गुरुदत्त का सिनेमा: जीवन की सार्थकता की व्याकुल तलाश हैं ‘प्यासा’ और ‘कागज के फूल’

गुरुदत्त ने युवावस्था में मिली सफलता का उपयोग ऐसी नींव बनाने के लिए किया जिसके आधार पर वे बेहतर दुनिया के लिए महत्त्वपूर्ण योगदान देने वाली कुछ अमूल्य फिल्में बनाएं।

फोटो: सोशल मीडिया
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भारत डोगरा

सिनेमा के इतिहास में यह एक महत्त्वपूर्ण द्वंद्व रहा है कि इस अति सशक्त माध्यम का उपयोग सस्ते और सतही मनोरंजन द्वारा धन अर्जन के लिए होगा या इसका उपयोग गहरी मानवीय संवेदनाओं के संप्रेषण के साथ एक बेहतर दुनिया बनाने के सबसे व्यापक और सार्थक उद्देश्य के लिए भी हो सकता है। चूंकि पहला रास्ता ही अधिक सरल-सुलभ है, अतः अधिकांश प्रयास उससे आगे जाने का विशेष प्रयास भी नहीं करते हैं। विश्व में बनने वाली अधिकांश फिल्में इसी श्रेणी की हैं। इस कारण सिनेमा की मुख्यधारा की एक छवि बनती है जो दूसरी श्रेणी के फिल्मकारों का कार्य अधिक कठिन बना देती है। इसके बावजूद सिनेमा के इतिहास के अनेक फिल्मकारों ने सिनेमा के सार्थक उपयोग के लिए, एक बेहतर दुनिया के निर्माण में इस सार्थक माध्यम के उपयोग के लिए कठिन परिस्थितियों में अथक प्रयास किए हैं। हिंदी सिनेमा के ऐसे फिल्मकारों में गुरुदत्त का बहुत महत्त्वपूर्ण स्थान है। केवल 39 वर्ष की अल्पायु के बावजूद उनकी उपलब्धियां यादगार रहीं।

बहुत कम आयु में ही गुरुदत्त बाजी, आर-पार, जाल, मिस्टर और मिसेज फिफ्टी और सीआईडी जैसी सफल फिल्मों के निर्देशन, निर्माण, अभिनय जैसे महत्त्वपूर्ण पक्षों से जुड़े रहने के कारण एक सफल फिल्म निर्माता, निर्देशक और अभिनेता (नायक) की ख्याति अर्जित कर चुके थे। यह फिल्में सफल होने के साथ-साथ साधारण मनोरंजक फिल्मों से कुछ आगे जाती थीं, कुछ महत्त्वपूर्ण मुद्दे भी उठा रही थीं, पर कुल मिलाकर उनका दायरा हिन्दी फिल्मों की सामान्य परिधि के भीतर ही था।

युवावस्था में मिली इस सफलता का एक परिणाम यह हो सकता था कि व्यक्ति अहंकारी हो जाता या इस सफलता को एक फार्मूले में बदल कर इसी राह पर और वाहवाही, प्रसिद्धि और धन बटोरने का प्रयास करता। पर गुरुदत्त ने इस आरंभिक सफलता का उपयोग ऐसी नींव बनाने के लिए किया जिसके आधार पर वे बेहतर दुनिया के लिए महत्त्वपूर्ण योगदान देने वाली कुछ अमूल्य फिल्में बनाएं।

इस बहुत सार्थक प्रयास का सफर प्यासा फिल्म (1957) के निर्माण से आरंभ हुआ और गुरुदत्त की अगली फिल्म कागज के फूल (1959) में जारी रहा। इन दोनों फिल्मों में एक सी गहरी तड़प, व्याकुलता है जो इन्हें अन्य फिल्मों से अलग पहचान देती है। इसके बाद भी गुरुदत्त बैनर की फिल्में ‘साहब बीबी गुलाम’, ‘चैदहवीं का चांद’ और ‘बहारें फिर भी आएंगी’ (इस अंतिम फिल्म को गुरुदत्त के बाद उनके भाई आत्माराम ने पूरा किया) जैसी श्रेष्ठ फिल्में थीं पर प्यासा और कागज के फूल का एक अलग ही स्थान है और गुरुदत्त के सिनेमा की मूल पहचान इन दो फिल्मों से है। इन दो फिल्मों में गुरुदत्त निर्माता, निर्देशक और नायक तीनों रूप में उपस्थित हैं और यह स्पष्ट है कि अपनी पूरी प्रतिभा और प्रयत्न वे इन फिल्मों में अर्पित कर रहे हैं। इसके बाद उन्होंने कोई अन्य फिल्म निर्देशित नहीं की।

