आकार पटेल का लेख: पारंपरिक संगीत और कला की गुमशुदगी पर आखिर चुप क्यों हैं सरकार और कार्पोरेट

कला के लगातार क्षरण पर न तो हमारे कॉर्पोरेट्स और न ही फ्लेंथ्रोपिस्ट या हमारे उच्च शिक्षण संस्थान कुछ कर रहे हैं। ब्यूना विस्ता सोशल क्लब की याद दिलाने के साथ-साथ मंगनियारों पर बनी डॉक्युमेंट्री देखकर भी यही बात खटकती है।

पद्मश्री लाखा खान सारंगी पर और उनके पुत्र दाने खान ढोलक पर स्वीडन में हुए एक संगीत समारोह में (फोटो : Getty Images)
पद्मश्री लाखा खान सारंगी पर और उनके पुत्र दाने खान ढोलक पर स्वीडन में हुए एक संगीत समारोह में (फोटो : Getty Images)
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आकार पटेल

कुछ दशक पहले, अमेरिकी संगीतकार राय कूडर ने क्यूबा का दौरा किया था। उनका इरादा इस द्वीप देश के उन महान संगीतकारों से फिर से मिलना था जिन्हें अमेरिकी प्रतिबंधों के चलते भुला दिया गया था और उनके हुनर और कला पर पाबंदियां लगा दी गई थीं। इनमें गायक इब्राहिम फेरर भी शामिल थे, जो जिंदगी चलाने के लिए जूते पॉलिश करते थे, पियानो वादक रूबेन गोंजालेज, जिनकी हालत ऐसी थी कि वे एक पियानो तक नहीं खरीद सकते थे और यही हाल गिटार वादक कॉम्पे सेगुंडो का था।

कूजर की दिलचस्पी इन सभी संगीतकारों को फिर से आम लोगों के बीच लाने में थी। इन संगीतकारों की जिंदगी पर ब्यूना विस्ता सोशल क्लब नाम की फिल्म बनी थी जो एक अंतरराष्ट्रीय हिट साबित हुई थी।

इसी तरह दिल्ली में आशुतोष शर्मा और अंकुर मल्होत्रा नाम के दो शख्स राजस्थान के भूले-बिसरे संगीतकारों की जिंदगी के लिए भी कर रहे हैं। ये संगीतकार मंगनियार समुदाय से हैं जो मुख्यत: राजस्थान और पूर्वी सिंध के इलाकों में पाए जाते हैं। ये लोग सदियों से इन इलाकों में लोकसंगीत का प्रदर्शन करते आ रहे हैं।

लाखा खान (फोटो : Getty Images)
लाखा खान (फोटो : Getty Images)
Robbie Jack

कई बरसों से मल्होत्रा और शर्मा (जिन्हें मैं करीब 25 साल से जानता हूं) यात्राएं कर रहे हैं और इन बेहद कुशल कलाकारों के संगीत को बढ़ावा दे रहे हैं। इनका संगीत ऐसा है कि अब तो इनका अपना देश भी शायद ही इसके बारे में अधिक जानता हो। अब आगा खान म्यूजियम ने तीन किस्तों की एक डॉक्यूमेंट्री इन संगीतकारों पर बनाई है। इसे ‘सर्चिंग फॉर द ब्लूज़’ का नाम दिया गया है। इस डॉक्यूमेंट्री के लिए सामग्री इन्हीं दोनों की रिकॉर्ड फर्म ‘अमररस’ ने तैयार की है।

जब यह डाक्यूमेट्री बनाई जा रही थी, तभी मैंने इसे देखा था, और इसके तैयार होने के बाद इसे आगा खान म्यूजियम की वेबसाइट पर पूरा देखा। मैं कह सकता हूं कि यह हमारे समय की सबसे उल्लेखनीय कहानियों में से एक है, और ‘ब्यूना विस्ता सोशल क्लब’ जितनी महत्वपूर्ण है। एक दशक पहले जब इन संगीतकारों की तलाश में गांव-गांव घूम रहे थे और उस दौरान वे जिन संगीतकारों से मिले थे, उनमें से एक जोधपुर के रानेरी गाँव के लाखा खान थे। उस समय लाखा खान को संगीत साधना करते और गाते हुए करीब आधी सदी हो चुकी थी। वे गुजर-बसर के लिए शादी और जन्मदिन समारोहों में अपनी कला का प्रदर्शन करते थे। (मंगनियारों के चाहने वालों में आमतौर पर स्थानीय सामंती राजपूत ही हैं)। लाखा खान उन्हीं परिवारों के लिए संगीत का प्रदर्शन कर रहे थे जिनके लिए उनके दादा-परदादा सगियों से करते आ रहे थे। यहाँ तक कि उनका वाद्य यंत्र भी वही था जो उन्हें उनके पुरखों से मिला था, लेकिन वह अभी भी मधुर ध्वनियां निकालता था।


