टूटा जब दिल्ली का ख्वाब, तो सियासी रूह की कीमत पर कुर्सी बचा ली नीतीश ने

दिल्ली की गद्दी पर बैठने का नीतीश का ख्वाब जब-तब टूटता ही रहा है, और इस बार भी ऐसा ही हुआ। जैसे ही उन्हे एहसास हुआ कि 'दिल्ली दूर अस्त', तो उन्होंने सियासी रूह की कीमत चुकाकर बिहार में अपनी कुर्सी बचा ली।

यह तस्वीर अप्रैल 2019 की है। (फोटो - Getty Images)
यह तस्वीर अप्रैल 2019 की है। (फोटो - Getty Images)
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ज़फ़र आग़ा

सत्ता में सदा बने रहने की लालसा आधुनिक नेताओं का एक अनिवार्य गुण बनता जा रहा है। बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार इस नई राजनीति के सबसे बड़े उदाहरण हैं। पिछले लगभग दो दशकों में नीतीश कुमार ने इस राजनीति को हथिया लिया है। चाहे कभी बिहार के सबसे बड़े नेता लालू यादव हों या बिहार एवं देश का नेतृत्व बीजेपी- दोनों यह समझ चुके हैं कि बिहार में राजनीति करनी है, तो नीतीश के बिना बात बन ही नहीं सकती। तभी तो दोनों नीतीश का साथ पाकर ही सत्ता हासिल कर पाते हैं। नीतीश इसे भलीभांति समझ चुके हैं। इसीलिए जब जो उनको सत्ता में बनाए रख सकता है, वह उसके साथ हो जाते हैं।

लेकिन नीतीश में ऐसा क्या गुण है कि सत्ता पाने के लिए हर कोई उनका दामन पकड़ता है। सभी जानते-समझते हैं कि बिहार की राजनीति जातीय व्यवस्था पर निर्भर है। लंबे समय तक बिहार के राजनीतिक सुप्रीमो रहने के बाद लालू यादव को यह समझ में आ गया कि वह अब अकेले दम पर बीजेपी को पराजित नहीं कर सकते। इसलिए पिछले कुछ वर्षों में अपने पुत्र तेजस्वी यादव को मुख्यमंत्री बनाने का रास्ता देने के लिए लालू को नीतीश के आगे घुटने टेकने पड़े।

इसी प्रकार बीजेपी को अपने परम शत्रु लालू को हराने के लिए नीतीश को मुख्यमंत्री मानना पड़ा। अभी इसी सप्ताह नीतीश ने फिर साबित कर दिया कि जिसको बिहार की सत्ता चाहिए, वह नीतीश के आगे नतमस्तक हो। यही हुआ और 18 महीने में बीजेपी को दूसरी बार नीतीश को मुख्यमंत्री पद पर बैठाना पड़ा।

एक सप्ताह के भीतर बिहार में जो हुआ, उसकी शुरुआत तब हुई जब विपक्षी दलों को महसूस हुआ कि नरेंद्र मोदी को 2024 लोकसभा चुनाव में हराने के लिए गठबंधन अनिवार्य है। इस पर चर्चा आरंभ हुई। ऐसे में भला नीतीश के बिना कोई भी मोदी विरोधी कैसे सफल हो सकता है। लेकिन नीतीश का एक ही राजनीतिक सिद्धांत है और वह है ‘मैं नंबर वन’। किसी को बिहार में सत्ता पाना है, तो नीतीश को मुख्यमंत्री मानना ही होगा। इसी प्रकार देश में मोदी को हराने के लिए नीतीश को ही प्रधानमंत्री पद देना ही नहीं बल्कि चुनाव से पहले इसका विश्वास दिलाना होगा।

2024 में विपक्षी दलों के ‘इंडिया’ समूह की घोषणा तो हुई लेकिन विपक्षी समूह ने नीतीश को अपना प्रधानमंत्री घोषित नहीं किया। बस, नीतीश कुमार खफा हो गए। उन्होंने मान लिया कि यहां तो उनकी दाल गलने वाली नहीं है। इसलिए वह तुरंत बीजेपी साथ पेंग बढ़ाने लगे, और एक सप्ताह के भीतर 18 महीनों में दूसरी बार मुख्यमंत्री पद की शपथ ले ली। लेकिन केवल एक यही बात नहीं थी जिसकी वजह से नीतीश को बीजेपी की शरण में जाना पड़ा। आखिर वह क्या बात थी जिससे नीतीश भी थोड़ा डर गए।


