सुरक्षा परिषद क्यों नहीं करा पाई कश्मीर का समाधान, जानिये पूरा इतिहास

विशेषज्ञों का मानना है कि कश्मीर को लेकर संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की राजनीतिक भूमिका के पीछे सबसे बड़ा हाथ ब्रिटेन का था, जो इसका स्थायी सदस्य है। ब्रिटेन कश्मीर को अपनी भावी भूमिका के चश्मे से देख रहा था और उसने अमेरिकी नीतियों को भी प्रभावित किया।

फोटोः सोशल मीडिया
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प्रमोद जोशी

अमेरिका की डेमोक्रेटिक पार्टी से राष्ट्रपति पद के प्रत्याशी बनने की रेस में शामिल रह चुके वरिष्ठ सीनेटर बर्नी सैंडर्स ने पिछले हफ्ते कहा कि कश्मीर के हालात को लेकर उन्हें चिंता है। अमेरिकी मुसलमानों की संस्था इस्लामिक सोसायटी ऑफ नॉर्थ अमेरिका के 56वें अधिवेशन में उन्होंने यह भी कहा कि अमेरिकी सरकार को इस मसले के समाधान के लिए संयुक्त राष्ट्र प्रस्ताव का खुलकर समर्थन करना चाहिए। हालांकि बर्नी सैंडर्स की अमेरिकी राजनीति में कोई खास हैसियत नहीं है, लेकिन उनकी दो बातें ऐसी हैं ,जो अमेरिकी राजनीति की मुख्यधारा को अपील करती हैं ।

इनमें से एक है कश्मीर में अमेरिकी मध्यस्थता या हस्तक्षेप का सुझाव। दूसरा, कश्मीर समस्या का समाधान सुरक्षा परिषद के प्रस्तावों के तहत करने का। पाकिस्तानी नेता भी बार-बार कहते हैं कि इस समस्या का समाधान सुरक्षा परिषद के प्रस्तावों के तहत करना चाहिए। यानी कश्मीर में जनमत संग्रह कराना चाहिए। आज सत्तर साल बाद हम यह बात क्यों सुन रहे हैं? 1949 में ही समस्या का समाधान क्यों नहीं हो गया? भारत इस मामले को सुरक्षा परिषद में संरा चार्टर के अनुच्छेद 35 के तहत ले गया था। जो प्रस्ताव पास हुए थे, उनसे भारत की सहमति थी। वे बाध्यकारी भी नहीं थे। अलबत्ता दो बातों पर आज भी विचार करने की जरूरत है कि तब समाधान क्यों नहीं हुआ और इस मामले में सुरक्षा परिषद की भूमिका क्या रही है?

प्रस्ताव के बाद प्रस्ताव

साल 1948 से 1971 तक सुरक्षा परिषद ने 18 प्रस्ताव भारत और पाकिस्तान के रिश्तों को लेकर पास किए हैं। इनमें प्रस्ताव संख्या 303 और 307 साल 1971 के युद्ध के संदर्भ में पास किए गए। इससे पहले पांच प्रस्ताव 209, 210, 211, 214 और 215 साल 1965 के युद्ध के संदर्भ में थे।प्रस्ताव 123 और 126 साल 1956-57 के हैं, जो इस इलाके में शांति बनाए रखने के प्रयास से जुड़े थे। वस्तुतः प्रस्ताव 38, 39 और 47 ही सबसे महत्वपूर्ण हैं, जिनमें सबसे महत्वपूर्ण है प्रस्ताव 47, जिसमें जनमत संग्रह की व्यवस्था बताई गई थी। प्रस्ताव 47 के तहत जनमत संग्रह के पहले तीन चरणों की एक व्यवस्था कायम होनी थी। इसकी शुरुआत पाक अधिकृत क्षेत्र से पाकिस्तानी सेना और कबायलियों की वापसी से होनी थी।

लेकिन पाकिस्तान ने ही उसे स्वीकार नहीं किया, तो उसे लागू कैसे किया जाता। पाकिस्तान बुनियादी तौर पर जनमत संग्रह के पक्ष में था भी नहीं। नवंबर 1947 में भारत के गवर्नर जनरल माउंटबेटन पाकिस्तान गए थे। उन्होंने लाहौर में मोहम्मद अली जिन्ना से मुलाकात करके पेशकश की थी कि कश्मीर, हैदराबाद और जूनागढ़ तीनों रियासतों में जनमत संग्रह के माध्यम से फैसला कर लिया जाए कि किसको किसके साथ रहना है। जिन्ना ने इस प्रस्ताव को ठुकरा दिया था। भारतीय राजनेता उस वक्त आश्वस्त थे कि उन्हें आसानी से जनता का समर्थन मिलेगा।

