चेतावनी एक अन्य कारण से अहम है: वैज्ञानिकों का मानना है कि इसके मुख्य प्रभाव नवंबर 2026 से शुरू होकर 2027 तक खिंचेंगे, यानी अगले साल मानसून की वापसी के काफी समय बाद तक। वैज्ञानिकों के अनुसार हिन्द महासागर द्विध्रुव, जिसे ‘इंडियन नीनो’ भी कहते हैं, अल नीनो के प्रभाव को भड़का भी सकता है या कमजोर भी कर सकता है, और इसका असर अलग-अलग भौगोलिक क्षेत्रों में अलग-अलग होगा।
वैज्ञानिकों ने आगाह किया गया है कि घास के मैदानों, सवाना और शुष्क पर्णपाती जंगलों में दावानल और सूखे के कारण बायोमास और पेड़ों के जीवित रहने की क्षमता में भारी गिरावट आ सकती है। अधिक ऊंचाई वाले इलाकों में कम बारिश का मतलब होगा जंगली और पालतू मवेशियों के लिए चारे की किल्लत। शहरों का कंक्रीट का ताप पेड़ों और वनस्पति पर इस मार को और गहराएगा।
पर्यावरण विज्ञानी अपील कर रहे हैं कि संकट पूरी तरह गहराने से पहले इसके जमीनी प्रभाव का एक साझा ढांचा तैयार किया जाए। भारत के मौजूदा सूखे के नक्शे यह तो बताते हैं कि बारिश की कमी का संकट कहां सघन है, लेकिन यह नहीं बताते कि अगले छह महीनों में फसलों की पैदावार, मवेशियों, जंगलों, खेतिहर मजदूरों, पानी की उपलब्धता और ग्रामीण आजीविका का क्या हश्र होने वाला है।
केन्द्र और राज्य सरकारों द्वारा फसल नुकसान के आकलन 5 अक्टूबर से आने शुरू होंगे, लेकिन सरकारी राहत की फूटी कौड़ी भी अगर पहुंची, तो वह बहुत देर से और ऊंट के मुंह में जीरे के समान ही होगी।
