मोदी राज में महज दिखावा है महिला सशक्तीकरण
राजनीति में बीजेपी महिला सशक्तीकरण में कितना भरोसा करती है, इसका उदाहरण हाल के चुनाव हैं। बीजेपी की तरफ से असम में महज 7 प्रतिशत, तमिलनाडु में 18.5 प्रतिशत, पश्चिम बंगाल में 11.5 प्रतिशत, केरल में 14 प्रतिशत और पुडुचेरी में 0 प्रतिशत महिला उम्मीदवार हैं।

रंगमच सज चुका है और महिला सशक्तीकरण का नाटक शुरू हो चुका है। प्रधानमंत्री मोदी का तथाकथित विकास रंगमंच और पोस्टरों तक ही सीमित रहता है– धरातल पर तो देश की बर्बादी है। महंगाई और रसोई गैस की किल्लत से ग्रस्त होकर श्रमिक बड़ी संख्या में शहरों से पलायन कर रहे हैं और देश के प्रधानमंत्री चुनावी दौरों में झूठ और अनर्गल प्रलाप उगलने में और साथ ही महिला सशक्तीकरण के मसीहा के तौर पर अपने आप को प्रस्तुत करने में व्यस्त हैं।
देश की महिलाएं लगातार पिछड़ती जा रही हैं और प्रधानमंत्री समाचारपत्रों में लेख लिख रहे हैं और तमाम विज्ञापनों द्वारा महिला सशक्तीकरण का डंका पीट रहे हैं। वर्ष 2014 के बाद से पूरा देश महज एक रंगमंच रह गया है, जिसपर बस एक ही चेहरा लगातार निहायत ही निर्लज्ज अभिनय करता है। सभी मंत्री-संतरी और दलाल मीडिया दर्शक बनकर ताली बजाते हैं, जो ताली नहीं बजाता उसे दर्शक दीर्घा से सीधे जेल भेज दिया जाता है और कुछ की तो हत्या भी हो जाती है।
प्रधानमंत्री ने हाल में ही संसद और विधानसभाओं में महिलाओं के 33 प्रतिशत आरक्षण के नाम पर तमाम समाचारपत्रों में एक लेख लिखा है। इसमें जो कुछ लिखा है, देश ठीक उसके विपरीत दिशा में जा रहा है। इसमें प्रजातंत्र के मूल्यों की मजबूती और समानता और सभी वर्गों के समावेश की बात कही गई है। वर्ष 2014 के बाद से मोदी सरकार ने सबसे अधिक प्रहार सामाजिक समानता पर किया है और प्रजातंत्र के मौलिक सिद्धांतों को ही ध्वस्त किया है। चुनाव आयोग समेत सभी संवैधानिक संस्थाएं और अधिकतर न्यायालय भी अब जनता के लिए काम नहीं करते बल्कि अपने राजा को खुश रखने का काम करते हैं।
राजनीति में आगे बढ़ती महिलाएं भी किसी तरह से महिलाओं का प्रतिनिधित नहीं करतीं। इनमें से अधिकतर महिला सशक्तीकरण के कारण राजनीति में नहीं हैं, बल्कि अपराध, पैसा, पाररिवारिक पृष्ठभूमि और बड़े नेताओं द्वारा फ़ेवर किए जाने के कारण राजनीति में आगे हैं। वर्तमान महिला सांसदों और विधायकों में से 27 प्रतिशत पर आपराधिक मामले दर्ज हैं, 14 प्रतिशत पर तो गंभीर आपराधिक मामले हैं और इनकी औसत संपत्ति 17.30 करोड़ रुपये है। सांसदों और विधायकों में से 3 प्रतिशत महिलाएं अरबपति हैं। ऐसे में, महिला सांसदों और विधायकों की संख्या कितनी भी बढ़ा दी जाए, इससे देश की आम महिलाओं की स्थिति किसी तरह बदलने वाली नहीं है।
राजनीति में बीजेपी महिला सशक्तीकरण में कितना भरोसा करती है, इसका उदाहरण हाल के चुनाव हैं। बीजेपी की तरफ से असम में महज 7 प्रतिशत, तमिलनाडु में 18.5 प्रतिशत, पश्चिम बंगाल में 11.5 प्रतिशत, केरल में 14 प्रतिशत और पुडुचेरी में 0 प्रतिशत महिला उम्मीदवार हैं। प्रधानमंत्री और उनके गृहमंत्री हरेक राज्य के उम्मीदवारों की लिस्ट फाइनल करने में सक्रिय भूमिका निभाते हैं फिर भी बीजेपी की महिला उम्मीदवारों की संख्या 20 प्रतिशत तक भी नहीं पहुंचती। बीजेपी के संगठन स्तर और प्रमुख सरकारी पदों पर भी महिलाएं नजर नहीं आतीं।