मध्यस्थता की विफलता

यदि हम पिछले सत्तर वर्ष की वैश्विक राजनीति पर गौर करें, तो पाएंगे कि कश्मीर के मामले को संयुक्त राष्ट्र ने न्याय और कानून के नजरिए से देखा ही नहीं। शीतयुद्ध और राजनीतिक गणित के कारण ब्रिटेन और अमेरिका ने इसे शुद्ध राजनीति का विषय बना दिया। विचार तो इस बात पर होना चाहिए था कि कश्मीर का विलय नियमानुसार हुआ या नहीं। देखना यह भी चाहिए था कि अक्टूबर 1947 में कश्मीर पर पाकिस्तानी सेना के समर्थन से कबायलियों ने हमला बोला था, क्या वह गलत नहीं था?

बहरहाल सुरक्षा परिषद इस मामले को सुलझाने में नाकामयाब रही। 1965 के बाद से उसने कोशिश भी बंद कर दी है। ब्रिटेन और अमेरिका के इस रुख के कारण भारत की दिलचस्पी सुरक्षा परिषद के प्रस्तावों से हट गई और धीरे-धीरे उसने वैश्विक मध्यस्थता से किनारा कर लिया। दूसरी तरफ दुनिया की कोशिशें भी कम होती गईं। अगस्त में अमेरिकी सांसदों के लिए तैयार की गई एक पृष्ठभूमि रिपोर्ट में कहा गया है कि 1961-62 में ब्रिटेन और अमेरिका के बीच इस विषय पर बातचीत के छह दौर हुए और कोई फैसला नहीं हो पाया। अस्सी के दशक में अफगानिस्तान में रूसी हस्तक्षेप के बाद पाकिस्तान ने अमेरिका की मदद की थी। प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से पाकिस्तान ने अफगानिस्तान में फौजी हस्तक्षेप का लाभ कश्मीर में लेने का प्रयास किया। अमेरिका ने भी कश्मीर के समाधान में दिलचस्पी दिखाई थी। हाल में ट्रंप ने इस आशय की बात कही थी, पर फौरन हाथ खींच भी लिया था।

महाराजा का असमंजस

अविभाजित भारत में 584 देशी रजवाड़े थे। देशी रजवाड़ों के सामने विकल्प था कि वे भारत को चुनें या पाकिस्तान को। देश को जिस भारत अधिनियम के तहत स्वतंत्रता मिली थी, उसकी मंशा थी कि कोई भी रियासत स्वतंत्र देश के रूप में न रहे। बहरहाल कश्मीर के राजा के मन में असमंजस था। अक्टूबर 1947 में पाकिस्तानी सेना की छत्रछाया में कबायली हमलों के बाद 26 अक्टूबर को महाराजा हरि सिंह ने विलयपत्र पर दस्तखत कर दिए और उसके अगले दिन भारत के गवर्नर जनरल ने उसे मंजूर भी कर लिया। भारतीय सेना कश्मीर भेजी गई और करीब एक साल तक कश्मीर की लड़ाई चली। भारतीय सेना के हस्तक्षेप के बाद नवंबर में पाकिस्तानी सेना भी बाकायदा इस लड़ाई में शामिल हो गई।

भारत इस मामले को जब संरा सुरक्षा परिषद में ले गया, तब उसका कहना था कि कश्मीर के महाराजा ने भारत में विलय के प्रस्ताव पर दस्तखत किए हैं, इसलिए कश्मीर अब हमारी संप्रभुता का हिस्सा है जिस पर पाकिस्तान ने हमला किया है। उसे वहां से वापस बुलाया जाए। पाकिस्तान ने अपने जवाब में कहा कि हम कबायलियों की कोई मदद नहीं कर रहे हैं। उनका पाकिस्तान से कोई सीधा रिश्ता नहीं है। इसके साथ ही पाकिस्तान ने कश्मीर के महाराजा के विलयपत्र को ‘धोखाधड़ी और हिंसा के सहारे’ हासिल किया गया बताया। उसने यह भी कहा कि महाराजा हरि सिंह और भारत सरकार के बीच हुआ समझौता गैर-कानूनी है। इस सिलसिले में कोई भी फैसला कश्मीरी जनता की सहमति से ही होना चाहिए।

