विचार

महिला दिवस विशेषः समाज में स्त्रियों की अदृश्य भूमिका

सरकारी और निजी क्षेत्र मिलाकर देश में सिर्फ छह प्रतिशत स्त्रियां ही नौकरी करती हैं। लेकिन यकीन मानिए बाकी 94 प्रतिशत स्त्रियां खाली नहीं बैठी हैं। वे स्वरोजगार से जुड़ी हैं। इन स्वयंसेवी स्त्रियों के काम करने की गिनती रखने वाला देश में कोई रजिस्टर नहीं है।

फोटोः सोशल मीडिया

नवजीवन डेस्क

कल्पना कीजिए, एक स्त्री स्वेटर बुन रही है या सिलाई कर रही है। उसके हाथ लगातार बुन रहे हैं और ठीक उसी समय कोई अदृश्य हाथ उसे उधेड़ता जा रहा है। स्त्रियों के अधिकांश कामों के साथ रोज ऐसा ही होता है। वह घर बुहारती है, पानी भरती है, बच्चों को नहलाती है, खाना पकाती है। मगर इनमें से कोई भी काम, कभी भी पूरा नहीं होता। काम पूरा करने का संतोष क्या होता है, यह स्त्रियां बहुत कम जान पाती हैं। सुबह की रसोई से निपटे, लेकिन शाम की रसोई बाकी है। सुबह झाड़ू लगाई, घर सहेजा, लेकिन शाम तक पैरों के नीचे धूल है और घर अस्त-व्यस्त है।

ऐसे काम जो उसे खुद ही कभी पूरे हुए नहीं दिखते, उन्हें वह दूसरों को कैसे दिखाए? ये वे काम हैं जिन्हें हर दिन, साल-दर-साल, लगभग एक ही तरह से बार-बार किया जाना है। इन्हें दिमागी काम नहीं माना जाता। बल्कि सच पूछिए तो ये दिमाग को कुंद कर देते हैं। दिमाग इन छोटे-छोटे कामों के भंवर जाल में चक्कर खाता रहता है। स्त्री जीवन का हर दिन पिछले दिन जैसा है। उसमें कुछ भी नया नहीं, बस एक पैटर्न या नमूना है, जो खुद को दुहराते रहता है।

इससे मन में अचानक यह बात आई कि क्या इसीलिए स्त्रियों को कढ़ाई, बुनाई, क्रोशिया, चैक- मांडने-रांगोली पसंद हैं, क्योंकि उनमें पैटर्न्स हैं जिन्हें दुहराना होता है। कई बार तो ये नमूने इतने जटिल होते हैं और उनमें इतना जोड़-घटाना रहता है कि समझ ही नहीं आता कि जो स्त्री कभी स्कूल नहीं गई, जिसने गणित नहीं पढ़ा वह ये नमूने कैसे याद रख रही है, या बना रही है?

जो किसी कला विद्यालय नहीं गई, उसे आकारों, रंगों के तालमेल के बारे में ऐसा ज्ञान कहां से मिला? और फिर ये रंगोली, ये रंग-बिरंगे मोती के तोरण, ये बचे हुए ऊन से बने स्वेटर, ये बचे हुए कपड़ों और धागों से बने झबले और फ्रॉक इतने सुंदर भी तो लगते हैं। ये नीरस काम तो नहीं लगते? अगर ये नीरस काम ही बने रहते तो वे स्त्रियां जो इन्हें करती आई हैं, उनका हाल क्या होता? वे क्या कभी हंसती, गुनगुनाती दिखाई देतीं?

लेकिन स्त्रियों की सबसे खास पहचान ही यह है कि वे खिलखिला कर हंसती हैं और बात-बात पर और बिना बात के भी हंसती हैं। इस हंसी का स्रोत कहां है? सोचने पर लगता है कि इसके दो स्रोत हैं। सब्जी, आचार, मिठाइयों में जो असंख्य स्वादों की, गोदड़ी, फ्राक, स्वेटर, बांस की डलिया, गोदने-मांडने के अनंत रंगों और नमूनों को सिरजने में जो कल्पना लगती है ,वही इसका स्रोत है। सृजन की शक्ति। कुछ गढ़ने की शक्ति।

लेकिन तब प्रश्न उठता है कि यह सब बनाने, गढ़ने की इच्छा ही क्यों होती है? इस इच्छा-शक्ति का स्रोत क्या है? यदि हम हिंदी के स्त्री-वाचक शब्दों या स्त्री भाव को व्यक्त करने वाले शब्दों की सूची बनाएं तो उसका जो सबसे प्रकट रूप निकल कर आता है वह कामधेनु या अन्नपूर्णा यानी हर इच्छापूरी करने वाली का है। वह भूमा, पृथ्वी, अंबा, शक्ति, सरिता, सविता, समिधा, वसुंधरा है। वह श्री, भारती, शाश्वती है। वह हर करने, सोचने लायक काम की ‘भूमिका’ है।

