आकार पटेल का लेख: आखिर बीजेपी क्यों नहीं दिखा रही 2004 जैसा जोश?

इस लोकसभा चुनाव में दूसरा ऐसा मौका है जब बीजेपी को अपने कार्यकाल का बचाव करना है और काम के आधार पर वोट मांगना पड़ रहा है। पहली बार 2004 में ऐसा हुआ था, लेकिन इस बार बात कुछ अलग है।

फोटो : सोशल मीडिया
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आकार पटेल

15 साल पहले अटल बिहारी वाजपेयी सरकार पूरे विश्वास के साथ चुनावों में उतरी थी और संदेश यह दिया जा रहा था कि जीत तो पक्की है। लेकिन जब नतीजे आए तो न सिर्फ मीडिया बल्कि मध्य वर्ग भी बीजेपी की हार से भौंचक रह गया था। हालांकि उस वक्त भारत उदय यानी इंडिया शाइनिंग का नारा जोर-शोर से उछाला गया था। इस नारे को लेकर बीजेपी को इतना भरोसा था कि जीत तो पक्की ही है।

2019 में ऐसा नहीं है। कई लोगों को बीजेपी के प्रचार में एक नकारत्मकता नजर आती है। हम कुछ भी बहाने बना सकते हैं, लेकिन इसमें कोई विवाद या शक नहीं कि इस बार का चुनाव 2014 जैसा तो बिल्कुल नहीं है। आखिर क्या चीज़ है जिसकी इस चुनाव में कमी नजर आती है? इस बार किसी भी समस्य का एक जादुई हल नहीं बताया जा रहा है।

थके हुए से वादे किए जा रहे हैं, नारे भी वही घिसे पिटे हैं – ‘फिर एक बार मोदी सरकार’…इस नारे में एक विनती है, एक नीरसपन है। आप इस नारे को एक सवालिया निशान के साथ भी पढ़ सकते हैं।

यह नारा प्रेरणा नहीं देता, उम्मीद नहीं जगाता और हालात में सुधार का कोई वादा भी नहीं करता। सबसे बड़ी बात कि यह नारा अब तक के प्रदर्शन का भी जिक्र नहीं करता। हां कुछ अच्छा कहना ही है इस नारे के बारे में तो सिर्फ कह सकते हैं कि इस नारे में नर्सरी स्कूल की किसी कविता की राइम या तुकबंदी नजर आती है।

कुछ लोग इस नारे को भरोसा का भाव बता सकते हैं, कि 2014 से 2019 का दौर ही वह दौर जिसे लोग दोबारा सत्ता में चाहते हैं, इसलिए अगले पांच साल के लिए फिर इसी दौर के लिए तैयार रहो।

लेकिन, बाकी प्रचार सामग्री इस दावे पर मुहर नहीं लगाती। प्रधानमंत्री कहते हैं कि वह अभी भी चैलेंजर ही हैं, मतलब वह खुद अभी सिस्टम तो नहीं बने हैं, और उनका खुद मानना है कि सिस्टम ही उनका दुश्मन है। पर, लोग तो सिस्टम चाहते हैं।

मैं जितना भी इस नारे के बारे में सोचता हूं, उतना ही मुझे विश्वास हो जाता है कि बीजेपी को पता है कि अगर वोटर को यह बतायाकि इंडिया शाइनिंग का दौर है तो वे खफा हो जाएंगे।

इस बात के बाद मेरा ध्यान सीधे विपक्ष की तरफ जाता है, जो मोदी सरकार के विपरीत एक पॉजिटिव प्रचार कर रहा है। इस चुनावी युद्ध में कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी जो सबसे बड़ा हथियार लेकर उतरे हैं, वह है न्यूनतम आय योजना या फिर ‘न्याय’। 6000 रुपए महीने की इस योजना में इतनी गुंजाइश तो है ही कि इससे कुछ अतिरिक्त वोट झोली में आ सकें। लेकिन क्या कुछ है जो इस योजना से लोगों को विमुख कर दे? यहां सवाल आता है साख का। साख सिर्फ इस आइडिया या इस वादे को पूरे करने की नहीं, बल्कि सवाल इस बात का है कि क्या विपक्ष राष्ट्रीय स्तर पर इतनी सीटें जीत पाएगा कि वह इस योजना को अमली जामा पहना सके।

यही संभवत: सबसे बड़ा मुद्दा होगा। और मेरा मानना है कि इस शानदार आइडिया से दूसरे दल भी सहमत होंगे।

न्याय योजना पर करीब 3.2 लाख करोड़ का सालाना खर्च आएगा, जिसे माना जा रहा है कि बहुत बड़ी रकम है और लंब समय तक इसे चलाना मुमकिन नहीं होगा। मेरे पास इसका एक हल है। रक्षा बजट में से 2 लाख करोड़ बाहर निकालो। वैसे भी रक्षा बजट 4 लाख करोड़ पहुंच गया है और बिना किसी बहस के इसे बढ़ाया जाता रहा है कि आखिर इतने बड़े रक्षा बजट की जरूरत ही क्या है।