इन फिल्मों के लिए गुरुदत्त ने अपने-अपने क्षेत्र की अद्वितीय प्रतिभाओं का संयोजन किया है, ऐसी प्रतिभाएं जो गुरुदत्त की तड़प को समझ सकती हैं, उसमें बखूबी सहयोग कर सकती हैं। गीतकार/कवि के रूप में बहुत महत्त्वपूर्ण देन साहिर लुधियानवी (प्यासा) और कैफी आजमी (कागज के फूल) की है, तो अमर संगीतकार के रूप में सचिन देव बर्मन दोनों फिल्मों में मौजूद है। दोनों फिल्मों में मोहम्मद रफी और गीतादत्त ने अपने ही नहीं, हिन्दी सिनेमा के कुछ श्रेष्ठतम कालजयी गीत गाए हैं। रफी साहब की विविधता विख्यात है। पर इन दो फिल्मों के तीन गीत ऐसे हैं जिनकी कोई मिसाल ही नहीं है, जो उनकी महान प्रतिभा के मानदंड से भी एक अलग ही अद्वितीय श्रेणी के गीत हैं। छायाकार के रूप में मौजूद थे मूर्ति साहब जो खूब समझते थे कि गुरुदत्त जो दिखाना चाहते हैं उसे सेलुलायड पर कैसे उतारना है। नायिका के रूप में दोनों फिल्मों में मौजूद थीं वहीदा रहमान जिन्होंने स्वयं फिल्म और हकीकत दोनों में कहा था कि उनकी उस समय तक छिपी विलक्षण प्रतिभा का भरोसा उतना उन्हें स्वयं नहीं था जितना गुरुदत्त को था। बिम्बों या प्रतीकों का बहुत कलात्मक उपयोग इन फिल्मों में है, चाहे वह ट्रेन के इधर-उधर या लिफ्ट के ऊपर नीचे जाने का दृश्य हो, स्टूडियो के कृत्रिम प्रकाश का या भंवरे और फूल का।

माला सिन्हा की भूमिका तो ‘प्यासा’ में चिर-स्मरणीय है इसके अतिरिक्त जानी वाकर हों या टुनटुन या रहमान, नायक और नायिका के अतिरिक्त अन्य चरित्रों का जैसा स्मरणीय उपयोग ‘प्यासा’ में हुआ, वह ‘कागज के फूल’ में दोहराया न जा सका। इसी तरह जहां ‘प्यासा’ के सभी गीत महान है, वहां ‘कागज के फूल’ के केवल दो गीत चिरस्मरणीय हैं। संपादन के स्तर पर भी ‘प्यासा’ अधिक चुस्त है, जबकि कागज के फूल की निर्माण प्रक्रिया में कहीं-कहीं थकान नजर आती है।

इन कमियों के बावजूद ‘कागज के फूल’ हिंदी की सिनेमा की एक महान उपलब्धि है जबकि ‘प्यासा’ का तो यह स्थान है कि महानतम् हिंदी फिल्म के किसी भी चुनाव में उसे ध्यान में रखे बिना चुनाव प्रक्रिया पूरी हो नहीं सकती है। इन फिल्मों ने पांच गीत ऐसे दिए हैं जिन्हें हिंदी सिनेमा के महानतम् गीतों की सूची से बाहर करना असंभव है।

यह पांच गीत हैं- ‘ये दुनिया अगर मिल भी जाए तो क्या है’, ‘जिन्हें नाज है हिंद पर वो कहा हैं’, ‘आज सजन कोई’ (प्यासा), ‘बिछुड़े सभी बारी-बारी’ और ‘वक्त ने किया’ (कागज के फूल)। यदि हिंदी सिनेमा के सर्वश्रेष्ठ गीत का चुनाव कभी करना पड़ ही जाए तो इस चुनाव-प्रक्रिया में ‘ये दुनिया अगर मिल भी जाए तो क्या है’ को रखना ही पड़ेगा।

शाश्वत प्रश्नों की खोज

मानव-जीवन की सार्थकता कहां है, किस तरह जीने में है, किन जीवन-मूल्यों में है, यह मनुष्य के इतिहास के शाश्वत सवाल रहे हैं। बेहतर दुनिया तभी बन सकती है यदि इन सवालों पर सही और व्यापक समझ बने। इन सवालों का एक सतही पक्ष यह है कि सभी मनुष्य अपने-अपने ढंग से उपलब्धि भरा जीवन चाहते हैं, बुलंदी चाहते हैं, पर इनमें से बहुत से लोगों की उपलब्धियों की तलाश महज उनकी निजी और स्वार्थी तलाश ही रह जाती है। पर इन सभी व्यक्तियों की स्वार्थी, संकीर्ण उपलब्धि की भागदौड़ से उन्हें पैसा शोहरत आदि जितना भी मिले, इससे बेहतर दुनिया बनने की कोई राह नहीं बनती है अपितु यह संकीर्ण उपलब्धियों की होड़ प्रायः दूसरों के हक छीनकर या दूसरों के दुख बढ़ाकर ही जीती जाती है।

