बजट 2022: क्या फिर से अमीरों के लिए खुलेगी 'पोटली' और मुंह ताकता रह जाएगा ईमानदारी से टैक्स देने वाला आम भारतीय

असल में जब महंगाई बढ़ती है, तो सरकारी खजाने लबालब भर जाते हैं और मेहनतकश जनता की वास्तविक आय घट जाती है। यह तो अब आगामी बजट से पता चलेगा कि मोदी सरकार अपनी पोटली फिर से धनाढ्यों के लिए खोलती है या मेहनतकश अवाम के लिए।

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राजेश रपरिया

केंद्र में सत्तारूढ़ होने से पहले बीजेपी ने कई मनभावन वादे किए थे। इनमें से कॉरपोरेट जगत से किए कई वादे पूरे भी किए। कॉरपोरेट इनकम टैक्स में भारी राहत दी जिसकी वजह से टैक्स राजस्व में लाखों करोड़ रुपये की कमीआई। सत्तारूढ़ होने से पहले सामान्य करदाताओं को भी सपने दिखाए थे। बीजेपीनीत नरेंद्र मोदी सरकार के शुरुआती सालों में ऐसा लगा था कि सामान्य मेहनतकश आयकरदाताओं के अच्छे दिन आने वाले हैं। लेकिन ऐसा कुछ हुआ नहीं।

5 लाख तक की इनकम टैक्स फ्री कब होगी!

अप्रैल, 2014 में अरुण जेटली ने मांग की थी कि सामान्य आयकरदाताओं की आयकर मुक्त सीमा पांच लाख रुपये सालाना कर देनी चाहिए। जेटली ने खुद वित्त मंत्री के रूप में कई बजट पेश किए लेकिन यह भी मोदी सरकार के अन्य बड़े वायदों जैसा अब तक जुमला ही साबित हुआ है।

यदि आयकर सीमा में छूट, बचत निवेश आदि प्रावधानों का इतिहास देखें, तो छोटे आयकरदाताओं को राहत देने में सरकारों का रवैया कंजूसी भरा ही रहा है। पर इस संदर्भ में मोदी सरकार का रवैया असंवेदनशील कहा जा सकता है। मोदी सरकार के पहले कार्यकाल में महंगाई ने ज्यादा सिर नहीं उठाया। इस दौरान कच्चे तेल की कीमतें अंतरराष्ट्रीय बाजार में 30 डॉलर प्रति बैरल तक आ गईं जो 2013 में 110 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गई थी।

रिकॉर्ड तोड़ महंगाई, पर आमदनी में कटौती

पर मोदी सरकार के दूसरे कार्यकाल में थोक महंगाई ने पिछले तीस साल के रिकॉर्ड तोड़ दिए हैं। खाद्य महंगाई भी दो अंकों को छू चुकी है। मोदी सरकार के दूसरे कार्यकाल में अरहर की दाल में बेहिसाब महंगाई से सांस फूल गई और अब सरसों के तेल की कीमतों में आग लगी हुई है।

ज्यादा महंगाई से आम जन की वास्तविक आय घट जाती है और क्रय शक्ति भी काफी कम हो जाती है। लेकिन कई सालों से कर मुक्त आय की सीमा में कोई इजाफा नहीं हुआ है। 2005-06 में तत्कालीन वित्त मंत्री पी. चिदंबरम ने आयकर मुक्त सीमा में एक साथ 100 फीसदी की वृद्धि कर 50 हजार रुपये सालाना से एक लाख रुपये सालाना कर दी थी जो 2009-10 में बढ़कर डेढ़ लाख रुपये, 2010-11 में 1.60 लाख, 2012-13 में 1.80 लाख और 2013- 14 में दो लाख रुपये सालाना हो गई।

