ओल्ड इंडिया के मंदिर-मस्जिद झगड़े और न्यू इंडिया के भाईचारे के बीच की ‘बर्लिन दीवार’ गिराएंगे मोदी जी !

अयोध्या पर सुप्रीम कोर्ट ने फैसला देते हुए बाबरी मस्जिद गिराए जाने को अपराध और कानून का उल्लंघन बताया था। लेकिन प्रधानमंत्री के राष्ट्र के नाम संदेश में इसका जिक्र न होना निराश करता है। ऐसे में ओल्ड इंडिया के मंदिर-मस्जिद झगड़े और न्यू इंडिया के बीच की ‘बर्लिन दीवार ’ कब गिराएंगे प्रधानमंत्री जी

फोटो : सोशल मीडिया
फोटो : सोशल मीडिया

मिखाइल गोर्बाचौफ मेरे हीरो हैं। जिन्होंने बिना खून बहाए 20वीं शताब्दी में इतिहास बदल दिया और हमें ऐसी आशा दी कि हम 21वीं शताब्दी में भी ऐसा ही कुछ कर सकते हैं, वैसा कर सकने वाले दुनिया भर के राजनेताओं में गोर्बाचैफ का नाम ऊपर है। विश्व शांति के प्रति अपने मजबूत और निर्भीक प्रतिबद्धता की बलिवेदी पर उन्हें अपना पद त्यागना पड़ा। अमेरिका और सोवियत संघ के बीच शीत युद्ध को समाप्ति की ओर लाने के लिए रोनाल्ड रीगन के साथ उन्होंने समन्वय बनाया। 1981 के दशक के आखिरी वर्षों में रीगन के साथ उन्होंने परमाणु निःशस्त्रीकरण समझौतों पर हस्ताक्षर किए जिसने पूरी दुनिया में शांति प्रेमियों को प्रेरित किया। अपने यहां ग्लासनोस्त (खुलापन) और पेरेस्त्रोइका (पुनर्संरचना) की कड़ी नीति के साथ उन्होंने कम्युनिस्ट तानाशाही की गतिहीनता और आत्म प्रतारणा को समाप्त किया।

उन्होंने अपने ही देश- सोवियत संघ, के अहिंसात्मक विखंडन को सुनिश्चित किया क्योंकि वे जानते थे कि यह अप्राकृतिक संरचना है जिसके संघटक तुरंत ही आजाद देश बन गए। इसी तरह, दो भयंकर विश्व युद्धों से लिए गए निराशाजनक संदेशों से प्रेरणा लेकर उन्होंने तब सेना के इस्तेमाल से मना कर दिया जब पूर्वी यूरोप में देशों ने अपने कम्युनिस्ट शासन को समाप्त कर दिया और वे सोवियत संघ के साथ अपने गठबंधन से अलग हो गए। इसने पूर्वी और पश्चिमी यूरोप को शांतिपूर्ण ढंग से एक साथ आने का रास्ता बनाया जिसकी सबसे अच्छी गवाह 9 नवंबर, 1989 को ‘बर्लिन की दीवार’ गिरने की घटना बनी।

बल्कि अब भी, जबकि वह 88 साल के हो गए हैं, यह रूसी नेता बुद्धिमानी की बात करने वाले विरले लोगों में हैं। मैं ऐसा क्यों कह रहा हूं, इसके लिए बर्लिन की दीवार ढहाए जाने की 30वीं वर्षगांठ के मौके पर टाइम पत्रिका के अंक में उनके दूरदर्शी विचार पढ़ने चाहिए। गोर्बाचौफ लिखते हैंः बर्लिन की दीवार जिसने एक शहर नहीं, एक देश नहीं, बल्कि पूरे यूरोप को दशकों से विभाजित कर रखा था और फिर इतिहास ने अपना पहिया तेज कर दिया। इस तरह के क्षण राजनेता के उत्तरदायित्व और विचार की परीक्षा लेते हैं।... हमने शीत युद्ध में निर्णायक रेखा खींच दी थी। हमारा लक्ष्य नए यूरोप का था- ऐसा यूरोप जिसकी कोई विभाजक रेखा नहीं हो।

नवंबर माह के दूसरे शनिवार को अपने यहां दो महत्वपूर्ण घटनाएं हुईंः करतारपुर साहिब कॉरिडोर की शुरुआत और अयोध्या मामले पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला। ऐसे में हमें ‘बर्लिन की दीवार’ गिरने की बात क्यों करनी चाहिए? ऐसा इसलिए कि हमारे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इसकी चर्चा की है और ऐसा करने के लिए उनकी सशर्त प्रशंसा की जानी चाहिए। राष्ट्र के नाम अपने संदेश में उन्होंने कहाः आज 9 नवंबर है। आज के दिन ही ‘बर्लिन की दीवार’ गिरी थी। दो भिन्न धाराएं एक साथ आईं और नई शुरुआत के लिए संकल्प लिया। आज, करतारपुर कॉरिडोर भारत और पाकिस्तान के समन्वित प्रयासों से आरंभ हुआ है। आज, 9 नवंबर को ही आए अयोध्या फैसले ने हमें (हिंदुओं और मुसलमानों को) एक साथ आने, आगे बढ़ने और न्यू इंडिया बनाने की शिक्षा दी है।