जनमत संग्रह का झमेला

भारत और पाकिस्तान के आवेदन-प्रतिवेदन के बाद सुरक्षा परिषद ने संरा चार्टर के अनुच्छेद 34 के आधार पर इस मामले की जांच करने का फैसला किया और फिर प्रस्ताव 38 और 39 पास किए। 17 जनवरी 1948 का प्रस्ताव 38 सामान्य प्रस्ताव था, जिसमें दोनों पक्षों से स्थिति को बिगड़ने से रोकने का अनुरोध किया गया था। इसके बाद 20 जनवरी को प्रस्ताव 39 पास किया गया, जिसमें भारत और पाकिस्तान के लिए संरा आयोग (यूएनसीआईपी) का गठन किया गया, जिसे दो बातों की जांच करने की जिम्मेदारी दी गई। इस समस्या के उत्पन्न होने के पीछे कारण क्या हैं और हालात को सुधारने के लिए किसी प्रकार की मध्यस्थता करना और इस सिलसिले में हुई प्रगति की जानकारी सुरक्षा परिषद को देना।

सुरक्षा परिषद का यह आयोग इस इलाके में जाकर अध्ययन करता उसके पहले ही सुरक्षा परिषद ने 21 अप्रैल 1948 को प्रस्ताव 47 पास कर दिया। यही वह प्रस्ताव है, जिसका कश्मीर समस्या के स्थायी समाधान की दिशा में बार-बार उल्लेख किया जाता है। इसमें दो काम मुख्य रूप से होने थे। पहला, क्षेत्र का विसैन्यीकरण और दूसरा, जनमत संग्रह। इसमें पाकिस्तान से कहा गया था कि वह इस क्षेत्र से कबायलियों और अन्य पाकिस्तानी नागरिकों को वापस बुलाए। इसके बाद भारत की जिम्मेदारी थी कि वह कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए आवश्यक न्यूनतम उपस्थिति को बनाए रखते हुए अपनी शेष सेना को वापस बुलाए। इस तरह विसैन्यीकरण के बाद संयुक्त राष्ट्र द्वारा नियुक्त जनमत संग्रह प्रशासक के निर्देशन में स्वतंत्र और पक्षपात रहित जनमत संग्रह की प्रक्रिया होनी थी।

विलय पत्र का जिक्र भी नहीं

ध्यान देने वाली बात है कि सुरक्षा परिषद के प्रस्ताव में महाराजा हरि सिंह के विलयपत्र का जिक्र नहीं था। मई 1948 में जब संयुक्त राष्ट्र आयोग जांच के लिए भारतीय भूखंड में आया, तब तक पाकिस्तानी सेना कश्मीर में प्रवेश कर चुकी थी। यह सेना कश्मीर पर हमलावर उन कबायलियों की सहायता कर रही थी, जो भारतीय सेना से लड़ रहे थे। वस्तुतः असैनिकों के वेश में भी पाकिस्तानी सैनिक ही थे। स्वतंत्रता के एक हफ्ते बाद ही 20 अगस्त को ‘ऑपरेशन गुलमर्ग’ बना लिया गया था, जिसमें एक-एक हजार पठानों के 20 लश्कर बनाने की योजना थी। इन्हें बन्नू, वाना, पेशावर, कोहाट और नौशेरा के ब्रिगेड मुख्यालयों में ट्रेनिंग दी गई थी।

इस बीच 3 जून को सुरक्षा परिषद ने प्रस्ताव 51 पास करके आयोग से जल्द से जल्द कश्मीर जाने का आग्रह किया। संरा के प्रस्ताव 47 में ‘पाकिस्तानी नागरिकों’ को हटाने की बात थी, जबकि अब तो औपचारिक रूप से सेना भी आ गई थी। जुलाई में जब संरा आयोग कश्मीर में आया, तो वहां पाकिस्तानी सेना को देखकर उसे विस्मय हुआ। इसके बाद 13 अगस्त 1948 को संरा आयोग के पहले प्रस्ताव में इस बात का जिक्र है। इसमें कहा गया है कि पाकिस्तानी सेना की उपस्थिति के कारण मौलिक स्थितियों में ‘मैटीरियल चेंज’ आ गया है। इसके बावजूद इस प्रस्ताव में या इसके पहले के प्रस्तावों में ‘विलयपत्र’ का कोई जिक्र नहीं है। यानी एक तरफ पाकिस्तानी सेना की उपस्थिति की अनदेखी हुई वहीं ‘विलयपत्र’ का जिक्र भी नहीं हुआ। विलयपत्र को नामंजूर भी नहीं किया।

