आखिर क्यों बापू को पसंद नहीं थी फिल्में, जो पूरे जीवन सिनेमा को खराब मानते रहे

गांधीजी का कहना था कि सिनेमा के दूसरे पक्ष को छोड़ भी दें तो वे बना झरोखे वाले कमरे में बैठने तक के खिलाफ हैं। उन्होंने अखबार में हीरो-हीरोइन की छपने वाली ग्लैमरस फोटो की निंदा की और कहा कि वह फिल्म थिएटर की बजाय स्पिनिंग (कताई) थिएटर खोलने के पक्षधर हैं।

फोटोः सोशल मीडिया
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अमिताभ पाराशर

महात्मा गांधी को फिल्मों से कोई लगाव नहीं था। लगाव तो छोड़िए, माना जाता है कि वह सिनेमा को नापसंद करते थे। हम यही सुनते आए हैं कि महात्मा ने अपने जीवन में सिर्फ एक फिल्म देखी थी। अब कुछ लोग नए शोध के जरिए दावा करते हैं कि उन्होंने दरअसल दो फिल्में देखी थीं। उन्होंने 1944 में फिल्म ‘मिशन टु मास्को ’ देखी। शांति कुमार मोरारजी ने अपनी आत्मकथा में लिखा है कि गांधीजी की सहयोगी मीराबेन ने उन्हें इसे देखने के लिए मनाया था। आगा खान जेल से बाहर आने के बाद बापू उस वक्त नरोत्तम मोरारजी के बंगले के अहाते में रह रहे थे।

शांति कुमार ने लिखा है कि एक दिन उन्होंने देखा कि बंगले के अहाते में बिजली लाने के लिए पोल वगैरह गाड़े जा रहे हैं। बताया गया कि गांधीजी को एक फिल्म दिखाने के लिए यह सब हो रहा है। 21 मई 1944 की शाम को फिल्म का शो रखा गया। यह फिल्म रूस में अमेरिका के एंबेसडर जोसफ डेवीज के अनुभवों पर आधारित थी। यहां तक तो ठीक था, लेकिन फिल्म में कम कपड़ों में डांस करती कुछ औरतों को देख गांधीजी उखड़ गए। बकौल शांति कुमार, गांधीजी ने अपने आसपास के लोगों को लताड़ भी लगाई कि उन्हें ऐसी फिल्म क्यों दिखाई गई।

उर्वीश कोठरी ने ‘द प्रिंट ’ में लिखा है कि इस शो के बाद मुंबई के तब के नामी आर्ट डायरेक्टर कानू देसाई ने तय किया कि गांधीजी को एक हिंदी फिल्म ‘राम राज्य’ दि खाई जाए। विजय भट्ट फिल्म के प्रोड्यूसर थे और कानू देसाई आर्ट डायरेक्टर। दिक्कत यह थी कि शांति कुमार ने ‘राम राज्य’ देखी थी और उन्हें यकीन था कि गांधीजी को यह पसंद नहीं आएगी। लेकिन कानू देसाई अड़े थे। खैर, बात जब गांधीजी तक पहुंची, तो उन्होंने कहा कि मुझे एक हिंदी फिल्म भी देखनी होगी, क्योंकि मैंने एक अंग्रेजी फिल्म देखने की गलती की है।

2 जून, 1944 को शो हुआ। अब यहां एक पेच है। लोकप्रिय अवधारणा यह है कि गांधीजी ‘राम राज्य’ फिल्म देखकर बड़े प्रभावित हुए। उन्हें यह फिल्म बड़ी पसंद आई। उस समय के अखबारों ने इसे एक ऐतिहासिक घटना बताते हुए ऐसा ही लिखा। बल्कि हमने अब तक यही सुना कि गांधीजी इस फिल्म के शुरू के सिर्फ तीस मिनट देखने के लिए राजी हुए थे, लेकिन उन्हें यह इतनी पसंद आई कि उन्होंने पूरी फिल्म देखी। लेकिन शांति कुमार मोरारजी ने लिखा है कि गांधीजी ने ‘राम राज्य’ को बिल्कुल नापसंद किया और फिल्म के शोर-शराबे और जोर-जोर से बोले गए संवादों से तो चिढ़ ही गए।

खैर, जब गांधीजी ने इस फिल्म को देखा, तो उस समय की लोकप्रिय फिल्म पत्रिका ‘फिल्म इंडिया’ में एक कार्टून छपा। बंबई के कई फिल्म प्रोड्यूसर गांधीजी के घर के सामने लाइन लगाए खड़े हैं कि वे उनकी फिल्म भी देख लें। सच्चाई कहीं बीच में होगी। लेकिन इससे कौन इंकार कर सकता है कि ‘राम राज्य’ को इस वजह से ज्यादा ख्याति मिली कि यही एक फिल्म है जिसे गांधीजी ने देखा था।

‘फिल्म इंडिया’ पत्रिका ने 1940 के किसी अंक में एक सनसनी फैलाई। इसने लिखा, “महात्मा गांधी बने फिल्म स्टार”! दरअसल, मद्रास की कंपनी डॉक्युमेंट्री फिल्म्ज लिमिटेड ने महात्मा गांधी पर एक डॉक्युमेंट्री बनाने की घोषणा की थी। इसे इसी कंपनी के पत्रकार और गांधी समर्थक ए.के. चेत्तियार बनाने वाले थे। खबर में यह भी दावा किया गया था कि अगर युद्ध की वजह से योजना गड़बड़ नहीं हुई, तो इस फिल्म को दुनियाभर में 23 भाषाओं में लोग देखेंगे। रिपोर्ट में दावा किया गया था कि श्री चेत्तियार ने न केवल कई महत्वपूर्ण लोगों से बातचीत रिकॉर्ड की है, बल्कि गांधी के आश्रम में भी चुपके-चुपके उनकी दिनचर्या को रिकॉर्ड किया है।

