बी आर चोपड़ा: सामाजिक मुद्दों को सिनेमा में उतारने वाला महान निर्देशक, जिसने महाभारत को घर-घर पहुंचाया
बी आर चोपड़ा ने समाज के बदलने का इंतजार नहीं किया, बल्कि अपनी 'धूल का फूल', 'नया दौर', 'कानून', 'साधना', 'गुमराह', और 'निकाह' जैसी फिल्मों से समाज को बदलने की ठाना।

फिल्म निर्माता-निर्देशक बलदेव राज चोपड़ा यानी बीआर चोपड़ा भारतीय सिनेमा के उन दिग्गज फिल्मकारों में से एक थे, जिन्होंने मनोरंजन के साथ गंभीर सामाजिक मुद्दों को जोड़ा। उनका पूरा सिने करियर सामाजिक सरोकारों, सार्थक कहानियों और साहसिक विषयों से भरा रहा। भले ही वे इस दुनिया में नहीं रहे लेकिन उनकी फिल्में और टीवी सीरियल 'महाभारत' आज भी लोगों के दिलों में जिंदा हैं।
फिल्म निर्माता बलदेव राज चोपड़ा, यानी बीआर चोपड़ा ने न केवल मनोरंजन से भरपूर फिल्में बनाई, बल्कि समाज में मौजूद कुरीतियों और संवेदनशील मुद्दों को भी अपने सिनेमा के माध्यम से उजागर किया। जिस विषयों पर अक्सर खुलकर चर्चा नहीं होती थी, उन पर भी उन्होंने बेबाकी से फिल्में बनाईं। 22 अप्रैल को उनकी जयंती के अवसर पर भारतीय सिनेमा में उनके योगदान को याद किया जा रहा है।
बी.आर. चोपड़ा का नाम आते ही आंखों के सामने 'महाभारत' के दृश्य सामने आ जाते हैं। महाभारत के संगीत के लिए किरदार तक लोगों के दिलों में जिंदा हैं, लेकिन उनके द्वारा बनाई गई फिल्मों ने भी लोगों को सोचने के लिए मजबूर किया। बी. आर. चोपड़ा ने समाज के बदलने का इंतजार नहीं किया, बल्कि अपनी 'धूल का फूल', 'नया दौर', 'कानून', 'साधना', 'गुमराह', और 'निकाह' जैसी फिल्मों से समाज को बदलने की ठानी।
बीआर चोपड़ा का जन्म 22 अप्रैल 1914 को लाहौर (अविभाजित भारत) में हुआ था। उन्होंने लाहौर विश्वविद्यालय से अंग्रेजी साहित्य में एमए किया। वह फिल्म समीक्षा लिखते थे और कहानियां भी लिखा करते थे। साल 1955 में उन्होंने अपना प्रोडक्शन हाउस 'बीआर फिल्म्स' स्थापित किया। उनकी फिल्में हमेशा सामाजिक संदेश देती थीं। 'नया दौर' (1957) में दिलीप कुमार और वैजयंतीमाला के साथ उन्होंने मजदूर-पूंजीपति के संघर्ष को दिखाया। 'गुमराह', 'कानून', 'हमराज', 'निकाह', 'कर्म' जैसी फिल्मों ने दर्शकों को सोचने पर मजबूर किया। उनकी आखिरी फिल्म 'भूतनाथ' रही।
लेकिन क्या आप जानते हैं कि इतनी कालजयी फिल्में और 'महाभारत' बनाने वाले बी.आर. चोपड़ा ने खाली समय में फिल्में बनाने का फैसला लिया था और वो भी दोस्तों के साथ मजाक-मजाक के दौरान? बी.आर. चोपड़ा की पहली निर्देशित फिल्म 'अफसाना' थी, जिसे उन्होंने अपने दोस्तों के साथ मिलकर बनाया था। फिल्म में अशोक कुमार, प्राण, और अभिनेत्री वीना लीड रोल में थे। खास बात यह रही कि उन्होंने कभी किसी को असिस्ट नहीं किया था और न ही डायरेक्शन के लिए प्रशिक्षण लिया था।
'अफसाना' बॉक्स ऑफिस पर सुपरहिट साबित हुई और यहीं से उनके निर्देशक बनने का सफर शुरू हुआ। अपनी फिल्म अफसाना के बारे में बात करते हुए बी.आर. चोपड़ा ने खुद बताया था कि जिस वक्त वे अफसाना बना रहे थे, उस वक्त वे फिल्म जर्नलिस्ट थे। उन्होंने कहा, "कॉलेज के दिनों में मुझे लिखना बहुत पसंद था और कॉलेज पूरा होने के बाद अखबार में काम करने लगा। देश के विभाजन का समय पास आया और उस वक्त अखबारों पर पाबंदी लगा दी गई। विभाजन के बाद भी उस तरीके से नहीं लिख पा रहा था, जैसा लिखना चाहता था। ऐसे में लगा कि अब क्या किया जाए, तब मेरे कुछ दोस्तों ने कहा कि चलो एक फिल्म बनाते हैं। हम सबने पैसे मिलाकर फिल्म का निर्माण किया और फिल्म सुपरहिट गई।"
