क्या है पर्यावरण के प्रति बेरुखी का सबब?

वित्तमंत्री ने बजट में पर्यावरण को उपेक्षित कर हिमालयी राज्यों की देश सेवा को उपेक्षित किया 

पर्यावरण से बेरुखी का सबसे ज्यादा खामियाजा पहाड़ी राज्य भुगत रहे हैं
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अभय शुक्ला

हमारे सालाना बजट में पर्यावरण संरक्षण को कभी भी प्राथमिकता नहीं दी गई। सभी वित्त मंत्रियों ने इसे हल्के में लिया और इसे ऐसी चीज माना ही नहीं जिसे स्थायी तरीके से पोषित करना और बड़ी ही सावधानी के साथ इस्तेमाल करना जरूरी है। इसके बजाय इसे एक असीमित संसाधन माना जिसका बस दोहन करते रहो। जुलाई 2014 में भी मैंने ब्लॉग में 2014 के बजट में पर्यावरण की उपेक्षा की ओर ध्यान दिलाया था। 

तब से 11 साल बीत चुके हैं लेकिन योजना की यह खामी अब भी बरकरार है, बेशक तेजी से हो रहे जलवायु परिवर्तन के साथ इसमें एक और आयाम जुड़ गया हो। अब जलवायु परिवर्तन के असर को कम करने के लिए सरकारी फंडिंग ही पर्याप्त नहीं, बल्कि इससे सीधे तौर पर प्रभावित होने वाले लोगों - गरीब किसानों, जमीनहीन मजदूरों, मछुआरों, खानाबदोश जनजातियों - का पुनर्वास भी जरूरी विषय हो गया है। बदकिस्मती से (और जैसा अंदाजा भी था) यह बजट, पहले की तरह, इस दिशा में कुछ नहीं करता।

कुछ समय पहले जारी आर्थिक सर्वेक्षण 2026 से इस संदर्भ में कुछ ठोस की उम्मीद थी। लेकिन इसमें, मुख्य आर्थिक सलाहकार पर्यावरण की कीमत पर बेरोकटोक विकास और नव उदारवाद की तरफदारी करते दिखे। तमाम विज्ञान को धता बताते हुए वह कहते हैं कि कार्बन उत्सर्जन कम करना हमारी शीर्ष प्राथमिकता नहीं होनी चाहिए, और ‘3 डिग्री सेल्सियस की दुनिया रहने लायक होगी’(!) सारे सबूतों और वैश्विक वैज्ञानिक सहमति को गलत साबित करते हुए, वह कहते हैं कि ‘विकास और खुशहाली से लचीलापन बढ़ता है और कमजोरी घटती है..’, जो भारत में नहीं हो रहा है।

अगर आर्थिक सलाहकार ने दावोस में साथी अर्थशास्त्री (बिना किसी राजनीतिक भेदभाव के), गीता गोपीनाथ की बातों पर ध्यान दिया होता, तो वह समस्या को बेहतर समझ पाते, और यह भी कि वह कितने गलत हैं।

यह सरकार सीआईडी (कम्पल्सिव इंफ्रास्ट्रक्चर डिसऑर्डर) के गंभीर रोग से जूझ रही है; कैपेक्स ठीक है और विकास के लिए जरूरी भी, लेकिन पर्यावरण भी उतना ही जरूरी है। तेज इंफ्रास्ट्रक्चर विकास की बड़ी पर्यावरणीय कीमत होती है। विश्व बैंक-मुद्रा कोष का अंदाजा है कि यह हमारी जीडीपी का 3.5-5 फीसद है, जो तकरीबन 200 अरब डॉलर या 180,000 करोड़ रुपये के बराबर है।


2026-27 के बजट में चार दक्षिणी राज्यों में खनिज कॉरिडोर (दुर्लभ खनिज के लिए) बनाने, तीन और हाई-स्पीड रेल कॉरिडोर, भारत की समुद्री सीमा में मछली वगैरह पकड़ने पर शून्य शुल्क, डेटा सेंटर बनाने के लिए टैक्स में छूट का बड़े गर्व से जिक्र किया गया है, लेकिन इसकी कोई बात नहीं है कि इनसे पर्यावरण पर पड़ने वाले असर को कैसे ठीक या कम किया जाएगा। क्या ये कॉरिडोर जरूरी हैं, यह देखते हुए कि पूरे देश में बड़ी संख्या में एक्सप्रेस-वे बन रहे हैं? इनके लिए बड़े पैमाने पर जमीन का अधिग्रहण होगा और लोगों को दूसरी जगह जाना पड़ेगा, जिससे आजादी के बाद 6 करोड़ ‘परियोजना शरणार्थियों’ की तादाद और बढ़ जाएगी। लाखों पेड़ (और मैंग्रोव, क्योंकि दुर्लभ खनिज अमूमन तटीय इलाकों में पाए जाते हैं) काटे जाएंगे।

समुद्री मछली पालन को बढ़ावा देना अच्छा है, लेकिन पारंपरिक मछुआरों की रोजी-रोटी को बचाने और उनकी जगह मशीन वाले ट्रॉलर न ले लें या ज्यादा मछली पकड़ने पर रोक लगाने वाले इंतजाम नहीं किए गए। डेटा सेंटर्स को बहुत ज्यादा बिजली-पानी की जरूरत होती है - पानी की कमी वाले देश में यह कैसे होगा?