2014 में वित्त मंत्री अरुण जेटली ने जुलाई में पेश बजट में इस सीमा को 0.25 फीसदी बढ़ाकर ढाई लाख रुपये सालाना कर दिया जबकि सपना पांच लाख रुपये सालाना कर मुक्त आय का दिखाया गया था। तब से आयकर मुक्त आय सीमा ढाई लाख रुपये पर ही अटकी हुई है जो छोटे आयकरदाताओं के प्रति सरकार के निर्मम व्यवहार को दर्शाता है क्योंकि आयकर मुक्त सीमा को बढ़ाकर 5 लाख रुपये करने में राजस्व का कोई भारा घाटा सरकार को नहीं होगा।


5 लाख लिमिट करने से अर्थव्यवस्था में बढ़ेगी क्रय शक्ति

2019 में आई एक रिपोर्ट के अनुसार, ढाई लाख से 5 लाख रुपये सालाना आय-वर्ग पर 5 फीसदी आयकर लगता है जिससे सरकार को टैक्स के रूप में 1,213 करोड़ रुपये मिलते हैं जो कुल आयकर संग्रह का तकरीबन 25 फीसदी है। 2021-22 में कुल 5 लाख 61 हजार करोड़ रुपये आयकर संग्रह का अनुमान है। 5 लाख रुपये आयकर मुक्त सीमा करने से अर्थव्यवस्था में क्रय शक्ति बढ़ने से मांग को भी जबरदस्त प्रोत्साहन मिलेगा जो अरसे से कमजोर पड़ी हुई है। ऐसा करने से तकरीबन 3 करोड़ छोटे आयकरदाताओं को सीधा लाभ मिलेगा और वे आयकर के दायरे से बाहर हो जाएंगे।

धारा 80 सी में छूट की लिस्ट लंबी, लेकिन फायदा सिफर

आयकर की धारा 80 सी के तहत बचत निवेश से भी आयकरदाताओं को राहत मिलती है। इस धारा को तत्कालीन वित्त मंत्री पी. चिदंबरम ने धारा 88 के प्रावधानों को समाप्त कर जोड़ा था। इस धारा के तहत कुछ निवेश और खर्चों पर टैक्स छूट मिलती है। वित्त वर्ष 2014-15 में इसे एक लाख से बढ़ाकर डेढ़ लाख रुपये सालाना कर दिया गया। तब से इसमें कोई परिवर्तन नहीं किया गया है। इसमें शामिल बचत निवेश प्रपत्रों और खर्चों की सूची बेहद लंबी है। पीपीएफ, ईपीएफ, जीवन बीमा प्रीमियम, मकान कर्ज का मूल भुगतान, स्टाम्प शुल्क, सुकन्या समृद्धि योजना, राष्ट्रीय बचत पत्र, यूलिप, बैंक कर सावधि योजना, इक्विटी लिंक्ड सेविंग्स स्कीम, इंफ्रास्ट्रक्चर फंड, सीनियर सिटिजन सेविंग्स स्कीम, डाक घर सावधि जमा योजना, नाबार्ड ग्रामीण बांड्स, पढ़ाई-खर्च आदि।

लंबी सूची होने से इस धारा का उद्देश्य ही विफल हो गया है जिसका देश की बचत दर से अंदाजा लगाया जा सकता है। इसे ज्यादा तर्कसंगत और व्यावहारिक बनाने की दरकार है। इस सूची में से पीपीएफ को अलग कर उसके लिए अलग छूट का प्रावधान सरकार को करना चाहिए और बचत निवेश को भी बढ़ाना चाहिए। इन छोटी-छोटी बचतों के बढ़ने से केन्द्र सरकार को कर्ज लेने में सहूलियत रहेगी और निवेश के लिए पर्याप्त मात्रा में फंड उपलब्ध रहेंगे। हां, केन्द्र सरकार को आयकर धारा 10 के तहत शिक्षा-फीस पर मिलने वाली (दो बच्चों के लिए) 200 रुपये महीने की छूट का मजाक अवश्य बंद कर देना चाहिए या फिर बेहद महंगी शिक्षा को देखते हुए इस छूट को बढ़ाया जाना चाहिए।