यह अपने आप में कितनी विचित्र बात है कि जो समाज अपनी भाषा में उसे “भूमिका” कहकर बुलाता है, उसी समाज और संस्कृति को खुद के निर्माण और विकास में स्त्रियों की कोई भूमिका दिखाई नहीं देती। अब जरा हर दिन के बिंबों में स्त्री को याद करिए- सड़क के किनारे पत्थर तोड़ती हुई, बगल में बच्चा और सिर पर ईंट, लकड़ी का गट्ठर ढोती हुई, बुवाई, गुड़ाई, निंदाई, कटाई करती हुई, फटकती, छानती, बीनती, समेटती हुई, जंगल से घास, टहनियां, बीड़ी-पत्ता, कंदमू ललाती, कचरे के ढेर से पन्नी-बोतल बीनती, बेचती, छोटी-सी बांस की डलिया से मछली पकड़ती, नाचती, गाती, जमीन, कपड़ों, मटकों पर चित्र बनाती हुई छवियां। इन असंख्य कामों को करते हुए भी मूलतः उसकी चिंता और भूमिका-अन्नपूर्णा की यानी, लालन-पालन करने की है।

मां होने के नाते सबका पेट भरने, सबको बीमारी या तरह-तरह की मुसीबतों से बचाने, उनके मंगल की, खुशहाली की कामना से वह भरी रहती है। उसके लिए कोई भी काम इतना छोटा नहीं हो सकता (कचरे के ढेर में घुसकर पन्नी-लोहा बीनना भी नहीं), यदि वह बच्चों की भूख मिटाने के लिए दो-चार रुपए दे सकता है। बड़े स्वप्न देखने का यहां मौका ही कहां है। वह सुकून भरा समय जिसमें दिमाग कोई गहरी, बड़ी बात सोच सके, ऐसा समय कहां है, एक कामगार स्त्री के पास?

जब एक स्त्री एक स्वेटर या डलिया-चटाई-सूपा-झाड़ू बनाती है, तो उन्हें घर में या अपने आसपास के लोगों के इस्तेमाल के लिए बना रही होती है। इन अपने लोगों के लिए बनाते हुए उस काम से रिश्ता प्यार का, अपनत्व का होता है। इसलिए ये काम थकाऊ और नीरस होने से बच जाते हैं। इन सारी चीजों का व्यवसायीकरण अभी हाल-हाल में शुरू हुआ है। स्त्री का संसार चूंकि घर के चारों ओर घूमता है, इसलिए यह एक भ्रम है कि उसकी देश के आर्थिक-सामाजिक विकास में कोई भूमिका नहीं होती।

तथ्य इससे बिलकुल विपरीत हैं। उसके हल चलाने पर मनाही है, पर वह खेती के तमाम अन्य कामों में सबसे अधिक जुड़ी है। अधिकतर लोग इस तथ्य को नहीं जानते कि हमारे देश में खेती के बाद दूसरे सबसे अधिक रोजगार कुटीर उद्योग या हस्तशिल्प से आते हैं। देश के पच्चीस करोड़ परिवार अपने हाथ के हुनर या कलाकारी से ही रोजगार पाते हैं। देश के निर्यात राजस्व का सबसे बड़ा हिस्सा यहीं से आता है। देश की अर्थव्यवस्था को हमारे हुनरमंद हाथ चला रहे हैं जिनमें स्त्रियों की भूमिका पुरुषों से अधिक नहीं, तो बराबर अवश्य है।

इससे भी अधिक छुपा हुआ, न दिखने वाला तथ्य यह है कि हमारे देश की अर्थव्यवस्था की रीढ़ स्वरोजगार है, यानी जो खुद अपना छोटा-मोटा, खेती, कुटीर उद्योग या मजदूरी जैसा काम करते हैं वे लोग हैं। हमारे देश में सरकारी और निजी दोनों को मिलाकर कुल सात प्रतिशत नौकरियां हैं। बाकी सब खुद काम करते हैं, भले ही वह अक्सर उनकी मर्जी का नहीं होता।

स्त्रियों के मामले में ये आंकड़े और भी भयानक रूप ले लेते हैं। पूरे देश में सिर्फ छह प्रतिशत स्त्रियां ही नौकरी करती हैं। बाकी 94 प्रतिशत स्त्रियां, यकीन मानिए, खाली नहीं बैठी हैं। वे स्वरोजगार से जुड़ी हैं। इन स्वयंसेवी स्त्रियों के काम करने की गिनती रखने वाला देश में कोई रजिस्टर नहीं है।

इला बहन और उनके द्वारा स्थापित बहनों की स्वयंसेवी संस्था ‘सेवा’ (सेल्फ एम्लॉयड वीमेन्स एसोसिएशन) इस नाते विलक्षण है। वह देश की इन असंख्यअकेले काम कर रही स्त्रियों को एक साथ जोड़कर उन्हें संगठित करती है।

(नवजीवन के लिए शंपा शाह का लेख)

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