खरी-खरी: तिलक लगाकर हिंदी और टोपी पहनकर उर्दू तो पिछड़ ही गईं, अब देश भी पिछड़ते देखिए

विडंबना यह है कि हम धर्म की विजय के नशे में गहरी नींद में हैं। वह भाषा हो अथवा समाज- यदि उसकी महत्वाकांक्षा और आरजू एक छोटे से दायरे में सीमित हो जाती है तो फिर वे सिकुड़ जाते हैं। हमने उर्दू और हिंदी को पिछड़ते देखा। अब हमारा दुर्भाग्य है कि हम देश को भी पिछड़ते देख रहे हैं।

फोटो : सोशल मीडिया
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ज़फ़र आग़ा

हिंदी और उर्दू भाषा के इतिहास, उनके उत्थान और इन दोनों भाषाओं का राजनीतिकरण तथा अंततः इन दोनों भाषाओं के पतन पर मृणाल पांडे का लेख कल सुबह आप नवजीवन में पढ़िएगा। भाषाओं के उत्थान और पतन पर लिखी गई इतनी बढ़िया रचना कम ही पढ़ने को मिलती है। एक दौर था कि इसी हिंदी में जयशंकर प्रसाद, मैथिली शरण गुप्त और महादेवी वर्मा-जैसे दर्जनों लेखक और कवि थे, तो उधर उर्दू में जोश, फिराक, फैज, मंटो, कृष्ण चंदर-जैसे अनगिनत साहित्यिक हीरे-मोती थे। परंतु सन1970 के दशक के बाद अब इन दोनों भाषाओं में सन्नाटा है। कोई बड़ा नाम नहीं दिखता है। जैसा मृणाल जी ने लिखा, अब सब अंग्रेजी की ओर भाग रहे हैं और भारत का बड़ा साहित्य भी वहीं पैदा हो रहा है।

परंतु हिंदी और उर्दू- दोनों भाषाओं के साथ हुआ क्या! हिंदी दिवस के इस पखवाड़े के अवसर पर यह प्रश्न बहुत अनिवार्य है कि अब इस हिंदवी भाषा में प्रेमचंद अथवा मैथिली शरण गुप्त क्यों नहीं पैदा होते हैं। वैसे ही, उर्दू अब एक फैज या कुर्रतुल ऐन हैदर को जन्म नहीं दे पा रही है। भाषाएं बोलचाल एवं अपनी उन्नति में साहित्य का माध्यम होती हैं। यदि उनके साथ धर्म जुड़ जाता है तो वे सिकुड़ने लगती हैं। दुर्भाग्य से भारतीय उपमहाद्वीप में आजादी से पूर्व ही हिंदी हिंदू बना दी गई और उर्दू को टोपी पहनाकर कलमा पढ़वा दिया गया। बस, वहीं से दोनों भाषाओं में घुन लग गया। वह तो कहिए कि स्वतंत्रता संग्राम और भारत के नव निर्माण के उद्देश्यों से ये दोनों भाषाएं ही प्रेरित रहीं और अपने रचनात्मक दौर के चरम पर पहुंचीं। परंतु जैसे-जैसे वे रचनात्मक परिदृश्य धूमिल होते गए, वैसे-वैसे दोनों ही भाषाएं अपने-अपने क्षेत्रों में सीमित होती चली गईं। वह तो कहिए कि बॉलीवुड ने हिंदी को सरकारों के प्रयासों से कहीं अधिक देशव्यापी बना दिया और फिल्मी गीतों और संवादों के कारण उर्दू आम जन में प्रचलित रही।

भाषा एक अत्यन्त व्यापक चीज का नाम है। यह मात्र समाज को बोलना ही नहीं अपितु जीना भी सिखाती है। इसके साथ केवल बोलचाल ही नहीं बल्कि एक पूरी सभ्यता, मान्यताएं, आकांक्षाएं एवं आरजुएं भी जुड़ी होती हैं। ऐसे सहज और प्रगतिशील माध्यम को यदि आप तिलक लगाकर पंडित बना दें अथवा टोपी पहनाकर मुल्ला बना दें तो वह कोई भी भाषा हो, वह सिकुड़ जाएगी। हिंदी और उर्दू के साथ यही हुआ।

इसके विपरीत देखिए, अंग्रेजी भाषा के साथ क्या हुआ और वह इस कदर तरक्की क्यों कर गई। यह अंग्रेजों की भाषा थी। विलायत से भारत आई। अंग्रेजों ने अंग्रेजी के माध्यम से हम पर राज किया। स्वाभाविक तो यह था कि स्वतंत्रता के बाद अंग्रेजी भाषा को इस देश से उखाड़ फेंकना चाहिए था। इसके विपरीत आज अंग्रेजी भारत वर्ष में ‘लिंक लैंग्वेज’ (आपस में जोड़ने वाली भाषा) है। स्वतंत्र भारत की कल्पना आप अंग्रेजी के बिना कर ही नहीं सकते हैं। आखिर क्यों! पहली बात तो यह है कि अंग्रेजों ने अंग्रेजी को ईसाई धर्म से नहीं जोड़ा, अर्थात अंग्रेजी पर किसी एक धर्म की छाप नहीं पड़ी। इसी कारणवश वह केवल अंग्रेजों की भाषा नहीं रही। फिर दूसरी सबसे बड़ी बात यह थी कि अंग्रेजी नए संसार की उन्नति का माध्यम बनी। यदि आपको अच्छा डॉक्टर अथवा वैज्ञानिक बनना है तो अंग्रेजी जरूरी है। अब महत्वाकांक्षाएं एवं आरजुएं भी अंग्रेजी से जुड़ गईं। अंग्रेजी केवल भाषा ही नहीं रह गई, वह तो 20वीं और 21वीं सदी में प्रगति का प्रतीक और माध्यम भी हो गई। तब भी तो आज भारतीय गांव में रह रहा एक किसान भी अपने बच्चे को ‘अंग्रेजी मीडियम स्कूल’ में पढ़ाना चाहता है। इधर, हिंदी और उर्दू में सांप्रदायिकता का घुन लग गया। हिंदी हिंदू हो गई और पाठशाला तक सीमित हो गई तथा उर्दू ने टोपी पहनकर स्वयं को मदरसों से जोड़ लिया। इन दोनों भाषाओं के पास इतिहास तो था परंतु तरक्की का बड़ा दायरा नहीं था। ऐसे में ये दोनों भाषाएं बड़े साहित्य से भी दूर होती चली गईं।

