संप्रभुता समर्पण की कितनी कीमत चुकाएंगे हम?

अकारण नहीं कि अमेरिका से एकतरफा व्यापार समझौते को लेकर राहुल गांधी प्रधानमंत्री से पूछ रहे हैं कि 'क्या आपको भारत माता को बेचने में शर्म नहीं आती?' वह ठीक ही कहते हैं कि हम उनकी आंखों में डर देख सकते हैं।

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कृष्ण प्रताप सिंह

लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी यों ही नहीं कहते कि नरेन्द्र मोदी सरकार ने भारतमाता को बेच दिया है और देश की संप्रभुता का पूर्ण समर्पण करके उसकी रणनीतिक स्वायत्तता और निर्णय लेने की शक्ति अमेरिका के हाथों में सौंप दी है, जिसका अमेरिका इस्तेमाल भी कर रहा है।

इस समर्पण के संकेत इस सरकार द्वारा अमेरिका से किए गए एकतरफा व्यापार समझौते से बहुत पहले, पिछले साल ही, मिलने लगे थे और कुछ लोगों को छोड़कर (जिन्हें सब कुछ देखकर भी कुछ भी देखना और स्वीकारना गवारा नहीं था) सबको साफ-साफ दिख रहे थे। 

निस्संदेह, यह समर्पण एक दो दिनों या महीनों में पूरा नहीं हुआ। देशवासियों को इसका पहला बड़ा अनुभव पिछले साल फरवरी में हुआ, जब अमेरिका ने तीन बार में वहां रह रहे साढ़े तीन सौ से ज्यादा भारतीय प्रवासियों को नृशंसतापूर्वक अपनी सेना के विमानों में मवेशियों की तरह लादकर हमारी धरती पर वापस ला पटका। मोदी सरकार इसे लेकर औपचारिक विरोध भी दर्ज नहीं करा पाई थी। 

फिर 6-7 मई की रात शुरू हुए आपरेशन सिंदूर के दौरान इसका एक और तल्ख अनुभव हुआ, जब पाकिस्तान से अचानक हुए युद्धविराम की भारत से पहले अमेरिका के राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप ने घोषणा की और बार-बार उसका श्रेय लेते रहे।   

अब व्यापार समझौते के बाद तो वह यह तक तय करने लगा है कि भारत किस देश से तेल और गैस खरीदेगा। ईरान से युद्ध के बीच उसने कुछ इस अंदाज में भारत पर दया-सी दिखाते हुए रूस से तेल खरीदने की 30 दिनों की 'अनुमति' दी है, जैसे भारत उसकी मर्जी का मोहताज हो।

जहां तक व्यापार समझौते की बात है, उसकी शर्तों के तहत न सिर्फ भारत की ऊर्जा एवं डेटा की सुरक्षा से समझौता हुआ है, बल्कि अमेरिकी कृषि उत्पादों के भारतीय बाजार में आने से उसके छोटे किसानों और कपड़ा उद्योग पर बुरा असर पड़ना अवश्यंभावी हो गया है।

सबसे बड़ी समस्या यह है कि अवैध भारतीय प्रवासियों को हथकड़ियों-बेड़ियों और जंजीरों में जकड़कर भारत वापस भेजने के वक्त से ही मोदी सरकार को याद नहीं रह गया है कि उसके पास रीढ़ की कोई हड्डी भी है। न उसे निर्गुट आंदोलन के संस्थापक रहे भारत के आत्मसम्मान की फिक्र रह गई है, न इसकी कि मोदी की रीढ़हीनता भारत को ‘विश्व गुरु’ बनाने की बार-बार हांकी जाने वाली उनकी डींग का खोखलापन उजागर करने में भी कोई कसर नहीं छोड़ रही।


गौरतलब है कि ट्रंप के पिछले कार्यकाल से ही उनसे गहरी मित्रता का दावा करते आ रहे मोदी को भारतीयों से इतने बुरे अमेरिकी सलूक के बावजूद इस मित्रता पर कोई आंच आने देना गवारा नहीं हुआ था, न ही उस पर तनिक भी लज्जा आई थी। 