जैसा कि ऊपर बताया गया है, अलग-अलग कॉरिडोर से पर्यावरण को खासा नुकसान होगा। वन संरक्षण अधिनियम, पर्यावरण संरक्षण अधिनियम, वन्यजीव संरक्षण अधिनियम जैसे नियमों को कमजोर करने और नियामक संस्थाओं को दंतहीन बनाने से इस तरह की परियोजनाओं पर बेधड़क आगे बढ़ने की ही संभावना ज्यादा है। 

इन परियोजनाओं के बुरे असर को कम करने और उसकी भरपाई के लिए हजारों करोड़ रुपये की जरूरत होगी, लेकिन वित्तमंत्री ने इस बारे में एक शब्द भी नहीं कहा कि इसके लिए फंड कैसे आएगा, कौन खर्च करेगा। यह चुप्पी और इस मामले में स्पष्टता न होना राज्यों पर खर्च को डालने की सोची-समझी रणनीति लगती है: राजनीतिक श्रेय और वित्तीय फायदे केन्द्र को मिलेंगे, लेकिन सामाजिक और बजटीय कीमत राज्यों को उठानी होगी - यह संघीय अवधारणा की नई ही व्याख्या है!

आखिर में, ऐसा लगता है कि 16वां वित्त आयोग भी इस देश की सभी तथाकथित स्वायत्त संस्थाओं की तरह केन्द्र सरकार के साथ कदम से कदम मिलाकर चल रहा है। क्योंकि हिमालयी राज्य पानी, साफ हवा, कार्बन सोखने के रूप में जो देश की पर्यावरणीय सेवा कर रहे हैं, उसके लिए मुआवजे के उनके अधिकार को पूरी तरह नजरअंदाज कर दिया गया है।


इन राज्यों ने, जिन्हें कई एडवोकेसी समूहों का साथ मिला, 2026-2031 के पांच साल के दौरान 50,000 करोड़ रुपये के ग्रीन बोनस की मांग की थी। यह न सिर्फ सही मुआवजा होता, बल्कि इन फंड्स से उनके जंगलों, नदियों, खनिज और पर्यावरण संभावनाओं के बेरोकटोक दोहन के बिना उनकी विकास जरूरतें पूरी हो जातीं। कोई बेवकूफ भी देख सकता है कि हिमालय (और अरावली और पश्चिमी घाट जैसी दूसरी पर्वत श्रृंखलाओं) का अंधाधुंध ‘विकास’ देश के हित में नहीं और इसलिए इन पहाड़ी राज्यों को ऐसा न करने के लिए बढ़ावा दिया जाना चाहिए।

लेकिन 16वां वित्त आयोग इस सामान्य-सी सच्चाई को समझ नहीं सका। शुरुआती रिपोर्टें बताती हैं कि उन्होंने कोई ग्रीन बोनस नहीं दिया है; न ही पर्यावरण पर पड़ने वाले असर को कम करने या आपदा राहत के लिए कोई विशेष अनुदान (जो अब पूरी तरह राजनीतिक हो गया है) दिया है। उन्होंने बस जंगलों की परिभाषा के साथ छेड़छाड़ की है, जो न सिर्फ वित्तीय संदर्भों में बेमतलब है, बल्कि इससे भी बुरी बात यह है कि आयोग ने अब राजस्व घाटा अनुदान (आरडीजी) बंद कर दिया है, जो इन राज्यों को 1974 से मिल रहा था और इस वजह से उनकी माली हालत पर खासा असर पड़ा है। अब उनके पास अपनी विकास गतिविधियों के लिए पैसे जुटाने के लिए हिमालय के नाजुक पर्यावरण को बर्बाद करते रहने के अलावा विकल्प नहीं होगा।

इस साल के बजट से भाजपा को फायदा होता है या नहीं, यह एक बहस का सवाल है; लेकिन जो बहस का सवाल नहीं है, वह यह है कि हमारी योजना और फंडिंग प्रक्रिया में पर्यावरण की ‘आपराधिक अनदेखी’ बदस्तूर जारी है। निर्मला सीतारमण और वित्त आयोग में उनके ‘को-पायलट’ ने हमें पर्यावरण पतन और कुछ राज्यों के वित्तीय पतन के थोड़ा और करीब ला दिया है।

-अभय शुक्ला सेवानिवृत्त आईएएस अधिकारी हैं।

 यह https://avayshukla.blogspot.com से लिए उनके लेख का संपादित रूप है।