सांप्रदायिकता एक ऐसा घुन है जो केवल एक भाषा के लिए ही नहीं अपितु पूरे समाज एवं देश के लिए हानिकारक है। इसका सबसे बढ़िया उदाहरण हमारे पड़ोस में पाकिस्तान है। इस्लाम और मुसलमान के नाम से जन्मे इस देश में धर्म तथा सांप्रदायिकता इसके जन्म से ही जुड़ गई, अर्थात पाकिस्तान का दायरा शुरू से ही सिकुड़ गया। वहां सब कुछ अतीत था, वर्तमान कुछभी नहीं। भारत से घृणा के आधार पर जो समाज बना, उसकी राजनीति, अर्थव्यवस्था एवं सारी ही बातें आधुनिकता से परे थीं। अंततः हश्र यह हुआ कि पाकिस्तान पाकिस्तानी जनता की आरजुओं का देश नहीं अपितु मुट्ठी भर फौज के हितों का देश होकर रह गया जहां तरक्की के रास्ते बंद होते चले गए। कारण वही सांप्रदायिकता का घुन था जो सन 1947 में जन्म के साथ ही पाकिस्तान को लग गया और अंततः उसको चाट गया।

इसके विपरीत सन 1947 में भारत ने अपने अतीत के साथ-साथ भविष्य की भी कल्पना की। गांधी जी और जवाहरलाल नेहरू ने भारत के लिए आधुनिकता का मार्ग चुना। देश में लोकतंत्र की प्रथा चली। चारों ओर आधुनिक संस्थाओं का निर्माण हुआ। 21वीं सदी आते-आते भारत संसार के उन गौरवशाली देशों में था जिसकी अर्थव्यवस्था संसार में पांचवीं बड़ी अर्थव्यवस्था हो गई। सात दशकों में प्रगति का यह हाल था कि हमारी जीडीपी मनमोहन सिंह की सरकार के आखिरी समय में सात प्रतिशत की दर से वृद्धि कर रही थी। परंतु अभी पिछले सप्ताह जो आंकड़ेआए हैं, उनके अनुसार, भारत की जीडीपी सिकुड़ कर लगभग 24 प्रतिशत के घाटे में चली गई। हमारी वित्त मंत्री कहती हैं कि यह सब भगवान का प्रकोप है, अर्थात कोविड महामारी के कारण देश की यह दुर्दशा हुई। इस बयान में कुछ सच्चाई तो हो सकती है परंतु भारत की इस दुर्दशा का कारण केवल कोविड-19 ही नहीं है।

तो फिर क्या बात है कि भारत जैसी एक प्रगतिशील व्यवस्था को भी घुन लग गया जो हमारी तरक्की को चाट गया। यह वही घुन है जिसने पाकिस्तान को तबाह किया। नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारत में भी पाकिस्तान के समान सांप्रदायिकता एवं घृणा का घुन लग गया। और केवल मोदी के छह वर्षीय शासनकाल में भारत की लोकतांत्रिक प्रणाली से लेकर अर्थव्यवस्था तक हर चीज को घुन चाटे जा रहा है। अरे, यह कौन सा लोकतंत्र है कि देश की संसद तो चले परंतु सांसदों को प्रश्न पूछने की अनुमति न हो। लोकतंत्र में सवाल न उठें, यह स्वयं लोकतंत्र पर सवाल खड़ा कर देता है। न्यायपालिका की यह दशा कि प्रशांत भूषण के अवमानना के एक मामले में पूरी न्यायपालिका ही हिल जाए, यह दयनीय स्थिति है। देश की अफसरशाही सरकार से सवाल पूछने के बजाय उसकी इच्छा के आगे घुटने टेक दे और पूरा देश पीएमओ की इच्छानुसार चले, यह चिंताजनक स्थिति नहीं तो फिर क्या है। अर्थव्यवस्था का जो हाल है तो उसे सब झेल ही रहे हैं। फिर मीडिया में सरकार की आलोचना के बजाय बॉलीवुड के एक कलाकार की आत्महत्या का पूरा ‘सोप ओपेरा’ चले, यह तो भारतीय मीडिया की परंपरा के विरुद्ध है।

परंतु आज के भारत में यही सब कुछ मान्य है। क्योंकि हमारी राजनीति ही नहीं, हमारे समाज को भी सांप्रदायिकता एवं घृणा का घुन लग चुका है। यह वह घुन है जो हमको चाटे जा रहा है। और विडंबना यह है कि हम धर्म की विजय के नशे में गहरी नींद में हैं। वह भाषा हो अथवा समाज- यदि उसकी महत्वाकांक्षा और आरजू एक छोटे से दायरे में सीमित हो जाती है तो फिर वे सिकुड़ जाते हैं। हमने उर्दू और हिंदी को पिछड़ते देखा। अब हमारा दुर्भाग्य है कि हम देश को भी पिछड़ते देख रहे हैं।

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