उन्होंने ट्रंप के अमेरिकी 'अंधराष्ट्रवाद' (जिसे ट्रंप ने पिछली दफा ही ‘अमेरिका फर्स्ट’ तक पहुंचा दिया था) के जोर-जोर से बज रहे ढोल के इस बड़े पोल को समझने से भी साफ इनकार कर दिया था कि चूंकि बीती शताब्दी के आखिरी दशक में भूमंडलीकरण और उदारीकरण की नीतियों को एकतरफा रूप देकर अपने प्रभुत्व के विस्तार के लिए इस्तेमाल करने की बदनीयत अमेरिकी कोशिशें अब उसके बहुत काम आती नहीं दिख रहीं, इसलिए उसे फिर से संरक्षणवाद की जरूरत महसूस होने लगी है।

मोदी अभी भी यह नहीं ही समझते कि ट्रंप का ‘अमेरिका फर्स्ट’ का नारा उनके देश की इसी जरूरत को पूरा करने का उपक्रम था, जिसे अपने नए कार्यकाल में वह नए सिरे से अमली जामा पहना रहे हैं। ये नीतियां इस अर्थ में एकतरफा थीं और हैं कि इनके तहत जानबूझकर सिर्फ अमीर देशों की पूंजी के भूमंडलीकरण यानी मुक्त प्रवाह का मार्ग प्रशस्त किया गया और गरीब या विकासशील देशों की श्रम शक्ति के रास्ते में नए रोडे डालकर उसकी पुरानी बदहाली को और बढ़ा दिया गया।

इसका नतीजा यह है कि बड़ी पूंजी इतनी उन्मुक्त और निरंकुश हो गई है कि देशों की सीमाएं भी उसकी उड़ान में बाधक नहीं रह गई हैं और वह उनके हर तरह के अतिक्रमण के लिए आजाद है। इतना ही नहीं, उन देशों में मनचाही सरकारें बनवाने या उनकी राजसत्ता का अतिक्रमण करने की हिमाकतें भी उसके बायें हाथ का खेल हो गई हैं। इन अतिक्रमणों से सर्वनाशी युद्ध छिड़ जाए, विश्वयुद्ध का अंदेशा गहरा जाए या किसी देश का सामाजिक ताना-बाना बिखरने या टूटने लगे तो उसकी और उसकी संरक्षक सत्ताओं की बला से‌।

दूसरी ओर अमीर देशों ने अपने देश के सामाजिक ताने-बाने की रक्षा के नाम पर अपनी सीमाओं में श्रम शक्ति के मुक्त प्रवाह पर वांछित-अवांछित ढेरों पाबंदियां आयत कर रखी हैं। इसे यों समझ सकते हैं कि उन्होंने पूंजी निवेशकों की दिग्विजय करा दी है और श्रमिकों के समक्ष उसकी अधीनता स्वीकार करने के अलावा कोई विकल्प नहीं रहने दिया है। स्थिति यह है कि निवेशकों के लिए हर देश में हर समय और हर हाल में गलीचे बिछे हुए हैं और उनकी सारी शर्तें स्वीकार कर उनकी अगवानी की जा रही हैं। लेकिन जिनके पास बेचने के लिए सिर्फ उनका श्रम है, वे शरणार्थियों से भी बुरा बर्ताव झेलने को अभिशप्त है। 

अपना सब कुछ दांव पर लगाकर दूसरे देशों में जाना चाहें तो उन्हें वहां तो नाना प्रकार के अत्याचारों और शोषणों का सामना करना ही पड़ता है, उनके अपने देश में भी लंबे संघर्षों से अर्जित उनके अधिकारों में निवेशकों के लिए सुविधाजनक कटौतियों में कुछ अनुचित नहीं समझा जाता।


ऐसे कठिन समय में मोदी सरकार का दायित्व था कि वह यह स्थिति बदलने के लिए अंतरराष्ट्रीय मंचों पर आवाज उठाती और दुनिया भर में अपने श्रमिकों की बेहतरी सुनिश्चित करती। लेकिन उसने अपने देश में भी सारे श्रम कानूनों को मिलाकर ऐसी श्रम संहिता बना दी, जो पूरी तरह बड़ी या बहुराष्ट्रीय कंपनियों के हितों के लिए अनुकूलित और श्रमिकों द्वारा कठिन संघर्ष करके हासिल की गई सुरक्षाएं घटाने या न्यूनतम करने वाली है।