अतः यह बहुत जरूरी है कि न्याय और समता, खुशियों और समृद्धि को सबसे बांटने, सबको उचित अवसर देने, दूसरों के हक को कभी न छीनने, अपने साथ दूसरों को सही अर्थ में खुशी देने, गहरे संतोष और न्याय-आधारित अमन-शान्ति के जो शाश्वत मानवीय मूल्य हैं उन्हें प्रतिष्ठित किया जाए और इसके लिए यह भी उतना ही जरूरी है कि अन्याय, स्वार्थ, दूसरों के हक और अवसर छीनने, लूट-शोषण, विलासिता-विषमता पर आधारित जो व्यवस्था है उससे लड़ा जाए, इसके खोखलेपन और क्रूरता को लोगों के सामने बेपर्दा किया जाए। तभी जनसाधारण सही और गलत, न्याय -अन्याय, में भेद स्पष्ट कर एक बेहतर दुनिया की ओर बढ़ सकेंगे और अपने जीवन को भी इस बदलाव के अनुकूल बना सकेंगे। इस प्रयास का एक जरूरी हिस्सा है कि अन्याय, झूठ, पाखंड, शोषण पर आधारित झूठी उपलब्धियों को बेनकाब किया जाए और एक ऐसा सामाजिक माहौल बनाया जाए जिससे इन मिथ्या उपलब्धियों की चमक-दमक से लोग बच सकें, इससे ऊपर उठ सकें और इस झूठ और अन्याय पर आधारित चमक-दमक से अलग सच्चाई, न्याय, खुशियों को बांटने, सादगी, स्वार्थों से ऊपर उठ सुख-दुख बांटने, निस्वार्थ गहरे संबंधों, रिश्तों की जो दुनिया है उसे अपना सकें।

झूठी उपलब्धियों को नकारने, बेनकाब करने, उनका खोखलापन सिद्ध करने का कार्य प्यासा फिल्म बहुत खूबी से करती है। इसके स्थान पर जो सही आदर्शों पर खड़ी दुनिया है, वह अभी बननी है, उसके लिए गहरे प्यार वाले, संकीर्ण स्वार्थों से दूर रहने वाले हमसफर चाहिए। ऐसे हमसफर के साथ तलाशेंगे नई दुनिया, चाहे कितनी भी कठिनाई आए, पर झूठे आडम्बर, अन्याय और शोषण पर आधारित दुनिया और उसकी उपलब्धियां हमें नहीं चाहिए।

इस मूल संदेश को लेकर ही तमाम कठिनाईयों के बीच संघर्ष करने वाले शायर विजय की कहानी ‘प्यासा’ में कई क्रूर विडंबनाओं के बीच आगे बढ़ती है। कदम-दर-कदम कई तरह के आडंबर, झूठ, अन्याय पर्दाफाश होते जाते हैं और उन पर आधारित उपलब्धियों के खोखलेपन को दर्शक गहराई से अनुभव करते हैं। यह जो खोखली, अन्यायपूर्ण उपलब्धियां है, उनके कारण ही विजय जैसी अनेक सुविधाओं का रास्ता रुका हुआ है, अनेक जरूरतमंदों के अवसर अवरुद्ध हो रहे हैं।

खैर, सब दिन एक से नहीं होते, सदा अन्याय की ही जीत नहीं होती है। एक दिन ऐसा भी आता है कि अनेक विडंबनाओं के बीच विजय की प्रतिभा को दूर-दूर सराहा जाने लगता है, उसकी ख्याति सर चढ़कर बोलने लगती है। अब विजय इतनी मजबूत स्थिति में है कि जिन शिखर पर बैठे व्यक्तियों ने उसका शोषण किया, उससे अन्याय किया, उनका भी वह पर्दाफाश कर सकता है। प्रायः इस स्थिति में आकर सामान्य हिंदी फिल्मों का नायक भरपूर बदला लेकर अपने को धन्य समझता है।

यदि विजय भी यही करता तो भी जिस तरह यह फिल्म अभी तक चली है उसके आधार पर इसे श्रेष्ठ फिल्म ही माना जाता। पर इस नाजुक मोड़ पर आकर ‘प्यासा’ और विजय जो नई राह तलाशते हैं, वह प्यासा को हिंदी की महानतम फिल्मों की श्रेणी में ले जाती है।

जो फिल्मकार सतही मनोरंजन से हटकर सिनेमा उद्योग के प्रतिकूल माहौल में गहरी मानवीय संवेदनाओं के संप्रेषण और बेहतर दुनिया बनाने की प्रतिबद्धता का रास्ता चुनते हैं वे भी प्रायः कुछ मिथकों से ऊपर नहीं उठ सकते हैं। सभी मिथक बुरे नहीं होते हैं। विशेष परिस्थितियों में कुछ मिथकों को मजबूत करने की कुछ अल्प-कालीन सार्थक भूमिका भी हो सकती है।

