जन्मदिन विशेष: साहित्य में डूबकर सुकून की ज़िंदगी जीने वाले शहरयार, जिनके लिखे गीत हमेशा के लिए अमर हो गए

‘उमराव जान’ के गीतों की अपार सफलता के बाद शहरयार के पास फिल्मों की लाइन लग गयी। देश भर में होने वाले प्रतिष्ठित मुशायरों का वे अनिवार्य हिस्सा बन गए। शहरयार को यह कहने में कभी झिझक नहीं हुई कि फिल्मों में लेकप्रियता का फायदा उन्हें मुशायरों में मिला।

फोटो: सोशल मीडिया
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इकबाल रिजवी

साहित्य की दुनिया में शोहरत कमा कर फिल्मी दुनिया में अपनी जगह बनाने वाले शायरों की लंबी सूची है। लेकिन फिल्मी दुनिया में हिट होने के बावजूद साहित्य से भी गहरा नाता जोड़े रखने वाले शायर बहुत कम हैं। इन कम लोगों की फेहरिस्त में एक बड़ा नाम है शहरयार। शहरयार को फिल्मों में जगह मिली उनकी साहित्यिक हैसियत की वजह से और साहित्य जगत में उनके फिल्मी ग्लैमर ने उन्हें फायदा पहुंचाया।

16 जून 1936 में जन्मे शहरयार अलीगढ़ यूनीवर्सिटी से पढ़ कर 1966 से वहीं उर्दू विभाग में पढ़ाने लगे। लेकिन इससे पहले ही वे स्थापित शायर बन चुके थे। 1965 में ही इनका पहला काव्य संग्रह ‘इस्मे-आज़म’ प्रकाशित हो चुका था। फिर सन् 1969 में इसका दूसरी काव्य-संग्रह ‘सातवां दर’ छपा। उनके मन में कभी इस तरह की इच्छा नहीं आयी कि उन्हें फिल्मों में लिखना चाहिये।

शिद्दत के साथ साहित्य में डूबे रहने वाले और सुकून से जिंदगी गुजारने वाले शहरयार के जूनियर और दोस्त मुज़फ़्फर अली जो तब एक पेंटर थे, ने शहरयार को एक दिन खत लिका और बताया कि वे एक फिल्म बना रहे हैं, जिसके लिये उनकी दो ग़ज़लें लेना चाह रहे हैं। ये फिल्म थी ‘गमन’। इसमें मुज़फ़्फर अली ने शहरयार की दो ग़ज़लें ‘सीने में जलन आंखों में तूफान-सा क्यों है’ और ‘अजीब सानेहा मुझ पर गुजर गया यारो’ शामिल कीं। ये दोनो ग़ज़लें बहुत लोकप्रिय हुईं। बिना मुंबई गए शहरयार फिल्मों में हिट हो चुके थे।

इसके बाद मुज़फ़्फर अली ने फिल्म ‘उमराव जान’ बनायी। शुरू में मुज़फ़्फर अली का इरादा था कि पूरी फिल्म नज़्म में बनायी जाए। राजकुमार और प्रिया राजवंश अभिनीत फिल्म ‘हीर रांझा’ में यह प्रयोग किया जा चुका था।

शहरयार ने फिल्म के शुरूआती दौर की कहानी को नज़्म में पिरोया, लेकिन किन्हीं कारणों से मुज़फ़्फर अली इस प्रयोग को आगे कायम नहीं रख सके। लेकिन उन्होंने इस फिल्म के लिये शहरयार से गीत लिखवाये। इस फिल्म की गज़ल ‘दिल चीज़ क्या है आप मेरी जान लीजिए’, ‘जुस्तजू जिसकी थी उसको तो ना पाया हमने’, ‘इन आंखों की मस्ती के मस्ताने हजारों है’ और ‘ज़िंदगी जब भी तेरी बज़्म में लाती है मुझे’, भारतीय फिल्म संगीत की कालजयी रचनाएं साबित हुईं। इनकी लोकप्रियता में संगीतकार खय्याम का भी बराबर का योगदान रहा।

‘उमराव जान’ के गीतों के सुपर हिट होने के बाद शहरयार के पास फिल्मों के प्रस्तावों की लाइन लग गयी। लेकिन शहरयार को जल्द ही एहसास हो गया कि वे वहां की जिंदगी के लिए नहीं बने हैं। उन्हें फिल्में बनाने और बेचने वाले अधिकांश लोग कम पढ़े-लिखे और छोटे जेहन के लगे। जिनसे शहरयार का वास्ता पड़ा उनकी बातें बहुत सतही और हल्की होती थीं। इसके अलावा जिस मुकाम पर आकर शहरयार को फिल्मों में काम करने का मौका मिला, वहां तक पहुंचकर वे पूरी तरह सुकून की जिंदगी गुजारने के आदी हो चुके थे और वे परिवार छोड़कर नहीं रह सकते थे।

फिर भी मुंबई में मुज़फ़्फर अली के पास रह कर शहरयार ने यश चोपड़ा की फिल्म ‘फ़ासले’ के गीत लिखे। मुजफ्फर अली की फिल्म ‘जूनी’ के गाने लिखे, वो रिकार्ड भी हुए लेकिन फिल्म पूरी नहीं बन सकी, इसलिये गाने रिलीज नहीं हुए। मुज़फ़्फर अली के निर्देशन में बन रही एक और फिल्म ‘दामन और अंजुमन’ के लिये भी शहरयार ने गीत लिखे। लेकिन उनका दिल लगा रहा अलीगढ़ और साहित्य जगत में।

1978 में उनका काव्य संग्रह ‘हिज़्रके मौसम’ और 1985 में ‘ख्वाब का दर बन्द है’ प्रकाशित हुआ। शहरयार तब तक उर्दू शायरी के सशक्त हस्ताक्षर के रूप में स्थापित हो चुके थे। हांलाकी वे साहित्य और फिल्मी दुनिया के बीच संतुलन बनाने के लिए तैयार थे। उन्हें फिल्मों में गाने लिखने से परहेज़ नहीं था। लेकिन उनकी शर्त थी कि फिल्म तो ऐसी हों, जिसमें वे गाने लिख सकें यानी कहानी में गीतों की गुंजाइश तो हो।

इस बीच शहरयार की नज़्में और गज़लें मुशायरों और पत्र पत्रिकाओं के जरिये दुनिया भर में धूम मचा रही थीं।

जिंदगी जैसी तवक्को थी नहीं, कुछ कम है। हर घड़ी होता है एहसास कहीं, कुछ कम है॥

ऐसे हिज्र के मौसम अब कब आते हैं तेरे अलावा याद हमें सब आते हैं

सूरज का सफ़र ख़त्म हुआ रात न आयी हिस्से में मेरे ख़्वाबों की सौग़ात न आयी

कहां तक वक्त के दरिया को हम ठहरा हुआ देखें ये हसरत है कि इन आंखों से कुछ होता हुआ देखें

कागज की कश्तियां भी बहुत काम आएंगी

जिस दिन हमारे शहर में सैलाब आएगा

लेकिन शहरयार को यह कहने में कभी झिझक नहीं हुई कि फिल्मों में लेकप्रियता का फायदा उन्हें मुशायरों में मिला। ‘उमराव जान’ के गीतों की अपार लोकप्रियता के बाद शहरयार देश भर में होने वाले प्रतिष्ठित मुशायरों का अनिवार्य हिस्सा बन गए। 13 फरवरी 2012 को उनका निधन हो गया।

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