सुप्रीम कोर्ट ने आठवीं की किताब में न्यायपालिका की चुनौतियों के उल्लेख को बदनाम करने की कोशिश क्यों माना!

‘एनसीईआरटी’ की किताब ने सुप्रीम कोर्ट में भारी बहस खड़ी कर दी है। किताब में न्यायपालिका की अनेक कमजोरियों और चुनौतियों का जिक्र है, लेकिन न्यायतंत्र ने इसे बदनाम करने का प्रयास माना। तो क्या हमारे लोकतांत्रिक ताने-बाने में किसी समीक्षा की गुंजाइश नहीं है?

सांकेतिक तस्वीर
i
user

अरुण कुमार डनायक

हाल ही में ‘राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद’ (एनसीईआरटी) की कक्षा 8 की सामाजिक विज्ञान की पाठ्यपुस्तक में शामिल किए गए एक अध्याय ने व्यापक सार्वजनिक और कानूनी विमर्श को जन्म दे दिया है। ‘हमारे समाज में न्यायपालिका की भूमिका’ शीर्षक अध्याय में  न्यायिक व्यवस्था के समक्ष उपस्थित चुनौतियों का उल्लेख करते हुए ‘न्यायपालिका के विभिन्न स्तरों पर भ्रष्टाचार’ तथा न्यायाधीशों की कमी, जटिल विधिक प्रक्रियाओं और कमजोर अवसंरचना के कारण लंबित भारी बोझ को रेखांकित किया गया है। उल्लेखनीय है कि लगभग 80 हजार मामले सुप्रीम कोर्ट में, 60 लाख हाईकोर्ट्स में और करीब पांच करोड़ मामले निचली अदालतों में लंबित हैं।

पाठ्यपुस्तक में भ्रष्टाचार का उल्लेख करते हुए न्यायाधीशों की आचार-संहिता, शिकायत-निवारण तंत्र, 1,600 से अधिक शिकायतों तथा महाभियोग जैसी संवैधानिक प्रक्रिया का भी विवरण दिया गया है। इसमें केवल आरोप नहीं, बल्कि जवाबदेही की संरचना भी स्पष्ट की गई है। गंभीर मामलों में संसद ‘महाभियोग’ द्वारा न्यायाधीश को पदच्युत कर सकती है, यद्यपि यह प्रक्रिया समुचित जाँच और निष्पक्ष अवसर के बाद ही आगे बढ़ती है। यह स्वीकार किया गया है कि विशेषकर गरीब और वंचित वर्ग कभी-कभी भ्रष्टाचार का अनुभव करते हैं, इसलिए पारदर्शिता, प्रौद्योगिकी और त्वरित कार्रवाई के माध्यम से न्यायिक व्यवस्था में विश्वास सुदृढ़ करने के प्रयास जरूरी हैं।

विवाद का केंद्र यह नहीं था कि पाठ्यपुस्तक ने न्यायिक व्यवस्था की चुनौतियों का उल्लेख किया, बल्कि यह आपत्ति थी कि भ्रष्टाचार की चर्चा केवल न्यायपालिका के संदर्भ में की गई, जबकि राजनीति, कार्यपालिका और नौकरशाही जैसे अन्य क्षेत्रों में व्याप्त समस्याओं का समतुल्य उल्लेख नहीं था। कपिल सिब्बल और अभिषेक मनु सिंघवी सहित अनेक वरिष्ठ अधिवक्ताओं ने चीफ जस्टिस की अध्यक्षता वाली पीठ के समक्ष यह तर्क रखा कि इस प्रस्तुतिकरण से एक असंतुलित छवि निर्मित होती है, जो विद्यार्थियों में धारणा बना सकती है, मानो भ्रष्टाचार का प्रश्न मुख्यतः या विशिष्ट रूप से न्यायपालिका से ही जुड़ा है।

प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत ने इस विषय को गंभीर बताते हुए कहा कि वे ‘किसी को भी संस्था को बदनाम करने की अनुमति नहीं देंगे।’ उन्होंने संकेत दिया कि यह एक ‘सुनियोजित और गहन’ विषय हो सकता है। गौरतलब है कि सुप्रीम कोर्ट ने इस प्रकरण में केवल स्वतः संज्ञान लिया था; उसने न तो कोई अंतरिम प्रतिबंध लगाया था, न ही पाठ्यपुस्तक पर रोक का आदेश पारित किया था। इसके बावजूद सरकार ने न्यायालय की अंतिम टिप्पणी या विस्तृत सुनवाई की प्रतीक्षा किए बिना पूरी पुस्तक को ही वापस लेने का निर्णय कर लिया। यह प्रश्न स्वाभाविक है कि क्या यह कदम न्यायिक आदेश के अनुपालन में था, अथवा संभावित असहमति से पूर्व ही आत्मसमर्पण की प्रवृत्ति का संकेत? लोकतांत्रिक व्यवस्था में संस्थागत संवाद की अपेक्षा की जाती है, न कि आशंकाओं के आधार पर त्वरित वापसी की।


प्रश्न उठता है कि क्या न्यायपालिका, अधिवक्ताओं व सरकार द्वारा की गई कार्रवाई निष्पक्ष और विवेकपूर्ण थी? यदि पाठ्यपुस्तक में वही तथ्य उल्लिखित थे, जिन्हें स्वयं न्यायपालिका और पूर्व मुख्य न्यायाधीश भी समय-समय पर स्वीकार करते रहे हैं और जिनके परिप्रेक्ष्य में आत्ममंथन तथा संस्थागत सुधार की आवश्यकता पर बल दिया गया है, तो फिर उन्हें हटाना क्या वास्तव में समाधान कहा जा सकता है?