वैश्विक राजनीति

यदि विलयपत्र का जिक्र होता, तो पाकिस्तानी सेना की उपस्थिति को ‘भारतीय क्षेत्र पर आक्रमण’ माना जाता। पाकिस्तान को ‘विलयपत्र’ भी स्वीकार नहीं था, और महाराजा की संप्रभुता को भी उसने अस्वीकार कर दिया था, हालांकि महाराजा के साथ उसने ‘स्टैंडस्टिल समझौता’ किया था। पाकिस्तान का कहना था कि आजाद कश्मीर आंदोलन के कारण महाराजा का शासन खत्म हो गया था। इतना होने के बावजूद संयुक्त राष्ट्र आयोग ने पाकिस्तानी सेना की उपस्थिति की भर्त्सना नहीं की। यूएन की मध्यस्थता में भारत और पाकिस्तान को एक पलड़े पर रखा जाने लगा। कश्मीर के विलय की वैधानिकता और नैतिकता के सवाल ही नहीं उठे। विशेषज्ञों का एक वर्ग मानता है कि सुरक्षा परिषद की राजनीतिक भूमिका के पीछे सबसे बड़ा हाथ ब्रिटेन का था, जो सुरक्षा परिषद का स्थायी सदस्य है। स्वतंत्रता के साथ ही ब्रिटेन को भारत की भावी भूमिकाओं को लेकर चिंता थी। भारत को आजाद करने के बावजूद उसकी दिलचस्पी इस इलाके में थी। ब्रिटेन कश्मीर को अपनी भावी भूमिका के चश्मे से देख रहा था और उसने अमेरिकी नीतियों को भी प्रभावित किया था।

पाकिस्तानी दांव-पेच

संयुक्त राष्ट्र प्रस्तावों की विफलता और उसके पीछे की राजनीति के अलावा पाकिस्तान ने उसके प्रस्तावों को मानने से इनकार करना शुरू कर दिया था। इस प्रस्ताव के बाद पाकिस्तान ने एक तरफ यह कहा कि जनमत संग्रह के बारे में विस्तृत जानकारी उपलब्ध नहीं है। दूसरे उसने बड़ी बात यह कही कि जब सेना की वापसी हो तो भारतीय सेना की भी साथ-साथ वापसी हो और पूरी वापसी हो। अब संयुक्त राष्ट्र का सारा ध्यान युद्ध रोकने पर चला गया और अंततः एक जनवरी 1949 को युद्धविराम समझौता हो गया। इससे एक प्रकार की सीमा बन गई, जिसे 1972 के शिमला समझौते में युद्ध विराम रेखा के बजाय नियंत्रण रेखा कहा गया।

व्यावहारिक रूप से संयुक्त राष्ट्र ने जनवरी 1949 में ही पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर को औपचारिक रूप से स्वीकार कर लिया। हालांकि कानूनन पाकिस्तान का कोई दावा बनता ही नहीं था। इसके बाद पाकिस्तान ने जनमत संग्रह को अपना हथियार बनाना शुरू किया। सुरक्षा परिषद ने संयुक्त राष्ट्र आयोग के बजाय एक सदस्यीय मध्यस्थ की नियुक्ति करनी शुरू की। 14 मार्च 1950 के प्रस्ताव 80 से इसकी शुरुआत हुई। इसके पहले 17 दिसंबर 1949 को सुरक्षा परिषद ने अपने अध्यक्ष जनरल मैकनॉटन से मध्यस्थता का अनुरोध किया। उन्होंने फरवरी 1950 में जो प्रस्ताव दिया था, उसमें दोनों देशों की सेनाओं की वापसी का प्रस्ताव था, अलबत्ता शांति-व्यवस्था बनाए रखने के लिए न्यूनतम भारतीय सेना रखने की सलाह थी। भारत ने इस पेशकश को स्वीकार नहीं किया, क्योंकि इसमें दोनों पक्षों को बराबरी पर रखा गया था।

अंततः 1950 में संयुक्त राष्ट्र आयोग भंग हो गया। इसके बाद व्यक्तिगत मध्यस्थता के कई दौर हुए, पर सफलता नहीं मिली। साल 1957 के प्रस्ताव 126 के बाद समस्या के स्थायी समाधान की बातें भी खत्म हो गईं और 1965 की लड़ाई के बाद प्रस्ताव 210 और 211 से ध्वनि निकलती है कि किसी और से मध्यस्थता करा लो। सुरक्षा परिषद के प्रस्तावों की रोशनी में समाधान खोजने का सुझाव तमाम लोग देते हैं, पर इन प्रस्तावों को एक साथ रखकर पढ़ें, तो साफ नजर आता है कि वैश्विक राजनीति और शीतयुद्ध की गरमी में समाधान के सारे प्रयास निष्फल होते रहे।

कुछ लोग इसका मतलब जनमत संग्रह मानते हैं, पर आज जनमत संग्रह का मतलब क्या है? हाल के वर्षों में चीन की आर्थिक शक्ति बढ़ने के साथ एक और महत्वपूर्ण पक्ष इस विवाद में शामिल हो गया है। बेशक चीन सीधे तौर पर इसमें पार्टी नहीं है, पर चीन-पाकिस्तान आर्थिक कॉरिडोर का भागीदार होने के कारण उसके हित भी इस इलाके के साथ जुड़ गए हैं।

(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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