कोविड ने बढ़ाया मेडिकल खर्च, कम से कम एक लाख हो 80 डी में छूट की सीमा

कोविड-19 महामारी से अचानक स्वास्थ्य खर्चों में भारी बढ़ोतरी हुई और स्वास्थ्य सेवाएं पहले से अधिक महंगी हुई हैं। पूर्व राष्ट्रपति स्वर्गीय प्रणव मुखर्जी ने एक संबोधन में बताया था कि इलाज कर्जों के कारण 4 से 6 करोड़ लोग प्रति साल गरीबी रेखा से नीचे चले जाते हैं। वैसे भी, स्वास्थ्य महंगाई सामान्य महंगाई से दोगुनी से अधिक कई सालों से है।

मोदी सरकार का आयुष्मान भारत का कोई कारगर लाभ अवाम को नहीं हुआ है। कोविड के कारण स्वास्थ्य बीमा खरीदना महंगा हो गया है, उस पर भी 18 फीसदी वस्तुऔर सेवाकर (जीएसटी) खरीदार को देना पड़ता है। यह किसी अभिशाप से कम नहीं है। सरकार का यह रवैया क्रूर ही कहा जा सकता है। आयकर की धारा 80 डी में विभिन्न आयु वालों की छूट सीमा 25 हजार से 75 हजार रुपये सालाना है जिसे बढ़ाकर कम से कम एक लाख रुपये कर देने की मांग हर तरफ से उठ रही है। जांच आदि खर्च के लिए भी आयकर में छूट को बढ़ाना चाहिए।


वर्क फ्रॉम होम से बढ़ गए खर्च, स्टैंडर्ड डिडक्शन की सीमा भी बढ़े

पेट्रोल-डीजल के दामों में भारी बढ़ोतरी को देखते हुए मानक कटौती की छूट को तत्काल बढ़ाने की दरकार है जो इस समय 50,000 रुपये सालाना है। मानक कटौती को 2018 में पुनः शुरू किया गया था। पर यहां भी वह हेराफेरी से नहीं चूके थे। अरुण जेटली ने 19,200 रुपये के सालाना वाहन भत्ते और चिकित्सा खर्चों की 15 हजार रुपये सालाना की प्रतिपूर्ति खत्म करके 40 हजार रुपये सालाना कर दिया था। तब से पेट्रोल-डीजल के दाम और स्वास्थ्य सेवाएं काफी महंगी हो चुकी हैं। इसका काला चिट्ठा किसी से छुपा नहीं है।

2019 में पेट्रोल कीऔसत कीमत 72-74 रुपये प्रति लीटर थी जो अब 95-100 रुपये है। कोविड और प्रदूषण के कारण फेस मास्क और सैनेटाइजरों का एक स्थायी खर्च बढ़ गया है। कोविड महामारी के कारण कंपनियां ही नहीं सरकारी दफ्तर भी कर्मियों को घर बैठाकर बेहिसाब काम करा रहे हैं। इससे कंप्यूटर, इंटरनेट, बिजली, एसी आदि के खर्चों में बढ़ोतरी हुई है। इन सबको देखते हुए मानक कटौती (स्टैंडर्ड डिडक्शन) की सीमा कम से कम 75 हजार रुपये सालाना की जानी चाहिए।

तो फिर किसके लिए खुलेगी पोटली...

मोदी सरकार के पास इस समय खजाने में कोई कमी नहीं है। देश-विदेश में ख्यात वित्तीय संस्था इक्रा के अनुसार, कर संग्रह लक्ष्य से पौने दो लाख करोड़ रुपये ज्यादा रहने वाला है। असल में जब महंगाई बढ़ती है, तो सरकारी खजाने लबालब भर जाते हैं और मेहनतकश जनता की वास्तविक आय घट जाती है। यह तो अब आगामी बजट से पता चलेगा कि मोदी सरकार अपनी पोटली फिर से धनाढ्यों के लिए खोलती है या मेहनतकश अवाम के लिए।

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