बहुत कम लोग जानते हैं कि बी.आर. चोपड़ा की फिल्म 'साधना', जिसे बहुत पसंद किया गया, उसे लेकर लोगों की राय बहुत अलग थी। उनके दोस्तों और इंडस्ट्री ने फिल्म को न बनाने की सलाह दी थी, क्योंकि फिल्म एक वेश्या पर बनी थी। लोगों का कहना था कि इस काम को समाज में बुरा माना जाता है। अगर उस पर फिल्म बनाई जाएगी तो फ्लॉप साबित होगी, लेकिन बी.आर. चोपड़ा ने ठान लिया था कि अगर बदलाव की जरूरत है तो फिल्म बनानी ही पड़ेगी।
उनका मानना था कि वेश्यावृत्ति एक सामाजिक समस्या और परिस्थितियों से उत्पन्न स्थिति है, जिसे केवल समाजिक सुधार के माध्यम से ही ठीक किया जा सकता है। वे यह भी मानते थे कि यदि समाज इस पेशे में कार्यरत महिलाओं को स्वीकार कर सम्मानपूर्वक मुख्यधारा में स्थान दे, तो आगे चलकर किसी भी महिला को मजबूरी में इस मार्ग पर आने की आवश्यकता ही नहीं पड़ेगी।
बीआर चोपड़ा ने अपने करियर में कई यादगार फिल्में दीं, लेकिन उनकी 1957 में रिलीज फिल्म 'नया दौर' से जुड़ा एक दिलचस्प किस्सा आज भी चर्चा में रहता है। यह वही फिल्म है, जिसकी कहानी शुरुआत में कई बड़े फिल्मकारों को पसंद नहीं आई थी, जिनमें मशहूर निर्देशक महबूब खान भी शामिल थे।
बीआर चोपड़ा ने एक इंटरव्यू में बताया था कि 'नया दौर' की कहानी उन्हें उनके दोस्त और लेखक एफ.ए. मिर्जा ने सुनाई थी। यह कहानी इंसान और मशीनों के बीच संघर्ष पर आधारित थी, जिसमें एक तांगा चलाने वाले की जिंदगी को केंद्र में रखा गया था। उस दौर में यह विषय काफी अलग और जोखिम भरा माना जाता था। दिलचस्प बात यह है कि इस कहानी को पहले कई नामी फिल्ममेकर्स को सुनाया गया, लेकिन सभी ने इसे खारिज कर दिया। किसी ने इसे ‘डॉक्यूमेंट्री’ जैसा बताया, तो किसी ने ‘बकवास’ कहकर नकार दिया। यहां तक कि महबूब खान ने भी इस कहानी को पसंद नहीं किया और इसे ‘तांगे वाले की कहानी’ कहकर नजरअंदाज कर दिया।
इसके बावजूद बीआर चोपड़ा को इस कहानी में दम नजर आया। उन्होंने तय किया कि वह इस पर फिल्म जरूर बनाएंगे। उन्होंने यह भी कहा कि फिल्म को असली रूप देने के लिए इसे गांवों और खुले स्थानों पर शूट किया जाना चाहिए, ताकि कहानी की सच्चाई और प्रभाव दर्शकों तक पहुंचे। फिल्म को लेकर एक दिन महबूब खान खुद बीआर चोपड़ा के घर पहुंचे। उन्होंने चोपड़ा से कहा कि वह इस फिल्म को न बनाएं, क्योंकि इससे उनका नुकसान हो सकता है। उन्होंने यहां तक कह दिया कि “तुम इस फिल्म से खत्म हो जाओगे।” लेकिन चोपड़ा अपने फैसले पर अडिग रहे और उन्होंने फिल्म रिलीज करने का निर्णय लिया। फिल्म रिलीज होने के बाद जो हुआ, वह इतिहास बन गया।
'नया दौर' बॉक्स ऑफिस पर जबरदस्त हिट साबित हुई और सिनेमाघरों में लंबे समय तक चली। फिल्म ने दर्शकों का दिल जीत लिया और अपनी कहानी व संदेश के कारण खास पहचान बनाई। फिल्म की सफलता के बाद जब इसकी सिल्वर जुबली मनाई जा रही थी, तब महबूब खान ने बीआर चोपड़ा को फोन कर कहा, 'मुख्य अतिथि के तौर पर किसे बुला रहे हो?' फिर कहा, 'मैं ही मुख्य अतिथि के रूप में आ जाता हूं।' इस मौके पर उन्होंने खुले मंच से स्वीकार किया कि उन्हें यह कहानी पसंद नहीं थी, लेकिन बीआर चोपड़ा की हिम्मत और विश्वास की जीत हुई। महबूब खान ने कहा कि यह फिल्म उनकी उम्मीदों के विपरीत बेहद सफल रही और इसका श्रेय चोपड़ा के साहस और दृढ़ निश्चय को जाता है। उन्होंने माना कि एक फिल्मकार के लिए अपने फैसले पर भरोसा रखना कितना जरूरी होता है।
बीआर चोपड़ा का इंडस्ट्री में योगदान केवल मनोरंजन तक सीमित नहीं था, बल्कि उन्होंने नई दिशा देने के साथ ही गंभीर विषयों पर आधारित कहानियों को दर्शकों तक पहुंचाया। साल 1998 में उन्हें भारतीय सिनेमा के सर्वोच्च सम्मान, दादा साहब फाल्के अवार्ड, से सम्मानित किया गया। वह एक ऐसे फिल्मकार थे जो अपने आप में एक संस्था, एक स्कूल और सिनेमा थे।
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