22 जनवरी, 2024 वह तारीख थी जिसने हिन्दुत्ववादी शक्तियों के अतिरिक्त सभी राजनीतिक दलों को भयभीत कर दिया। रामलला का मंदिर जनदर्शन के लिए खुलने के बाद सभी मोदी विरोधी दलों को यह दिखाई पड़ने लगा कि 2024 तो गया। नीतीश के लिए यह स्पष्ट था कि अभी ‘दिल्ली दूर है’। यह भी साफ था कि 2024 में मोदी के खिलाफ लड़ने के बाद बिहार का मुख्यमंत्री पद भी लंबे समय तक रहना संभव नहीं। बस, नीतीश कुमार ने मोदी को पुनः देश का सर्वोच्च नेता मान लिया और बिहार का ‘नंबर वन’ पद बचा लिया। इस प्रकार नीतीश ने बिहार का नौवीं बार मुख्यमंत्री पद प्राप्त करने का नया रिकॉर्ड अपने नाम दर्ज करवा लिया।

परंतु वह क्या बात है कि नीतीश कुमार हर पार्टी को सत्ता में रहने के लिए अनिवार्य हैं। इसका सीधा-सा उत्तर है बिहार की जातीय व्यवस्था। बिहार में सब समझते हैं कि प्रदेश की सत्ता जातीय समीकरण पर ही निर्भर है। इस जातीय जोड़-घटाने के सबसे पहले नेता थे कर्पूरी ठाकुर। कर्पूरी वह पहले नेता थे जिन्होंने पिछड़ों की खुली राजनीति कर सिद्ध कर दिया था कि प्रदेश में चुनाव जीतने के लिए ‘सवर्ण’ कार्ड काफी नहीं है। कर्पूरी ठाकुर ने पहली बार सन 1970 में अपने इसी गुर का उपयोग कर कांग्रेस को पराजित किया और स्वयं ‘पिछड़ों’ के सर्वोच्च नेता बन गए।

उनके निधन के बाद उन्हीं के चेले लालू यादव ने भी जातीय कार्ड खेला और लंबे समय तक न केवल बिहार बल्कि देश की राजनीति में भी छाए रहे। परंतु लालू यह भूल गए कि उनके परम राजनीतिक मित्र नीतीश कुमार भी कर्पूरी ठाकुर के शिष्य हैं। लालू और नीतीश- दोनों ने ही कर्पूरी की सोशलिस्ट राजनीति का झंडा बुलंद किया तथा दोनों बिहार की युवा राजनीति के कद्दावर नेता बन गए। जब लालू मुख्यमंत्री बन गए और उनकी नीतीश से खटक गई, तो वह लालू विरोधी राजनीति का एक कद्दावर चेहरा बन गए।

बस क्या था, जल्द ही लालू सत्ता से बाहर एवं नीतीश सत्ता के अंदर हो गए। लालू यादव का विनिंग फॉर्मूला यादव और मुस्लिम (एमवाई) था। लालू को शिकस्त देने को नीतीश ने इसी फार्मूले में ‘अति पिछड़ों’ का तड़का लगा दिया। इस प्रकार नीतीश लालू से दो हाथ आगे निकल गए। नीतीश भलीभांति समझते थे कि केवल अति पिछड़े सत्ता के लिए काफी नहीं। इस कमी को पूरा करने के लिए उन्होंने बीजेपी के ‘सवर्ण वोट बैंक’ का सहारा ले लालू के एमवाई फार्मूले को मात दे दी और बीजेपी से हाथ मिला मुख्यमंत्री बन बैठे।


जब नीतीश का मोदी से मनमुटाव हुआ, तो उन्होंने लालू से हाथ मिला चुनावी समीकरण ठीक कर लिया। इस प्रकार नीतीश मुख्यमंत्री पद पर कब्जा जमाए रहे। इस बीच नीतीश ने प्रधानमंत्री पद पाने का सपना देख डाला और मोदी को छोड़ वापस लालू की शरण में चले गए। लेकिन कुछ ही दिनों पूर्व उन्हें लगा कि विपक्ष में तो कई दिग्गजों की आंखें भी प्रधानमंत्री पद पर गड़ी हैं। बस ‘फॉर एवर’ नीतीश बाबू ने वापस बीजेपी का हाथ थाम प्रदेश का सर्वोच्च पद संभाल लिया।

इस तरह नीतीश का यथासंभव लंबे समय तक बिहार का मुख्यमंत्री बने रहने का सपना भले ही पूरा हो जाए लेकिन इतिहास में उनको ‘शर्म तुमको मगर नहीं आती’ की पदवी के साथ ही याद किया जाएगा।

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