असम में गहन पुनरीक्षण यानी SIR से क्यों बच रहा चुनाव आयोग?
असम एनआरसी में 19 लाख लोग नागरिकता साबित नहीं कर पाए थे। ये कट जाते, तो बीजेपी को ही सबसे ज्यादा घाटा होता। हाल ही में सीएम हिमंत बिस्वा सरमा ने कहा था कि इन 19 लाख लोगों में 7 लाख मुस्लिम थे।

कभी-कभी एक छोटी सी हरकत किसी व्यक्ति के चरित्र का पर्दाफाश कर देती है। ऐसा ही चुनाव आयोग के साथ हुआ। इसी 27 अक्टूबर को चुनाव आयोग ने प्रेस कांफ्रेंस कर देश के 12 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में एसआईआर यानी निर्वाचन सूची के “विशेष गहन पुनरीक्षण” का आदेश जारी किया। लेकिन उसमें असम शामिल नहीं था, हालांकि वहां भी अप्रैल में चुनाव होने वाले हैं। फिर चुनाव आयोग ने चुपचाप 17 नवंबर को असम की मतदाता सूची के “विशेष पुनरीक्षण” का आदेश जारी किया। मीडिया ने इस पर कोई ध्यान नहीं दिया। लेकिन यह विचित्र आदेश चुनाव आयोग और बीजेपी की जुगलबंदी की कलई खोल देता है।
सबसे पहले याद कीजिए कि एसआईआर के पक्ष में क्या दलील दी गई थी। पहले दिन से चुनाव आयोग की यही रट है कि एसआईआर यह सुनिश्चित करने के लिए है कि केवल भारत का नागरिक ही वोटर बन सके। वोटर लिस्ट से विदेशी नागरिकों की छंटाई को चुनाव आयोग एसआईआर का एक उद्देश्य बताता है। इसीलिए एसआईआर में हर वोटर से नागरिकता का सबूत मांगा जा रहा है। इसीलिए चुनाव आयोग आधार कार्ड को पर्याप्त सबूत मानने के लिए तैयार नहीं है — चूंकि आधार कार्ड भारत की नागरिकता का सबूत नहीं है। चुनाव आयोग दबी जुबान से और बीजेपी प्रवक्ता उछल-उछल कर कहते हैं कि वोटर लिस्ट में बड़ी संख्या में विदेशी हैं, जिन्हें बाहर निकालने की जरूरत है।
अब आप अपने आप से पूछिए कि भारत में विदेशी अप्रवासियों की समस्या किस राज्य में सबसे गंभीर है। जाहिर है इस प्रश्न का एक ही उत्तर है - असम। मुद्दा आज का नहीं है, कम-से-कम 50 साल पुराना है। विदेशी अप्रवासियों के मुद्दे पर ऐतिहासिक असम आंदोलन हुआ। राजीव गांधी के समय नागरिकता के प्रश्न पर ही असम समझौता हुआ। पिछले चालीस बरस से उसे लागू करने पर विवाद चल रहा है। असम की वोटर लिस्ट में “डी वोटर” यानी डाउटफुल वोटर (संदिग्ध मतदाता) को चिन्हित करने पर बवाल मचा। इसे सुलझाने के लिए सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में असम में एनआरसी (राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर) का सर्वे हुआ। देश में किसी और राज्य में नागरिकता की जांच को लेकर इतनी बड़ी कवायद और उसके बारे में इतना बड़ा बवाल कहीं नहीं हुआ।
अब पहली और दूसरी बात को जोड़कर उसका निष्कर्ष निकालिए। अगर देश में कहीं भी वोटर लिस्ट में नागरिकता की जांच की जरूरत है, तो वह राज्य है असम। अगर एसआईआर के पक्ष में दी गई दलील सच है, तो एसआईआर सबसे पहले असम में होना चाहिए था।
अब आप चुनाव आयोग की कारगुजारी को देखिए। जब अन्य राज्यों में एसआईआर की घोषणा से असम को बाहर रखे जाने पर सवाल पूछा गया, तो मुख्य चुनाव आयुक्त का जवाब था कि असम के नागरिकता के नियम बाकी देश से अलग हैं। इसलिए वहां का आदेश अलग आएगा। इसका अर्थ यही हो सकता था कि असम में एसआईआर को बाकी देश की तुलना में ज्यादा कड़ा बनाया जाएगा। बाकी देश में जहां 2002 की वोटर लिस्ट को प्रमाणित माना जा रहा है, वहां असम में 1971 का प्रमाण मांगा जाएगा। चूंकि एनआरसी के माध्यम से यह प्रक्रिया पूरी हो चुकी है, इसलिए असम में वोटर लिस्ट का गहन ही नहीं, गहनतम पुनरीक्षण होगा।