यह वाद्ययंत्र दरअसल एक सिंधी सारंगी है, जिसकी ध्वनि मानव ध्वनि से बहुत मिलती जुलती है। अपने परिवार में लाखा खान सातवीं पीढ़ी हैं जो इस वाद्ययंत्र को बजाते हैं। वे जब मल्होत्रा और शर्मा से मिले तो उन्होंने उनके लिए कुछ हिंदू भजन, कुछ सूफी कलाम और कुल लोक संगीत पांच भाषाओं में पेश किए। इन भाषाओं में सेरायकी, सिंधी, मारवाड़ी, पंजाबी और हिंदी शामिल थी।

संगीत की बारीकियों और मधुरता से चकित इन दोनों को लाखा खान का संगीत सुनकर ब्लूज़ की याद आ गई। ब्लूज दरअसल अमेरिकी संगीत की एक विद्या है जिसमें धार्मिक और आध्यात्मिक संगीत का मिलन होता है। इन दोनों ने खान के संगीत को रिकॉर्ड किया और फिर इसे लोगों तक पहुंचाने का काम किया। इसके बाद लाखा खान को एक बार फिर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर व्यापक रूप से अपने संगीत का प्रदर्शन करने का मौका मिला। (डॉक्यूमेंट्री में लाखा खान के अंतरराष्ट्रीय संगीत कार्यक्रमों की तस्वीरें और फिल्म है)। 2021 में, लाखा खान को पद्म श्री से सम्मानित किया गया, जिसके बाद एक बार फिर लाखा खान का नाम संगीत क्षेत्र में प्रमुखता से सामने आया।

दाने खान (फोटो : Getty Images)
दाने खान (फोटो : Getty Images)
Pacific Press

लाखा खान राजस्थान के उन तमाम महिला-पुरुषों में से एक हैं जिन्हें डॉक्यूमेंट्री में हमारे सामने पेश किया गया है। और यह ताज्जुब की बात है कि हम में से कई लोगों के लिए, और उनके लिए भी जिन्हें संगीत का व्यापक अनुभव है, अपने ही देश के इन विश्व स्तरीय कलाकारों को नहीं जानते हैं। डॉक्यूमेंट्री के आखिरी एपिसोड में लाखा खान के बेटे दाने खान भी हैं। कुछ समय पहले तक दाने खान ट्रक चलाता था क्योंकि सिर्फ संगीत की पारिवारिक परंपरा से गुजारा नहं हो पाता था। लेकिन खुशी की बात यह है कि उसके पिता की बढ़ती प्रतिष्ठा और लगातार विदेशी दौरों ने संगीत की इस आठवीं पीढ़ी के लिए परंपरा को जारी रखते हुए दाने खान को भी अपने परिवार को भी संगीत साधन में वापसी का मौका दिया है।

बेशक यह हमारी संस्कृति के लिए अच्छी खबर है, जिसे एक जरिया मिल गया है, जिसके बाद इस संगीत परंपरा को कुछ और दशकों तक आगे ले जाने में मदद मिलेगी। लेकिन इससे हमें यह भी पता चलता है कि कितना कुछ करने की जरूरत है। लाखा खान जैसे हजारों लोग हमारे सामूहिक खजाने को संजोए हुए लगभग गुमनामी में रहते हैं? दाने खान जैसे कितने लोग इस खजाने को हासिल कर पाएंगे और इसे अगली पीढ़ी तक नहीं पहुंचा पाते हैं। हमें खुशी है कि लाखा खान के परिवार को आखिर संगीत की मंजिल मिल गई, लेकिन इससे हमें क्या सबक मिलता है, इस पर भी विचार करना चाहिए।


उच्च संस्कृति यानी शास्त्रीय और लोक संगीत और नृत्य और रंगमंच को बढ़ावा देना सरकारी तौर पर इस समय सबसे निम्नतम स्तर पर है। इसका एक कारण यह हो सकता है कि इस संस्कृति से कम लोग जुड़े हुए हैं और शास्त्रीय और पारंपरिक की तुलना में लोकप्रिय चीज़ों की ओर अधिक आकर्षित होते हैं। दूसरा कारण यह हो सकता है कि सरकार ने खुद ही इन क्षेत्रों को प्रोत्साहन से कदम खींच लिए हैं।

संगीत और रंगमंच के लिए दशकों पहले तीन संस्थाओं की स्थापना हुई थी। संगीत और रंगमंच के लिए संगीत नाटक अकादमी (1953), साहित्य के लिए साहित्य अकादमी और 1954 में और स्थापत्य कला के लिए ललित कला अकादमी (1954) की स्थापना हुई थी। लेकिन कला के लिए कुछ खास नहीं किया जा रहा है। न तो ये संस्थाएं कुछ कर रही हैं और न ही आम लोग। कला के लगातार क्षरण पर न तो हमारे कॉर्पोरेट्स और न ही फ्लेंथ्रोपिस्ट या हमारे उच्च शिक्षण संस्थान कुछ कर रहे हैं। ब्यूना विस्ता सोशल क्लब की याद दिलाने के साथ-साथ मंगनियारों पर बनी डॉक्युमेंट्री देखकर भी यही बात खटकती है।

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