इसके चलते 1991 में भूमंडलीकरण और उदारीकरण की नीतियों की अगवानी के वक्त उनके जिस मानवीय चेहरे की बात की जाती थी, अब उसका कहीं कोई अता-पता ही नहीं है! सोचिए जरा, जो निवेश लालायित सरकार निवेशकों की शर्तें मानकर अपने देश में श्रमिकों के अधिकारों में कटौती कर डाले, वह कल्पना भी कैसे कर सकती है कि बेरोजगारी के मारे उसके देश के श्रमिक थोड़ी बेहतरी की तलाश में 'अवैध रूप से' अमेरिका में जा घुसेंगे तो वह उनसे किसी सभ्य लोकतांत्रिक देश की तरह पेश आएगा? वह तो तभी इस तरह पेश आ सकता था, जब भारत की सरकार अपनी रीढ़ की हड्डी गिरवी रखने के बजाय अपने रवैये से यह संकेत देती कि वह उसकी बदनीयत नीतियों के प्रतिरोध का हौसला रखती है और किसी भी कीमत पर उनको स्वीकार नहीं करने वाली।

लेकिन यहां तो नरेन्द्र मोदी सरकार ऐसा जता रही है जैसे वह समझ ही नहीं पा रही कि करे तो क्या करे। तभी तो प्रवासियों की वापसी से पहले अमेरिका गए भारतीय विदेश मंत्री एस. जयशंकर से अमेरिकी विदेशमंत्री ने कहा कि वह 'अवैध भारतीय प्रवासियों को ले जाएं' तो वह सुनकर चुपचाप चले आए और उनसे यह भी कहते नहीं बना कि हां, हम उनकी सम्मानपूर्वक वापसी सुनिश्चित करेंगे। यह तब की बात है जब वह प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के लिए ट्रंप के शपथग्रहण समारोह के निमंत्रण का जुगाड़ करने अमेरिका गए थे।

कौन जाने वह यह सोचकर पस्तहिम्मत हो गए हों कि उन्होंने मुंह खोला तो महाशक्ति अमेरिका आगे और कठिन मोर्चे खोल देगा।  आखिरकार हमारी सीमा में घुसे चीन की बाबत वह पहले ही यह कहकर असहायता जाहिर कर चुके थे कि वह भारत से बड़ी अर्थव्यवस्था है। क्या पता कि ऐसा कहते हुए उनको तनिक भी शर्म आई थी या नहीं।


अकारण नहीं कि अमेरिका से एकतरफा व्यापार समझौते को लेकर राहुल गांधी प्रधानमंत्री से पूछ रहे हैं कि 'क्या आपको भारतमाता को बेचने में शर्म नहीं आती?' फिर कोई उत्तर न पाकर वह ठीक ही कहते हैं कि प्रधानमंत्री सामान्य परिस्थितियों में भारत को नहीं बेचेंगे। वह इसलिए बेच रहे हैं कि अमेरिकी उनका गला घोंट रहे हैं और उनकी गर्दन पर जकड़ बना रखी है। हम प्रधानमंत्री की आंखों में इसका डर देख सकते हैं। 

राहुल के अनुसार इसके पीछे दो बातें हैं - पहली एपस्टीन, जिसकी तैंतीस लाख फाइलें अभी भी बंद हैं। दूसरी यह कि मोदी पर भारतीय उद्योगपति गौतम अडानी के हितों की रक्षा करने और भाजपा की 'वित्तीय संरचना' को बचाने की जिम्मेदारी है। 

ऐसे में सबसे बड़ा सवाल है कि देश के रूप में हम इस संप्रभुता समर्पण की कीमत कब तक चुकाएंगे? और चुकाते जाएंगे तो अनेक बलिदानों से हासिल हमारी आजादी का क्या होगा?

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