अतीत में कुछ न्यायाधीशों पर लगे गंभीर आरोपों ने न्यायपालिका की पारदर्शिता पर प्रश्न खड़े किए हैं—कर्नाटक उच्च न्यायालय के तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश पीडी दिनाकरन पर आय से अधिक संपत्ति के आरोपों के बाद महाभियोग की प्रक्रिया प्रारंभ हुई थी। इसी प्रकार, न्यायमूर्ति यशवंत वर्मा के आधिकारिक आवास से जले हुए नोटों की बरामदगी ने व्यापक सार्वजनिक बहस को जन्म दिया था। ऐसे प्रकरणों में जाँच धीमी संस्थागत प्रक्रिया के तहत आगे बढ़ती रही, किंतु जनमानस में यह प्रश्न बना रहा कि जवाबदेही त्वरित और दृश्य रूप में क्यों नहीं उभरती।

अधीनस्थ न्यायालयों पर यह आरोप उठते रहे हैं कि पेशियों की तिथियाँ बढ़वाने, कार्य-सूची में हेर-फेर करने या न्यायिक प्रक्रिया को प्रभावित करने हेतु रिश्वत का लेन-देन होता है।

विशेष रूप से जमानत संबंधी मामलों में यह धारणा भी व्यक्त की जाती रही है कि उच्चतम न्यायालय द्वारा प्रतिपादित सिद्धांतों के बावजूद निचली अदालतों में अनावश्यक विलंब या कठोरता देखी जाती है। यद्यपि ऐसे आरोप पूरी न्याय-व्यवस्था पर नहीं लगाए जा सकते, लेकिन उनकी पुनरावृत्ति संकेत देती है कि निचले स्तर पर निगरानी और पारदर्शिता को और सुदृढ़ करना आवश्यक है। न्यायपालिका की वास्तविक गरिमा केवल उच्च आदर्शों से नहीं, बल्कि प्रत्येक स्तर पर निष्पक्षता के प्रत्यक्ष अनुभवों से स्थापित होती है।

लोकतंत्र में संस्थाएँ केवल शक्तिशाली नहीं, उत्तरदायी भी होती हैं। यदि किसी संस्था पर लगे आरोपों की चर्चा को ही ‘अवमानना’ या ‘बदनामी’ मान लिया जाए, तो विमर्श का दायरा संकुचित हो सकता है। साथ ही, यह भी उतना ही सत्य है कि आलोचना तथ्याधारित, संतुलित और मर्यादित होनी चाहिए। यदि समर्थ संस्थाएँ आलोचनात्मक उल्लेख पर त्वरित दमनात्मक प्रतिक्रिया देंगी, तो यह प्रवृत्ति अन्य क्षेत्रों में भी उदाहरण बन सकती है।


‘एनसीईआरटी’ एक स्वायत्त शैक्षिक संस्था है, जिसका दायित्व अकादमिक मानकों और विशेषज्ञों की अनुशंसाओं के आधार पर पाठ्यक्रम निर्धारण करना है; किंतु समय-समय पर उस पर राजनीतिक अथवा वैचारिक दबावों के आरोप लगते रहे हैं। इतिहास की पुस्तकों में अध्यायों के पुनर्लेखन और विलोपन के विवाद तो चर्चित रहे ही हैं, परंतु विज्ञान के क्षेत्र में भी बहस उठी है, विशेषतः जब कक्षा 9–10 के पाठ्यक्रम से चार्ल्स डार्विन के ‘विकासवाद’ के सिद्धांत से संबंधित अंशों को हटाए जाने का निर्णय लिया गया। ऐसे प्रसंग शिक्षा की स्वायत्तता, वैज्ञानिक दृष्टिकोण और अकादमिक स्वतंत्रता पर व्यापक प्रश्न खड़े करते हैं।

यह विवाद केवल एक अध्याय का नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक परिपक्वता की वास्तविक परीक्षा का है। न्यायपालिका की गरिमा और जनविश्वास की रक्षा उतनी ही अनिवार्य है जितना यह सुनिश्चित करना कि हमारी शिक्षा यथार्थ से आंखें न मूंदे। संस्थाओं की मजबूती आलोचना के अभाव में नहीं, बल्कि पारदर्शिता, आत्मसुधार और निर्भीक संवाद से ही आती है। सवाल यह नहीं कि भ्रष्टाचार का उल्लेख क्यों हुआ, बल्कि यह है कि क्या हमारी संस्थाएँ इतनी आत्मविश्वासी हैं कि वे आलोचनात्मक विमर्श को चुनौती के रूप में स्वीकार कर सकें। लोकतंत्र में न्याय, शिक्षा और अभिव्यक्ति—तीनों का संतुलित होना ही असली संस्थागत गरिमा की कसौटी है, और यही हमारी सच्ची परीक्षा है। (सप्रेस) 

(अरूण कुमार डनायक लेखक व सामाजिक कार्यकर्त्ता हैं।)

Google न्यूज़नवजीवन फेसबुक पेज और नवजीवन ट्विटर हैंडल पर जुड़ें

प्रिय पाठकों हमारे टेलीग्राम (Telegram) चैनल से जुड़िए और पल-पल की ताज़ा खबरें पाइए, यहां क्लिक करें @navjivanindia