इसके बाद भी अगले कुछ दिनों तक मीडिया, सरकारी तंत्र, मंत्री-संतरी और स्वयं प्रधानमंत्री भी अपने आप को महिला सशक्तीकरण के चैंपियन के तौर पर प्रचारित करेंगें। आगामी 16 से 18 अप्रैल के संसद के विशेष सत्र के बाद तमाम जगहों पर धन्यवाद मोदी जी के पोस्टर चिपकाए जाएंगें जिसमें मोदी जी की महिलाओं के साथ खिलखिलाती तस्वीर भी होगी। अखबारों में और सोशल मीडिया में भी इस विषय पर बड़े-बड़े विज्ञापन होंगे– इसी दौरान कई महिलाएं यौन हिंसा का शिकार होंगी, अनेक बच्चियां गायब हो जाएंगी, लैंगिक समानता के किसी इंडेक्स में देश कुछ पायदान लुढ़क चुका होगा, सत्ता से जुड़े अनेक नेता महिलाओं पर भद्दी और अश्लील टिप्पणी कर चुके होंगें और कुछ नेता तो सोशल मीडिया पर कुछ महिलाओं को बलात्कार की धमकी भी दे चुके होंगें। पर, रंगमंच पर अभिनय बदस्तूर चलता रहेगा और तालियां भी बजती रहेंगी। यही तथाकथित विकसित भारत का नया चेहरा है।
हमारे देश में संसद में महज 14 प्रतिशत सदस्य महिलाएं हैं। पूरी दुनिया में संसद में महिलाओं का प्रतिनिधित्व बढ़ाने पर देशों में महिलाओं की स्थिति सुधरती है पर विश्वगुरु संचालित हमारा देश महिलाओं को और पीछे धकेलता है। महिला सांसद, मंत्री, विधानसभा सदस्य– शायद ही काभी महिलाओं के मुद्दे पर कुछ भी आवाज उठाती हैं। बीजेपी महिला सांसद तो संसद के भीतर और बाहर प्रधानमंत्री के जयकारा और राहुल गांधी पर अनर्गल प्रलाप से आगे कुछ जानती ही नहीं हैं। कभी-कभी यह जरूर होता है कि महिला सांसद महिलाओं के विरुद्ध ही बयान देती हैं।
देश में वर्ष 2011 के जनगणना के समय कुल आबादी 121.1 करोड़ थी, जिसमें महिलायें 48.5 प्रतिशत थीं। मोदी सरकार लगातार महिलाओं के सशक्तीकरण की बात करती है, विकास का दावा करती है पर तथ्य तो यह है कि वर्ष 2036 तक देश की कुल अनुमानित आबादी 152.2 करोड़ होगी, जिसमें महिलाओं की संख्या 48.8 प्रतिशत ही होगी। जाहिर है देश में लैंगिक अनुपात में कोई खास अंतर नहीं आने वाला है।
ये आंकड़े, सांख्यिकी मंत्रालय की एक रिपोर्ट, वुमन एंड मेन इन इंडिया 2022, में प्रकाशित हैं। इस रिपोर्ट के कवर पर 2022 जरूर लिखा है, जी 20 और आजादी के अमृत महोत्सव का लोगो भी है पर निश्चित तौर पर यह रिपोर्ट 2023 तक उपलब्ध नहीं थी। यह शायद पहली रिपोर्ट होगी जिसमें मैसेज, फॉरवर्ड, प्रीफेस और एकनॉलेजमेन्ट सभी सरकारी लेटरहेड पर हैं पर कहीं कोई तारीख नहीं है। इस रिपोर्ट की शुरुआत देश में पुरुष और महिलाओं की स्थिति से नहीं होती बल्कि सरकारी नीतियों की विवेचना से होती है।
इस रिपोर्ट के अनुसार देश के शहरी क्षेत्रों में लैंगिक अनुपात, प्रति 1000 पुरुषों पर महिलाओं की संख्या, में लगातार गिरावट दर्ज की जा रही है। शहरी क्षेत्रों में लैंगिक अनुपात वर्ष 2011 में 929 था, जो 2025 में 930 पहुंच गया– पर रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2031 में यह फिर 929 हो जाएगा और वर्ष 2036 तक शहरों में लैंगिक अनुपात गिरकर 926 ही रह जाएगा। यह स्थिति अधिक खतरनाक है क्योंकि शहरी आबादी और शहरों का क्षेत्र भी लगातार बढ़ता जा रहा है।