मैं तो इस मुद्दे पर राष्ट्रवाद की वकालत करने वालों से बहस को तैयार हूं कि आखिर इतनी मोटी रकम गरीबों को देने के बजाए लड़ाकू विमान और जंगी पनडुब्बी आदि बनाने वाले बीसवीं सदी के यूरोपीय रक्षा उत्पादकों को क्यों दिया जाए? या फिर जैसा कि राहुल गांधी तर्क देते हैं कि देश के गरीबों के बजाय बुलेट ट्रेन पर एक लाख करोड़ रुपए क्यों खर्च हों या कार्पोरेट घरानों को क्यों इतना पैसा दिया जाए?

रोचक है कि मीडिया में इस मुद्दे पर या तर्क पर कोई बहस ही नहीं होती। मुझे तो इस पर भी आश्चर्य होता है कि दूसरे लोग ऐसा क्यों नहीं सोचते, खासतौर से वे लोग जो सेना पर इस देश को कुरबान कर देना चाहते हैं।

मैं कुछ दिन पहले तक मानता रहा कि नरेंद्र मोदी आसानी से सत्ता में वापसी कर लेंगे, लेकिन अब मेरे इस विचार को लोग कुछ ज्यादा समर्थन देते नजर नहीं आते। एक व्हाट्सएप ग्रुप में मेरे कुछ दोस्त बहस करते रहते हैं कि 2014 में 282 सीटें हासिल करने वाली बीजेपी इस बार 220 से ज्यादा सीटें हासिल नहीं कर पाएगी। लेकिन यह सिर्फ अनुमान है और इसका आधार कोई खास सूचना समझदारी नहीं है। बल्कि जिन चैनलों को पैनल में मैं जाता हूं वहां जिस तरह से ओपीनियन पोल को पेश किया गया उससे ही यह नतीजा निकलता है। हालांकि यह ओपीनियन पोल एक महीने पहले किए गए थे और हम जानते हैं कि चुनावों में एक सप्ताह में भी कितना बदलाव हो सकता है।

आपको जानना शायद रोचक लगे कि मैंने जो संख्या दी है वह सबसे ज्यादा है, बाकी तो बीजेपी को सिर्फ 145 सीट ही दे रहे हैं। लोगों में बीजेपी को लेकर इस कदर निराशा देखकर मुझे आश्चर्य भी हुआ, लेकिन उन्हें यकीन है कि उत्तर प्रदेश में तो बीजेपी का सफाया होने जा रहा है।

भले ही ओपीनियन पोल, 2014 को दोहराने की बातें करते दिखें, लेकिन हालात कहां जा रहे हैं शायद उन्हें अंदाजा नहीं है। आपने गौर किया होगा कि ज्यादातर ओपीनियन पोल नतीजों को एकसाथ जोड़कर दिखा रहे हैं। अलग-अलग राज्यों की तस्वीर सामने रखने के बजाए वे जोन और रीजन की बातें कर रहे हैं। जैसे पूर्वी रीजन में वे बिहार, बंगाल, ओडिशा को एकसाथ मिला लेते हैं और सिर्फ एनडीए, यूपीए और अन्य के हिस्से में आने वाली सीटें दिखा रहे हैं। इनका कोई खास अर्थ नहीं हो सकता है।

मुझे याद है कुछ साल पहले चुनाव विश्लेषक से बीजेपी नेता बने जीवीएल नरसिम्हा राव ने कुछ साल पहले एक ओपीनियन पोल किया था। जहां तक मुझे याद है कि वोटों की गिनती के दिन जीवीएल नरसिम्हा राव का अनुमान हरेक सीट पर गलत साबित हुआ था। जिन्हें वे हारा हुआ बता रहे थे, वे जीत गए थे और जिन्हें उन्होंने जीता हुआ बताया था वे हार गए थे।

और जब, एक पैनलिस्ट (स्वामीनाथन अंकलेसरिया अय्यर) ने पूछा कि आखिर इतने बड़े पैमाने पर गड़बड़ी कैसे हो गई, जीवीएल ने कहा था, “लेकिन राष्ट्रीय स्तर पर मेरे आंकड़े दुरुस्त निकले।” यहां समझना होगा कि चुनाव विश्लेषण और आंकलन सिर्फ अनुमानों का खेल नहीं है।

अभी इसी सप्ताह मैंने सरकार के साथ काम करने वाले एक साथी से पूछा कि क्या सत्ताधारी जीतेगा, उसका जवाब था, 150, आगे उसने जोड़ा, एक शांत लहर है।

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