अब तैयार हो जाइए चुनाव आयोग की पलटबाज़ी के लिए। 17 नवंबर को चुनाव आयोग ने असम के लिए जो आदेश जारी किया है, वह ज्यादा कड़ा होने की बजाय आश्चर्यजनक रूप से उदार है। चुनाव आयोग ने एसआईआर यानी “विशेष गहन पुनरीक्षण” से गहन शब्द को गायब कर दिया है। असम में केवल “विशेष पुनरीक्षण” होगा। मामला सिर्फ शाब्दिक बदलाव का नहीं है। वोटर लिस्ट के पुनरीक्षण की छलनी को असम में ज्यादा बारीक बनाने की बजाय चुनाव आयोग ने वहां इस छलनी को हटा दिया है।
इसका व्यावहारिक अर्थ देखिए। बाकी सारे देश में हर वोटर को एन्युमेरेशन फॉर्म (गणना प्रपत्र) भरना होगा, लेकिन असम में किसी को कोई फॉर्म नहीं भरना होगा। बीएलओ आपके घर आएगा और वोटर लिस्ट में नामों की पुष्टि करेगा, जरूरत हो तो संशोधन करेगा। बस हो गया पुनरीक्षण। बाकी देश में आपको 2002 की वोटर लिस्ट में अपना या अपने रिश्तेदार का नाम होने का सबूत देना होगा, अगर नहीं हो तो यह बताना होगा कि उस समय आपका परिवार कहां था। लेकिन असम में यह सवाल ही नहीं पूछा जाएगा।
अगर आप 2002 का सबूत नहीं दे पाए, तो बाकी देश के हर वोटर को दस्तावेज पेश करने होंगे, अपनी नागरिकता साबित करनी पड़ेगी। लेकिन असम में इस झंझट को खत्म कर दिया गया है। किसी को कोई दस्तावेज दिखाने की जरूरत ही नहीं होगी। काश यह सरल, सुगम, और पारदर्शी व्यवस्था देश के हर राज्य में लागू होती।
सिर चकरा गया ना आपका? एक कड़वी दवा पूरे देश को जबरदस्ती पिलाई जा रही है। कहा जा रहा है की एक खतरनाक बीमारी से बचने के लिए आपको इस दवा की जरूरत है। लेकिन जिस एक मरीज को वह बीमारी होने का प्रमाण है, उसे बिना किसी दवा के अस्पताल से छुट्टी दी जा रही है।
अगर इस उलटबांसी को समझने में परेशानी हो, तो यह अंतिम सुराग समझ लीजिए। दरअसल, असम में सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर हर व्यक्ति के कागजों की जांच हो चुकी है। छह साल तक चली इस प्रक्रिया के अंत में असम में कुल 19 लाख ऐसे लोग पाए गए जो भारत की नागरिकता साबित नहीं कर पाए, जिनका नाम नागरिकता के राष्ट्रीय रजिस्टर से बाहर रखा गया। अब आप सोचेंगे की फिर तो चुनाव आयोग का काम आसान है — इन 19 लाख को वोटर लिस्ट से बाहर कर दिया जाए।
लेकिन असली खेल समझने के लिए आपको जानना होगा कि यह 19 लाख गैर नागरिक कौन हैं? इनका वोट काटने से किसे नुकसान होगा? इसके आंकड़े औपचारिक रूप से सार्वजनिक नहीं हुए हैं, लेकिन हर कोई जानता था कि बांग्लादेश से अवैध तरीके से आए इस 19 लाख में अधिकांश मुसलमान नहीं बल्कि हिन्दू हैं। हाल ही में असम के मुख्यमंत्री हेमंत बिस्वा सरमा ने मीडिया के सामने बयान में स्वीकार किया कि इन 19 लाख में केवल 7 लाख मुसलमान हैं। बाकी हिन्दू हैं। कुछ बंगाली हिन्दू, कुछ असमी हिन्दू तो कुछ गोरखा हिन्दू। यह तथ्य किसी से छुपा नहीं है कि असम में भाजपा ने बंगाली हिन्दुओं में सबसे पहले अपनी पैठ बनाई थी। यानी कि अगर असम में वोटर लिस्ट का गहन पुनरीक्षण हो जाता और सभी 19 लाख नाम कट जाते, तो सबसे बड़ा घाटा भाजपा को होता।
अब आया खेल समझ में? चुनाव आयोग और भाजपा में जुगलबंदी है या नहीं? या अब भी कोई शक बाकी है?