इस तरह क्यों गूंज रहीं पुणे की बातें

स्त्री-पुरुष समानता के पक्षधरों के उल्लास और स्त्री को हीन-उपेक्षित बनाए रखने की मानसिकता वालों के दुख को समझा जा सकता है।

पुणे में हुए छात्रों की गूंज कार्यक्रम में राहुल गांधी पितृसत्तात्मक सोच पर खुलकर विचार रखे
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अब तक की राजनीति देश के प्रौढ़ों से मुखातिब रही है। पर जंतर-मंतर वाली युवा पीढ़ी के दुस्साहसी और सफल आंदोलन के बाद अब वह युवाओं और किशोरों से मुखातिब होने के लिए मुड़ गई है। राहुल गांधी 'छात्रों की गूंज' नामक गैर-राजनीतिक कार्यक्रम की श्रृंखला के जरिये इसे धार दे रहे हैं। इसी कड़ी में हाल में पुणे में भी आयोजन किया गया। इस बार केवल लड़कियों को आमंत्रित किया गया था, जबकि पहले के आयोजनों में छात्र-छात्राओं की सम्मिलित उपस्थिति थी। 'छात्रों की गूंज' एक तरह से छात्रों की मुनादी बन चुकी है, जो शिक्षा व्यवस्था में चल रहे कई किस्म के घालमेलों के खिलाफ न केवल सरकार को चेताती है, बल्कि देश की सबसे नई पीढ़ी को आगे आकर ललकारने का हौसला भी प्रदान करती है।

पुणे के आयोजन से इसे एक और मोड़ मिला। वह सड़ चुकी परीक्षा व्यवस्था के जरिये छात्रों के भविष्य को चौपट कर देने की मुखालफत से एक कदम आगे बढ़कर इस बार राजनीतिक कदमों के इतिहास में भी एक कदम आगे बढ़ाता दिखा। अप्रत्यक्ष रूप से भारतीय समाज में गहरी पैठ बना चुकी आदिम पुरुषसत्ताक-प्रवृत्तियों से भी मुठभेड़ करने की ललकार उसमें प्रकट हुई। आदिम कबीला संस्कृति में पुरुषों द्वारा भूमि, पशुओं और स्त्री पर आधिपत्य जमा लेने को ही विजय और वीरता मानने की परंपरा बनी। समाज सभ्यता की सीढ़ियां चढ़ता रहा, पर बहुत सी आदिम प्रवृत्तियां उसके अवचेतन में शेष बनी रह गई हैं। ऐसी ही एक स्मृति है, स्त्रियों को अबला, बुद्धिहीन और पुरुषों की तुलना में दोयम दर्जे वाला प्राणी मानना। सभी गालियों में स्त्री को ही बेधने के पीछे भी इसी आदिम प्रवृत्ति की रेख को देखा जा सकता है।

भारतीय स्त्रियों ने अपने कौशल, चातुर्य और मेधा से बार-बार साबित किया है कि वे पुरुषों की तुलना में कमजोर नहीं हैं। प्रकृति ने उन्हें पुरुषों की तुलना में ज्यादा कोमल, ज्यादा संवेदनाशील और ज्यादा भावुक बनाया है, तो इसका तात्पर्य उसका दोयम दर्जे का हो जाना नहीं है। प्रतियोगी परीक्षाओं में पेपर लीक होने से लड़कों का जो और जितना नुकसान होता है, लड़कियों का उससे कई गुना ज्यादा नुकसान होता है। उनकी पढ़ाई रोक दी जाती है। माता-पिता की ओर से विवाह करवा देने की जिद और कठोर हो जाती है। उनके सपने चूर हो जाते हैं। वे अपना निजी व्यक्तित्व गढ़ने से वंचित हो जाती है।

राहुल गांधी ने नई पीढ़ी के साथ जुड़कर, राजनीति की निरंतर एकल होती जा रही छवि में, समाज की अनिवार्यता को जोड़ने की शुरुआत की है। इसके पहले महात्मा गांधी ने यही काम किया था। उन्होंने महिला उत्थान के लिए पर्दा प्रथा, बाल विवाह, दहेज प्रथा का विरोध, महिलाओं की शिक्षा और समाज में बराबरी की पैरवी करने वाले कलापों को जोड़ा था। उन्होंने ग्राम स्वराज और स्वदेशी विचारों से गांवों और कुटीर उद्योगों को बढ़ावा देकर ग्रामीण भारत को आर्थिक रूप से मजबूत बनाने के कार्यक्रम किए थे। उन्होंने नई तालीम के जरिये बुनियादी शिक्षा की नींव रखी थी। वे सांप्रदायिक सद्भाव और शांति के पक्ष में लगातार जुटे रहे और इसी की खातिर उन्होंने अपने प्राण भी दे दिए।


पुणे में मंच के स्क्रीन पर मनुस्मृति के एक श्लोक का अंग्रेजी अनुवाद दर्शाया गया था। मनुस्मृति में दो ऐसे श्लोक मिलते हैं, जिनका लगभग समान अर्थ ही है।

बाल्ये पितुर्वषे तिष्ठेत् पाणिग्राहस्य यौवने।

पुत्राणां भर्तरि प्रेते न भजेत्स्त्री स्वतंत्रताम।।

(मनुस्मृति, अध्याय 5, श्लोक 148)