नए यूरोप को लेकर गोर्बाचौफ की दृष्टि। न्यू इंडिया को लेकर मोदी की दृष्टि। निंदक कहेंगे, मैं समान शब्दों को लेकर बहुत कुछ पढ़ रहा हूं। आखिरकार, गोर्बाचौफ के अपने देश में अनगिनत आलोचक हैं। काफी सारे रूसी इस बात के लिए उन्हें दोषी ठहराते हैं कि उनका देश, जैसा कि वे मानते हैं, गोर्बाचौफ की गलत नीतियों और कमजोर नेतृत्व की वजह से सुपरपावर नहीं रहा। मोदी के भी काफी आलोचक हैं, और मैं भी उनमें शामिल हूं।

लेकिन, मैं अंधा आलोचक नहीं हूं। मैंने उनकी प्रशंसा भी की है- 17वीं लोकसभा के चुनावों में पूर्ण और जबर्दस्त जनादेश के बाद 25 मई को संसद भवन के सेंट्रल हॉल में उनके दिए भाषण की। 9 नवंबर को राष्ट्र के नाम संबोधन भी प्रशंसा योग्य है, जिसमें उन्होंने जिसके लिए भारत जाना जाता है- विविधता में एकता, की प्रशंसा की। उन्होंने कहाः हम लोगों के बीच मेल-मिलाप, भाईचारा, मित्रता, एकता और शांति देश के विकास के लिए बहुत ही महत्वपूर्ण है। उन्होंने भरोसा दिलायाः नए भारत में भय, कटुता और नकारात्मकता के लिए कोई स्थान नहीं है। उन्होंने अपने संदेश का समापन ऐसी अपील के साथ किया जिसका हर देशभक्त स्वागत करेगाः आइए, हम नई शुरुआत करें। आइए, न्यू इंडिया बनाएं।

एक दीवार तो यही है

प्रधानमंत्री के साथ दिक्कत यह है कि उनके निर्मल शब्द उनकी पार्टी के कामों और उनकी सरकार के फैसलों के साथ हर वक्त मेल नहीं खाते। जब से मोदी ने सरकार बनाई है, उन साढ़े पांच साल के दौरान हमने उनमें या उस संघ परिवार, जिससे वे आते हैं, के नेतृत्व में गोर्बाचौफ वाली कोई ग्लासनोस्त और पेरेस्त्रोइका नहीं देखी है। नया यूरोप मूलतः इसलिए जन्मा क्योंकि अंतिम सोवियत नेता ने इतिहास में अपनी कम्युनिस्ट पार्टी द्वारा की गई गलतियों और अपराधों को स्वीकार करने का साहस दिखाया। एक बार जब सबसे ऊपर के नेता ने सत्तारूढ़ पार्टी की ईमानदार आत्मालोचना का द्वार खोल दिया और स्व-सुधार के विश्वसनीय कदम उठाए, तो पूरे समाज ने स्टालिन युग की गलतियों पर खुलकर बातचीत आरंभ कर दी।

यह सब कहते हुए मैं कोई भ्रम नहीं रखना चाहता इसलिए इसका उल्लेख करना चाहता हूं कि अपने देश में बीजेपी ने जो गलतियां की हैं, वह सोवियत संघ में स्टालिन युग में किए गए आतंककारी अपराधों से तुलना योग्य नहीं हैं। यह भी समझना जरूरी है कि ऐसे समय में जब मोदी न्यू इंडिया के लिए नई शुरुआत की अपील कर रहे हैं, और ‘बर्लिन की दीवार’ ढहाए जाने का जिक्र सुप्रीम कोर्ट के फैसले के संदर्भ में कर रहे हैं जो अयोध्या में राम मंदिर निर्माण का मार्ग बना रहा है, क्या उन्हें भारतीय ग्लासनोस्त की थोड़ी-सी भी भावना का प्रदर्शन नहीं करना चाहिए था? क्या उन्हें ईमानदारी के साथ यह नहीं स्वीकार करना चाहिए था कि मंदिर आंदोलन शुरू करने वालों ने कुछ अवैध और अस्वीकार्य काम किए थे? आखिरकार, उच्चतम न्यायालय ने बाबरी मस्जिद ढहाए जाने को देश के कानून का अत्यंत बुरी तरह उल्लंघन कहते हुए निंदा करने में संकोच नहीं किया है।

