नेल्सन मंडेला की जन्मशती: दुनिया को आज उनके विचारों की सबसे ज्यादा जरूरत

दक्षिण अफ्रीका के पूर्व राष्ट्रपति नेल्सन मंडेला की 100वीं जयंती

नेल्सन मंडेला ने गांधीवादी विचारों से प्रेरणा लेकर रंगभेद के खिलाफ अपने संघर्ष की शुरुआत की थी और दक्षिण अफ्रीका के दूसरे गांधी बन गए। महात्मा गांधी ने कहा था कि उन्हें आश्चर्य नहीं होगा अगर किसी दिन कोई अश्वेत नेता उनके सिद्धांतों को आगे ले जाए।

दक्षिण अफ्रीका के पूर्व राष्ट्रपति नेल्सन मंडेला की जन्मशती के बहाने पूरा विश्व उनको और उनके योगदान को आज याद कर रहा है। 1964 से 1990 तक रंगभेद और अन्याय के खिलाफ लड़ाई की वजह से जेल में जीवन के 27 साल बिताने वाले अफ्रीका के पिता नेल्सन मंडेला ने ऐसे समय में अहिंसा, असहयोग और सत्य का रास्ता अपनाया जब दुनिया हिरोशिमा और नागासाकी की हिंसा में डूबी हुई थी। दुनिया विश्व युद्ध के नतीजों से जूझ रही थी। शादी से बचने के लिए अपना घर छोड़ कर भागे नेल्सन मंडेला ने जोहान्सबर्ग में खदान का गार्ड बन कर काम शुरू किया और फिर यहीं से प्रेस की स्वतंत्रता के लिए और रंगभेद के खिलाफ उनकी लड़ाई शुरू हुई।

20 अप्रैल 1964 को मंडेला ने प्रीटोरिया में सुनवाई के दौरान एक ऐसा बयान दिया, जिससे पता चलता है कि रंगभेद को मिटाने के लिए उनका संकल्प कितना मजबूत था। गोरों के राज को खत्म करने के संघर्ष में वह अपनी जिंदगी भी कुर्बान करने को तैयार थे। उन्होंने कहा, "मैंने अपने जीवन को अफ्रीकी लोगों के संघर्ष के लिए समर्पित कर दिया है। मैं श्वेतों के वर्चस्व के खिलाफ लड़ा और अश्वेतों के वर्चस्व के खिलाफ भी लड़ूंगा। मैंने एक लोकतांत्रिक और स्वतंत्र समाज के आदर्श को संजोया जहां सभी व्यक्ति सद्भाव और समान अवसर के साथ रहें। यह मेरे लिए एक उम्मीद और जीने का आदर्श है। लेकिन अगर जरूरत पड़ी तो मैं इसके लिए मरने को भी तैयार हूं।'' दो महीने के बाद मंडेला समेत सात लोगों को उम्र कैद की सजा हुई।

27 साल जेल में बिताने के बाद 11 फरवरी 1990 को उन्हें जेल से रिहा कर दिया गया। मंडेला को केप टाउन के पास विक्टर वर्स्टर जेल में रखा गया था। जेल से निकलते वक्त मंडेला अपनी पत्नी विनी मंडेला का हाथ पकड़े हुए थे। चेहरे पर मुस्कुराहट और अपनी मुट्ठी को आसमान की तरफ भींचे मंडेला ने लोगों का अभिवादन स्वीकार किया। समर्थकों के लिए उनका जेल से बाहर आना अकल्पनीय था। लोग खुशी से पागल हो रहे थे। दुनिया भर से पत्रकार इस क्षण को अपने कैमरों में कैद करने के लिए बेताब दिखे। टेलीविजन के जरिए दुनिया ने मंडेला को जेल से बाहर आते देखा। भले ही लोग मंडेला को टीवी पर देख रहे थे लेकिन मानो उनके शरीर में बिजली दौड़ रही थी। लंबा अरसा जेल में बिताने के कारण बहुत से लोगों को नहीं पता था कि अब मंडेला कैसे दिखते हैं। न ही लोगों ने उनकी कोई ताजा तस्वीर देखी थी। इस स्वागत को देख मंडेला आश्चर्यचकित रह गए। उन्होंने लिखा, "जब मैं भीड़ के बीच था तो मैंने अपनी दाहिनी मुट्ठी उठाई और उस वक्त वहां बहुत शोर था। 27 सालों तक मैं ऐसा नहीं कर पाया था। जिससे मुझे शक्ति और खुशी दोनों का अहसास हुआ।'' मंडेला ने याद किया, "जब मैं अंतिम बार उन गेटों के बीच से दूसरी तरफ कार में बैठने के लिए गया तो मुझे 71 साल की उम्र में ऐसा लगा कि मेरी जिंदगी नए सिरे से शुरू हो रही है।"

10 मई 1994 को लोकतांत्रिक चुनावों के बाद नेल्सन मंडेला दक्षिण अफ्रीका के पहले अश्वेत राष्ट्रपति चुने गए। दक्षिण अफ्रीका की राजधानी प्रीटोरिया में जब मंडेला ने राष्ट्रपति पद की शपथ ली तो उस ऐतिहासिक पल को देखने के लिए दुनिया भर के नेता मौजूद थे। मंडेला के राष्ट्रपति बनने के बाद पूरे अफ्रीका में जश्न का माहौल था। अपने भाषण के अंत में मंडेला ने कहा था, "कभी नहीं, कभी नहीं और कभी नहीं यह खूबसूरत धरती कभी दूसरों के उत्पीड़न को अनुभव करेगी। अब स्वतंत्रता का राज होगा। मानवता के इससे बेहतर उपलब्धि के मौके पर सूरज कभी नहीं डूबेगा। ईश्वर अफ्रीका को आशीर्वाद दे। शुक्रिया।"

नेल्सन मंडेला ने गांधीवादी विचारों से प्रेरणा लेकर रंगभेद के खिलाफ अपने संघर्ष की शुरुआत की थी और दक्षिण अफ्रीका के दूसरे गांधी बन गए। महात्मा गांधी ने कहा था कि उन्हें आश्चर्य नहीं होगा अगर किसी दिन कोई अश्वेत नेता उनके सिद्धांतों को आगे ले जाए।

मंडेला का जन्म 1918 में देश के दक्षिण पूर्वी हिस्से में हुआ था। उन्होंने 1943 में अफ्रीकी नेशनल कांग्रेस (एएनसी) में कदम रखा। उनकी मदद से 1961 में पार्टी की सैनिक टुकड़ी बनी। लेकिन 1964 में उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया और उम्र कैद की सजा मिली। उन्हें 27 साल तक जेल में रहना पड़ा, जिसमें कुछ खासे मेहनत के साल भी थे। इसकी वजह से उनके फेफड़े और आंखों पर बहुत खराब असर पड़ा। जेल में भी रंगभेद का बोलबाला था। अश्वेतों को अलग रखा जाता और उन्हें खाना भी कम दिया जाता। जेल में रहने के दौरान मंडेला की लोकप्रियता दुनिया में बढ़ती गई और उन्हें अफ्रीका के सबसे अहम नेताओं में एक माना जाने लगा।

5 दिसंबर 2013 को जोहान्सबर्ग में अपने परिवार वालों के बीच नोबेल पुरस्कार विजेता नेल्सन मंडेला ने दुनिया को अलविदा कहा।

(DW के इनपुट के साथ)

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