और

पिता रक्षति कौमारे भर्ता रक्षति यौवने।

रक्षन्ति स्थविरे पुत्रा न स्त्री स्वातंत्र्यमर्हति।।

(मनुस्मृति, अध्याय 9, श्लोक 3)

इनका अर्थ हैः स्त्री को बचपन में अपने पिता की, युवावस्था में पति की और पति की मृत्यु हो जाने पर पुत्रों की रक्षा में रहना चाहिए। उसे कभी भी स्वतंत्र नहीं रहना चाहिए।

इस श्लोक का उपयोग राहुल गांधी ने प्रतीक के तौर पर किया। उनका प्रयास उस भाव और विचार को प्रकट करना था, जो हजारों सालों बाद भी हमारे अचेतन में दबा हुआ है। मनुस्मृति ग्रंथ जिस काल में रचा गया था, उसमें तत्कालीन समाज और उसके सामाजिक मूल्यों का वर्णन मिलता है। समय के साथ समाज और समाज के मूल्य बदलते रहते हैं। भारतीय समाज भी बहुत से परिवर्तनों को आत्मसात करता हुआ आज की स्थिति में पहुंचा है। परिवर्तनों के बावजूद कुछ रुढ़ियां फिर भी बची रह जाती हैं और वे संस्कार का हिस्सा हो जाती हैं। ऐसी ही रुढ़ि है स्त्रियों के प्रति समाज का यह नजरिया कि उन्हें अपनी अलग-अलग अवस्था में किसी न किसी पुरुष के संरक्षण में रहना चाहिए। वे स्वाधीन रहने के योग्य नहीं हैं।

पुणे के आयोजन में कई हजार युवा और किशोर लड़कियों ने भागीदारी की थी और उनमें से बहुतों ने मंच से अपने साथ होने वाले व्यवहार को अपनी भाषा, भंगिमा और व्यंजना से सार्वजनिक किया था। जो बोल रही थीं, वे करुणा, दुख और आक्रोश से भरी हुई थीं। जो सुन रही थीं, वे स्त्री-आवाज को मंच पर स्थान मिलने के आह्लाद से सराबोर थीं। उनके जीवन का सत्य उजागर हो रहा था। वह मन की बात सुनाने का नहीं, मन की बात सुनने का मंच था। मीडिया उसे दूर-दूर तक पहुंचा रहा था।

भारतीय राजनीति के लिए यह बिल्कुल नया अनुभव था। जो स्त्री-पुरुष समानता के पक्षधर हैं, वे उल्लसित हो रहे थे, जबकि स्त्री को हीन और उपेक्षित बनाए रखने की मानसिकता से ग्रस्त समूहों ने इसे अपने ऊपर किए जाने वाले प्रहार की तरह लिया। परोक्ष रूप से पुनरुत्थानवादी मानसिकता पर विश्वास करने वाली भाजपा और संघ के अंदर खिसियाहट पैदा हो गई है। भाजपा सरकार की दिखावटी नारी शक्ति वंदना के बरक्स यह वास्तविक नारी शक्ति वंदना साबित हुई है। वे स्त्रियों के मतों को बिकाऊ मान कर चलते हैं और यह भी सोचते हैं कि उन्हें बेवकूफ बनाया जा सकता है।

जो नारी शक्ति वंदन अधिनियम (महिला आरक्षण बिल) सितंबर 2023 में भारतीय संसद के विशेष सत्र के दौरान दोनों सदनों से पारित हो चुका है, वे उसे लागू करने की बजाय अब तक ठंडे बस्ते में डाले हुए हैं। संपूर्ण विपक्ष के समर्थन से पास हुए बिल को लागू करने की मांग प्रतिपक्ष बार-बार दोहरा रहा है। पर बीजेपी देश को बता रही है कि वह अभी पारित होना है। वह परिसीमन बिल को अपनी स्वार्थपूर्ति के लिए नारी शक्ति वंदन अधिनियम के खोल में डाल कर चुपके से पारित कराने की जुगत में लगी है, जो मुमकिन नहीं हो पा रही है।


एक धर्माचार्य ने राहुल गांधी के पुणे-कार्यक्रम को मनुस्मृति के जरिये सनातन पर हमला माना है। उन पर हंसने के सिवाय और कुछ नहीं किया जा सकता। उनके लिए कबीरदास की ये पंक्तियां ही पर्याप्त हैंः

अंबर बरसै, धरती भीजै, यह जानै सब कोई।

धरती बरसै, अंबर भीजै, बूझै बिरला कोई।।

आसमान से पानी का बरसना सब जानते हैं, पर धरती के बरसने से ही बादलों का निर्माण होता है, इसे जानने में श्रम, बुद्धि और वक्त लगता है। कबीर की इस उलटबांसी की तरह इन दिनों भारतीय राजनीति में भी उलटबासंसियों का दौर चल रहा है। अपने को समझदार समझने का दंभ पालने वाले उसे समझ पाने में असमर्थ हो रहे हैं और नासमझ सब समझ रहे हैं।

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राजेंद्र चन्द्रकान्त राय जाने-माने कथाकार और शिक्षा क्षेत्र के एक्टिविस्ट हैं

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