युद्ध रुकवाने में क्यों किसी देश की सक्रिय भूमिका नहीं दिख रही!
क्या दुनिया की मौजूदा शक्ति संरचना वास्तव में शांति स्थापित करने में सक्षम है, या फिर यह व्यवस्था स्वयं संघर्षों को बनाए रखने वाली संरचना में बदल चुकी है।

आज की वैश्विक राजनीति में युद्ध केवल दो देशों के बीच का टकराव नहीं रह गया है; वह महाशक्तियों की रणनीति, कूटनीतिक संतुलन और आर्थिक हितों की जटिल संरचना से जुड़ा हुआ प्रश्न बन गया है।
हाल के समय में ईरान के विरुद्ध चल रहे हमलों और बढ़ते युद्ध तनाव के संदर्भ में यह प्रश्न बार-बार उठ रहा है कि चीन और रूस जैसे बड़े देश केवल निंदा वाले बयान देकर अपनी भूमिका पूरी क्यों मान लेते हैं। वे अपनी शक्ति और प्रभाव का ठोस दबाव क्यों नहीं बना रहे, जिससे युद्ध को रोका जा सके।
वास्तविकता यह है कि अंतरराष्ट्रीय राजनीति में नैतिकता की तुलना में रणनीतिक हित अधिक निर्णायक होते हैं। जब ईरान के खिलाफ हमले होते हैं और उसके जवाब में तनाव बढ़ता है, तब कई देश औपचारिक रूप से शांति और संयम की अपील करते हैं। लेकिन इस अपील के साथ वे ऐसा कोई कदम नहीं उठाते जो संघर्षरत शक्तियों को वास्तव में रोक सके। यही कारण है कि निंदा के बयान तो लगातार आते हैं, लेकिन युद्ध की प्रक्रिया पर उनका कोई ठोस प्रभाव नहीं पड़ता।
इसके पीछे सबसे बड़ा कारण महाशक्तियों के बीच संतुलन की राजनीति है। आज की दुनिया में शक्ति के दो बड़े ध्रुव दिखाई देते हैं—एक ओर संयुक्त राज्य अमेरिका और उसके सहयोगी देश हैं, जिनमें इज़राइल प्रमुख है; दूसरी ओर चीन और रूस जैसे देश हैं जो पश्चिमी प्रभुत्व को चुनौती देने की कोशिश करते हैं। लेकिन यह चुनौती हमेशा प्रत्यक्ष सैन्य टकराव के रूप में नहीं होती। वे अक्सर कूटनीतिक विरोध और सीमित समर्थन तक ही खुद को सीमित रखते हैं, क्योंकि उन्हें यह डर भी रहता है कि सीधी टक्कर तीसरे विश्व युद्ध जैसी स्थिति पैदा कर सकती है।
चीन की नीति विशेष रूप से इस संदर्भ में समझने योग्य है। चीन स्वयं को वैश्विक आर्थिक शक्ति के रूप में स्थापित करना चाहता है और उसकी प्राथमिकता व्यापार, निवेश और आर्थिक विस्तार है। इसलिए वह सैन्य टकराव से बचते हुए अक्सर मध्यस्थता और संतुलन की भूमिका निभाने का प्रयास करता है। वह युद्ध की निंदा तो करता है, लेकिन प्रत्यक्ष सैन्य हस्तक्षेप या कठोर दबाव की राह पर आसानी से नहीं जाता।
रूस की स्थिति भी कुछ अलग नहीं है। रूस पहले से ही यूक्रेन के साथ लंबे और जटिल युद्ध में उलझा हुआ है। इस युद्ध ने उसकी सैन्य और आर्थिक ऊर्जा का बड़ा हिस्सा घेर रखा है। ऐसी स्थिति में रूस के लिए मध्य-पूर्व के संघर्ष में प्रत्यक्ष रूप से उतरना आसान नहीं है। इसलिए वह राजनीतिक समर्थन, कूटनीतिक बयान और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर विरोध तक ही अपनी भूमिका सीमित रखता है।
इसके साथ ही एक और तथ्य भी ध्यान देने योग्य है कि महाशक्तियाँ अक्सर युद्ध को पूरी तरह रोकने के बजाय उसे नियंत्रित करने की रणनीति अपनाती हैं। वे चाहते हैं कि संघर्ष इतना बढ़े कि उनके भू-राजनीतिक हित पूरे होते रहें, लेकिन इतना भी न बढ़े कि स्थिति उनके नियंत्रण से बाहर हो जाए। इसीलिए कई बार ऐसा लगता है कि युद्ध को रोकने के लिए गंभीर प्रयास नहीं किए जा रहे, बल्कि केवल प्रतीकात्मक विरोध दर्ज कराया जा रहा है।
संयुक्त राष्ट्र जैसी संस्थाएँ भी इसी शक्ति संतुलन की राजनीति से प्रभावित होती हैं। सुरक्षा परिषद में स्थायी सदस्य देशों के पास वीटो का अधिकार है, जिसके कारण कई बार स्पष्ट कार्रवाई संभव नहीं हो पाती। परिणाम यह होता है कि निंदा प्रस्ताव, बयान और अपीलें तो जारी होती रहती हैं, लेकिन युद्ध को रोकने के लिए ठोस सामूहिक कदम नहीं उठ पाते।
इस पूरे परिदृश्य को देखने पर यह भी स्पष्ट होता है कि आज की वैश्विक व्यवस्था में “नैतिक नेतृत्व” का संकट गहरा गया है। शांति, मानवता और अंतरराष्ट्रीय कानून की बातें तो की जाती हैं, लेकिन जब वास्तविक हस्तक्षेप या दबाव बनाने की जरूरत पड़ती है, तब अधिकांश शक्तियाँ अपने राष्ट्रीय हितों को प्राथमिकता देती हैं।
इस स्थिति का सबसे दुखद पहलू यह है कि युद्ध का वास्तविक बोझ आम लोगों पर पड़ता है—नागरिकों पर, बच्चों पर, और उन समाजों पर जो पहले से ही आर्थिक और राजनीतिक संकटों से जूझ रहे होते हैं। जबकि महाशक्तियाँ दूर बैठकर बयान जारी करती हैं और रणनीतिक गणनाएँ करती रहती हैं।
इसलिए यह कहना गलत नहीं होगा कि आज की अंतरराष्ट्रीय राजनीति में “निंदा” कई बार एक औपचारिक कूटनीतिक भाषा बनकर रह गई है। जब तक शक्तिशाली देश अपने वास्तविक प्रभाव का उपयोग करके युद्धरत पक्षों पर ठोस दबाव नहीं बनाते, तब तक केवल बयानबाजी से युद्ध रुकना लगभग असंभव है।
वर्तमान स्थिति हमें यह सोचने पर मजबूर करती है कि क्या दुनिया की मौजूदा शक्ति संरचना वास्तव में शांति स्थापित करने में सक्षम है, या फिर यह व्यवस्था स्वयं संघर्षों को बनाए रखने वाली संरचना में बदल चुकी है। जब तक इस प्रश्न का ईमानदार उत्तर नहीं खोजा जाता, तब तक निंदा के बयान आते रहेंगे और युद्ध की आग भी किसी न किसी रूप में जलती रहेगी
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