उच्चतम न्यायालय के लिए मोदी की अत्यंत भावुक प्रशंसा और निंदा करने वाले उसके शब्दों पर उनकी जानबूझकर चुप्पी के बीच अंतर देखिए। एक तरफ तो उन्होंने कहाः आज ऐतिहासिक दिन है। यह देश की न्यायपालिका के स्वर्णिम युग की शुरुआत है। निर्णय सवर्सम्मत और साहसी था। हमारी न्यायपालिका की विशेष प्रशंसा करने की आवश्यकता है। लेकिन दूसरी तरफ, उन्होंने अपनी खुद की पार्टी और वृहत्तर संघ परिवार के नेतृत्व वाले कारसेवकों द्वारा 6 दिसंबर, 1992 को किए गए आपराधिक कृत्य पर उसी कोर्ट ने जो कहा, उसका समर्थन करने या स्वीकार करने से बिल्कुल कन्नी काट ली।

राष्ट्रके नाम प्रधानमंत्री के संबोधन में दो अन्य खेदजनक बातें छूट गई हैं। पहली, सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में देश को याद दिलाया कि धर्मनिरपेक्षता संविधान का मूल आधार है। मोदी ने इस मूलभूत संवैधानिक सिद्धांत के प्रति अपनी प्रतिबद्धता के प्रति जानबूझकर स्वीकृति नहीं दी क्योंकि धर्मनिरपेक्ष शब्द के प्रति उनका विरोध जगजाहिर है। दूसरी, सुप्रीम कोर्ट पूजास्थल (विशेष प्रावधान) कानून, 1991 के प्रावधानों में गहरे तक गया और देश भर के धार्मिक प्रकृति वाले स्थानों पर हाथ डालने और इसे जबरन बदलने के प्रति समाज के किसी भी वर्ग को सतर्क किया। मोदी इस पर चुप रहे।

उसी दिन, विश्व हिंदू परिषद ने कहाः अयोध्या फैसला इन सबका अंत नहीं है, यह तो इन सबकी शुरुआत है। इस तरह उसने साफ तौर से संकेत दिया कि वह मथुरा और काशी की मस्जिदों पर अपने दावे को लेकर प्रतिबद्ध है। साफ है कि संघ परिवार के प्रमुख घटक- वीएचपी, ने नई शुरुआत का अपना अर्थ देश के सामने रख दिया है जो नई शुरुआत के मोदी के आह्वान से बिल्कुल भिन्न है।

मोदी जी, अगर ओल्ड इंडिया के मंदिर-मस्जिद झगड़ों को साथ-साथ चलाते रहने की आप अनुमति देते हैं और इन्हें संघ परिवार भड़काता रहता है, क्या तब भी न्यू इंडिया बनाया जा सकता है? क्या आप घरेलू ‘बर्लिन की दीवार’- अपनी सरकार/अपनी पार्टी और भारत के सबसे बड़े अल्पसंख्यक समुदाय के बीच पर्याप्त विश्वास की कमी, को तोड़ सकते हैं? अगर आप इस समुदाय के वास्तविक भय और उनकी चिंताओं को गंभीरता से कम नहीं कर सकते हैं, तो, तब भी सबका साथ, सबका विकास और सबका विश्वास का लक्ष्य हासिल कर सकते हैं? देश- खास तौर से, मुस्लिम समुदाय, आपसे उत्तर की प्रतीक्षा में है।

एक और दीवार भी है

9 नवंबर को करतारपुर साहिब कॉरिडोर के संदर्भ में मोदी ने एक अन्य ‘बर्लिन की दीवार’- भारत और पाकिस्तान के बीच अनवरत विद्वेष, को तोड़ने की जरूरत भी बताई। इतिहास उनसे और (पाकिस्तान के सेना प्रमुख कमर जावेद बजवा के समर्थन से) पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान से दोनों देशों के बीच दीर्घ अवधि वाली शांति और मेल-मिलाप हासिल करने की इसी तरह की नई शुरुआत करने की अपेक्षा करता है। मोदी न्यू इंडिया और इमरान खान नए पाकिस्तान के सपने अपने- अपने लोगों को दिखा रहे हैं। दोनों देशों के बीच शांति और सहयोग के बिना दोनों में से कुछ भी संभव नहीं है। भारत और पाकिस्तान के बीच इस दूसरी दीवार के सबसे अधिक पीड़ित कश्मीर के लोग हैं। इस्लामाबाद के नागरिक-सैन्य नेतृत्व के साथ सहयोग कर क्या मोदी कश्मीर को दोनों देशों के बीच अवरोधक की जगह पुल बनाने की दृष्टि और इच्छा शक्ति में बदल पाएंगे?

मोदी ने दोनों देशों के बीच कॉरिडोर खोलने की अनुमति देने के लिए इमरान खान को धन्यवाद दिया, इसके लिए हमें उनकी प्रशंसा करनी चाहिए। उन्होंने बिल्कुल सही कहाः गुरु नानक देव जी का संदेश और उनकी शिक्षा सबके लिए है और ये सिर्फ सिख समुदाय के लिए नहीं है। गुरु नानक ने समाज में एकता, भाईचारे की राह दिखाई है। मोदी जी, क्या आप गुरु नानक देव जी के बताए निर्देश का पालन करेंगे और बर्लिन की इन दो दीवारों को गिराने के हर संभव प्रयास करेंगे जिसके बारे में खुद आपने ही कहा है?

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