वाकई उनके पास गांधीजी के कई ऐसे दुर्लभ फुटेज थे जो और कहीं नहीं थे। जैसा कि ऐतिहासिक धरोहरों के प्रति लापरवाह किसी मुल्क से उम्मीद की जा सकती है, दुर्भाग्य से, उस फिल्म की कोई कॉपी या कोई नेगेटिव भी नहीं बची है। फिल्मों से गांधीजी की बेरुखी का आलम यह था कि लंदन में गांधी और चार्ली चैपलिन की प्रसिद्ध बैठक के ठीक पहले गांधीजी ने कथित तौर पर पूछा था कि ये चार्ली चैपलिन कौन हैं? इंडियन सिनेमटोग्राफ कमेटी के साथ उनके एक संवाद (इंटरव्यू) में सिनेमा के बारे में उनकी राय और भी साफ पता चलती है, “मैं आपके सवालों के जवाब देने के लिए सक्षम नहीं हूं क्योंकि मैं कभी सिनेमा नहीं गया। लेकिन एक बाहरी व्यक्ति के तौर पर इतना कहूंगा कि इसने (सिनेमा) जो (समाज का) नुकसान किया है और लगातार कर रहा है, वह सबके सामने है। अगर इसने कोई अच्छा प्रभाव पैदा किया है, तो वह अभी साबित होना है।”

गांधीजी द्वारा संपादित अखबार ‘हरिजन’ में सिनेमा के बारे में उनके विचार अक्सर प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से सामने आते थे। 3 मई, 1942 के अंक में उन्होंने कहा, “अगर मैं इसके (सिनेमा) पक्ष में धरने पर बैठूं तो अपनी जाति गवाऊं या महात्मा की अपनी पदवी। कह सकता हूं कि सिनेमा अक्सर खराब होती हैं। रेडियो के बारे में कुछ कह नहीं सकता।”

तो शोधकर्ताओं और इतिहासकारों ने यह कहीं साफ तौर पर बताया हो तो मालूम नहीं, लेकिन यह स्पष्ट नहीं है कि गांधीजी फिल्मों से इतनी खार क्यों खाते थे? नई दिल्ली में अपनी एक प्रार्थना सभा में उनसे किसी ने सवाल किया कि आप फिल्मों को क्यों नापसंद करते हैं जबकि फिल्में नैतिक शिक्षा के लिए उपयोगी हो सकती हैं। उन्होंने जो जवाब दिया उसका निहितार्थ यह था कि सिनेमा के दूसरे पक्षों को तो छोड़ ही दिया जाए, वे किसी ऐसे कमरे में जिसमें कोई झरोखा तक न हो, बैठने तक के खिलाफ हैं। उन्होंने अखबारों में हीरो-हीरोइन की छपने वाली ग्लैमरस फोटो की निंदा की और कहा कि वह फिल्म थिएटर की बजाय स्पिनिंग (कताई) थिएटर खोलने के पक्षधर हैं।

जबकि स्वतंत्रता की जो लड़ाई वह लड़ रहे थे, उसके लिए सिनेमा का बेहतरीन इस्तेमाल हो सकता था। करने वालों ने किया भी। लंदन में दूसरे गोलमेज सम्मेलन के दौरान जिस चार्ली चैपलिन से मिलने से पहले उन्होंने कथित तौर पर पूछा था कि यह कौन है, उसी चार्ली चैपलिन ने अपनी ‘माडर्न टाइम्ज’, ‘द ग्रेट डिक्टेट र’ जैसी कई फिल्मों के जरिए यही किया।

वैसे, इसे त्रासदी कहिए या कुछ और, लेकिन जो बेरुखी सिनेमा के बारे में गांधीजी की रही, लगभग वैसी ही बेरुखी सिनेमा ने उनके देहांत के बाद उनके बारे में दिखाई। गांधीजी के देहांत के बाद अगले पांच साल तक किसी ने उन पर या उनके बारे में कोई फिल्म नहीं बनाई। ध्यान रहे कि हम सरकारी ‘न्यूजरील’ की बात नहीं कर रहे। 1953 में उन पर एक अमेरिकी ने डॉक्युमेंट्री बनाई- ‘महात्मा गांधी : टवेंटिएथ सेंचुरी प्रोफेट’। हालांकि उसी साल महात्मा गांधी पर एक फिल्म बनाने का प्रस्ताव भारत सरकार के अंदर से आया, लेकिन उस पर कोई बात आगे नहीं बढ़ी।

इस अमेरिकी डॉक्युमेंट्री के बनने के करीब दस साल बाद जवाहरलाल नेहरू ने गांधीजी पर फिल्म बनाने की सरकारी अक्षमता की बात कही थी। दिसंबर,1963 में राज्यसभा में उन्होंने कहा, “गांधीजी पर फिल्म बनाना किसी भी सरकारी विभाग के लिए कठिन है। सरकार इसमें सक्षम नहीं और न ही इसमें ऐसी प्रतिभा हैं जो यह काम कर सके।” उसी साल, यानी 1963 में एक अन्य फिल्म रिलीज हुई, “नाइन आवर्ज ऑफ राम”। यह फिल्म स्टैन्ली वॉल्पर्ट लिखित इसी नाम की एक किताब पर आधारित थी। यह गांधी की हत्या के नौ घंटे पहले की काल्पनिक कथा है। इस फिल्म के भी पांच साल बाद यानी गांधी की हत्या के पूरे बीस साल बाद भारत सरकार के फिल्म डिविजन ने पाच घंटे की एक डॉक्युमेंट्री बनाई- ‘लाइफ ऑफ गांधी,1869-1948’।

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