वर्ल्ड इकनॉमिक फोरम के ग्लोबल जेन्डर गैप रिपोर्ट 2025 में शामिल कुल 148 देशों में भारत का स्थान 131वां है। मोदी जी का महिला सशक्तीकरण वाला भारत पिछले वर्ष की तुलना में तीन स्थान नीचे पहुंच गया है। प्रधानमंत्री जी के अनुसार दुनिया में कभी चौथी तो कभी पांचवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था के बीच झूलता भारत बड़ी अर्थव्यवस्था वाले देशों में, बड़ी आबादी वाले देशों में, प्रजातान्त्रिक देशों में, जी7 या जी20 देशों में, दुनिया के सभी देशों की तुलना में सबसे पीछे है। प्रधानमंत्री मोदी के देश भारत को पिछले कुछ वर्षों से ऐसा तमगा लगातार मिलता रहा है। भारत की लैंगिक समानता के क्षेत्र में स्थिति तो यहां तक पहुंच गई है कि दुनिया के निम्न मध्यम आय वाले इंडेक्स में मौजूद 40 देशों में भी 34वें स्थान पर है और दक्षिण एशिया के 7 देशों में भारत पांचवें स्थान पर है।
इस इंडेक्स में महिलाओं की आर्थिक भागीदारी के संदर्भ में हम 148 देशों में 144वें स्थान पर और महिलाओं के स्वास्थ्य के संदर्भ में 143वें स्थान पर हैं। लैंगिक समानता के संदर्भ में पूरे विश्व का औसत अंक 0.688 और दक्षिण एशिया का औसत अंक 0.646 है, पर इंडेक्स में भारत का अंक महज 0.644 है। दक्षिण एशिया के देशों में भारत से भी नीचे केवल 2 देश हैं– मालदीव 138वें स्थान पर और पाकिस्तान 148वें स्थान पर। इन 2 देशों के अतिरिक्त पूरे इंडेक्स में भारत से भी नीचे के स्थान वाले देश हैं– सऊदी अरब, पापुआ न्यू गिनिया, ओमान, तुर्किए, लेबेनान, मोरक्को, ईजीप्ट, माली, अल्जेरिया, नाइज़र, कांगो, गिनीआ, ईरान, चाड और सूडान।
महिलाओं की स्थिति देश में ऐसी हो गई है कि इनकी बदहाली के आंकड़े सरकारी रिपोर्ट में भी नजर आने लगे हैं। महिलाओं में खून की कमी, अनेमिया, पर पिछले कुछ दशकों से चर्चा की जा रही है, पर मोदी सरकार में पहले से अधिक महिलाएं इसका शिकार हो रही हैं। वुमन एंड मेन इन इंडिया 2022 नामक रिपोर्ट में अनेमिया से संबंधित वर्ष 2015-16 में आयोजित राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण 4 और वर्ष 2019-21 के बीच किए गए राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण 5 के आंकड़े साथ-साथ दिए गए हैं। इन आंकड़ों के अनुसार 2015-16 में 53.1 प्रतिशत महिलाएं अनेमिया की शिकार थीं, पर वर्ष 2019-21 तक इनकी संख्या 57 प्रतिशत तक पहुंच गई। वर्ष 2015-16 में गर्भवती महिलाओं में से 50.4 प्रतिशत महिलायें अनेमिया से पीड़ित थीं, जबकि वर्ष 2019-21 तक इनकी संख्या 52.2 प्रतिशत तक पहुंच गई।
यदि आप बीजेपी शासित राज्यों की स्थिति देखें तो फिर यह अंतर और भी बड़ा नजर आता है। गुजरात में वर्ष 2015-16 में कुल महिलाओं में से 54.9 प्रतिशत और गर्भवती महिलाओं में से 51.3 प्रतिशत महिलाएं अनेमिया की चपेट में थीं, जबकि वर्ष 2019-21 तक कुल महिलाओं में 65 प्रतिशत और गर्भवती महिलाओं में से 62.6 प्रतिशत में यह समस्या थी। लंबे समय तक केंद्र सरकार के नियंत्रण में रहे जम्मू और कश्मीर में वर्ष 2015-16 में महज 48.9 प्रतिशत महिलाएं अनेमिया का शिकार थीं पर वर्ष 2019-21 तक यह संख्या 65.9 प्रतिशत तक पहुंच गई।
महिला सशक्तीकरण, लैंगिक समानता और दूसरी सामाजिक समस्याओं जैसे क्षेत्रों में मोदी सरकार देश को लगातार पीछे ले जा रही है। अब किसी क्षेत्र में विकास उन्नति से नहीं मापा जाता बल्कि मीडिया और सत्ता के झूठे दावों, पोस्टरों और प्रधानमंत्री मोदी की मुस्कराती तस्वीरों वाले विज्ञापनों से मापा जाता है। अब यही तथाकथित विकसित भारत में महिला सशक्तीकरण की हकीकत है।
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