विष्णु नागर का व्यंग्यः ऐसा प्रधानसेवक कहां मिलेगा, जो हमेशा जनता की तरफ पीठ किए रहता है!

इस बंदे में कई खूबियां हैं। आप उसे लाख झूठा कहो, फर्जी कहो, फेकू कहो, वह अपने मार्ग से डिगता नहीं। उसके लिए यह उसी तरह सिद्धांत का मामला है, जिस तरह गांधीजी के लिए सत्य और अहिंसा थी। वह झूठ बोलना नहीं छोड़ेगा, फेंकना नहीं छोड़ेगा, फर्जीवाड़ा करना नहीं छोड़ेगा।

फोटोः सोशल मीडिया
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विष्णु नागर

व्यंग्यकार होने का मतलब यह नहीं कि आप किसी की तारीफ़  न करें। और वही तारीफ़ असली तारीफ़  होती है, जो किसी के पीठ पीछे की जाती है। चूंकि उनकी पीठ हमेशा जनता की तरफ होती है, इसलिए बेधड़क होकर उनकी तारीफ़ कभी भी की जा सकती है! आज मैं अपने आप को उनकी इस बात के लिए तारीफ़ करने से रोक नहीं पा रहा हूं कि ये बंदा कितना 'महान' है कि हमेशा जनता की तरफ पीठ किए रहता है। दुनिया का यह कठिनतम योग है। उसके अच्छे स्वास्थ्य का असली रहस्य यही है, सहजन के पत्तों के पराठे नहीं!

मैं जानता हूं कि आप में से कुछ कहेंगे कि इस बेवकूफ़ व्यंग्यकार को इतना भी नहीं पता कि जब वे भाषण देते हैं, तब उनका चेहरा जनता के सामने होता है, उनकी पीठ नहीं। टीवी पर जब वे प्रकट होते हैं, तब भी उनका चेहरा जनता के सामने होता है। कोई जनता की तरफ पीठ करके भाषण कैसे दे सकता है, राष्ट्र को संबोधित कैसे कर सकता है, मन की बात कैसे कर सकता है? ऐसी बेतुकी बात करने वाले को लोग आखिरकार व्यंग्यकार मान कैसे लेते हैं?

आपकी बात दुरुस्त है। इसमें मैं इतना ही संशोधन करूंगा कि उनका मुंह इधर दीखता जरूर है, होता अडाणी-अंबानी की तरफ है, भले बात किसान की हो या मजदूर की। जैसे वह भाषण में कभी नहीं कहेंगे कि किसानों को पचास से अधिक दिन हो गए, ठंड खाते-खाते, मरते-मरते। अगर ये किसान केवल पंजाब के हैं, तो भी क्या हुआ, हैं तो मेरे देश के। मैं उन्हें परेशान होते देख चैन से कैसे सो सकता हूं? रद्दी की टोकरी में फेंकता हूं इन कानूनों को!

नहीं, वे अगली जिंदगी में भी ऐसा नहीं कहेंगे। किसानों को इस तरह एक साल भी हो जाए तो भी उनके श्रीमुख से ऐसे वचन नहीं निकलेंगे। वे यही कहेंगे कि मैंने किसानों के लिए ये किया है, वो किया है। पंजाब के लिए, सिखों के वास्ते ये और वो किया है। और ये कानून भी मैं किसानों के भले के लिए ही लाया हूं, वगैरह-वगैरह। विपक्ष इन्हें भड़का रहा है।

उनकी सबसे बड़ी खूबी यह है कि जनता की तरफ पीठ किए बिना वे कोई फैसला ले नहीं सकते।इसके लिए 56 इंच का क्या 56 फीट का सीना चाहिए और यह इस आदमी की विनम्रता है कि यह 56 फीट को भी 56 इंच का बताता है। हुआ है आज तक ऐसा कोई प्रधानसेवक?

इस बंदे में और भी कई खूबियां हैं। आप उसे लाख झूठा कहो, फर्जी कहो, फेकू कहो, वह अपने मार्ग से डिगता नहीं। उसके लिए यह उसी तरह सिद्धांत का मामला है, जिस तरह गांधीजी के लिए सत्य और अहिंसा थी। वह झूठ बोलना नहीं छोड़ेगा, फेंकना नहीं छोड़ेगा, फर्जीवाड़ा करना नहीं छोड़ेगा। इतनी रियायत अवश्य देगा कि अगर उसका पहला झूठ पकड़ा गया तो वह उस पर अड़ेगा नहीं, उसी वजन का दूसरा झूठ सामने ले आएगा।

यही वह फेंकने के मामले में भी कंरते हैं। नाली से गैस बनाने का सिद्धांत एक बार प्रतिपादित कर दिया, तो कर दिया, इससे पीछे हटने का प्रश्न ही नहीं। आपने उसका मजाक बना दिया तो वह इस बात को दोहराएगा नहीं। इसके बदले इसी दर्जे  का कोई दूसरा आविष्कार पेश कर देगा। अगर उसने तक्षशिला को भारत में बताने की गलती कर दी है तो, कर दी। वह उस दिशा में न आगे बढ़ेगा, न पीछे  हटेगा। यह कतई नहीं कहेगा कि मुझसे चूक हो गई थी। वह मानता है कि कोई गलती, कोई चूूूक उससे हो नहीं सकती। वह भविष्य में तक्षशिला की ही नहीं, नालंदा की भी बात नहीं करेगा क्योंकि नालंदा को वह पाकिस्तान में बताने की गलती कर सकता है!

इससे यह सिद्ध होता है कि हर मामला उसके लिए कृषि कानून नहीं है। इसकी ठोस वजह है। वह नालंदा या तक्षशिला को कहीं भी बता दे, इससे अडानी-अंबानी को कोई अंतर नहीं पड़ता। वह अगर यह भी कह दे कि मैंने तक्षशिला और नालंदा, दोनों में शिक्षा ग्रहण की है तो भी उनकी सेहत और मुनाफे पर कोई फर्क नहीं पड़ता।

अब बताइए किसका जी नहीं करेगा ऐसे इनसान की तारीफ़ करने को! मैं विश्वास के साथ कह सकता हूं कि ऐसा व्यंग्यकार अवश्य रौरव नरक में जाएगा, जो इस बात के लिए भी उसकी तारीफ़ नहीं कर सकता! ऐसा कोई व्यंग्यकार मुझे अगर स्वर्ग में मिल भी गया तो मैं विरोध स्वरूप खुद नरक में अपना ट्रांसफर करवा लूंगा। और आप जानते हो कि मैं अपने वायदे का कितना पक्का हूं!

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