अतः विजय अनेक विडंबनाओं के बीच अचानक उत्पन्न हुई अपनी मजबूत स्थिति का उपयोग बदला लेने के लिए करता और फिर नई ख्याति से प्राप्त सुख में अपनी जिंदगी की सार्थकता तलाश लेता और फिल्म का ऐसा अंत हो जाता तो मौजूदा मिथकों का तुष्टीकरण करते हुए भी अनेक सामाजिक पाखंडों और अन्यायों को पर्दाफाश करने की वजह से यह एक अच्छी फिल्म मानी जा सकती थी।

पर किसी से व्यक्तिगत स्तर पर प्रतिशोध की इच्छा तो क्या रखना, विजय किसी की शिकायत भी नहीं करता है। हर कदम पर उसका शोषण हुआ है। पर तरह-तरह के अन्याय, मार-पीट झेलते हुए भी बहुत गहराई की संवेदनाओं से, स्वर ऊंचा किए बिना वह कहता है - मुझे किसी भी व्यक्ति से कोई शिकायत नहीं है। मुझे विरोध है तो उस सामाजिक व्यवस्था से है जिसमें इतना स्वार्थ, इतना अन्याय, इतनी विषमता, इतनी बेहयाई पनपते हैं, फलते-फूलते हैं, हावी होते हैं।

विजय के लिए किसी व्यक्ति से बदला लेने का कोई अर्थ नहीं है। इस अन्याय व बेशर्मी भरी व्यवस्था के शिखर पर जा बैठने की उसकी चाह भी नहीं है। उसे तो ऐसे विकल्प की तलाश है, ऐसी जगह, माहौल या व्यवस्था खोजने की तलाश है जहां से फिर कहीं जाना न पड़े। अपनी पूरी ईमानदारी को तमाम क्रूरताओं के बीच भी वह बचा रखता है और इस ईमानदारी से अपनी तलाश को जारी रखना ही विजय के लिए सबसे बड़ी सार्थकता है। इस सार्थक तलाश को निभाने वाली निस्वार्थ सच्ची हमसफर उसके साथ है तो फिर क्या कहने। तमाम दुखों के बीच यही तो सबसे बड़ी और सच्ची उपलब्धि है।

जहां प्यासा अपनी व्यापक सोच में बहुत समग्र फिल्म है, इसमें कोई त्रुटि वही निकाल पाएगा जिसका काम केवल त्रुटि निकालना है, वहां कागज के फूल की उपलब्धि इतनी समग्र नहीं है। इसमें गुरुदत्त और मूर्ति की महान कलात्मक उपलब्धियां हैं, पर इसे त्रुटिहीन फिल्म नहीं कह सकते हैं। मिथक तोड़ने पर भी प्यासा अधिक दर्शकों द्वारा सराही गई, जबकि कागज के फूल को अपेक्षाकृत कहीं कम दर्शक मिले।

विजय ने ‘प्यासा’ के अंत में जिस शिखर को ठुकरा दिया, पर ‘कागज के फूल’ के सुरेश सिन्हा को वह शिखर अपने जीवन के अपेक्षाकृत आरंभिक दौर में ही मिल गया था। पर इस शिखर पर पहुंचकर और उसे अपना कर भी मौजूदा अवसरवादी, मूलतः स्वार्थी व्यवस्था में संवेदनशील है व्यक्ति के लिए अनेक कठिनाईयां और विडंबनाएं हैं। एक तो यह है कि उपलब्धि से विफलता, ख्याति से तिरस्कार के दौर में जाने में देर नहीं लगती है और तब संकीर्ण स्वार्थ में क्रूर हो गई दुनिया संभलने का मौका भी नहीं देती है। दूसरी बड़ी विसंगति यह है कि शिखर पर रहते हुए, स्वार्थी दुनिया की बाहरी चमक-दमक का उपयोग करते हुए भी संवेदनशील व्यक्ति के लिए इस विषमता और स्वार्थ आधारित व्यवस्था के संबंधों को निभा पाना बहुत कठिन हो सकता है। अतः चमक-दमक के बीच भी संतोष नहीं है, तृप्ति नहीं है, फूल हैं तो बस कागज के। यदि अतृप्ति केवल भौतिक हो तो उसे दूर करना कोई बड़ी समस्या नहीं थी, पर यह अतृप्ति तो आत्मिक है, बहुत गहरी है।

प्यासा के विजय के लिए तमाम ठोकरों के बावजूद यह संभव बना रहा कि वह अपनी सार्थकता की अपनी तलाश को ईमानदारी से जारी रख सके और इस अन्वेषण के अनुकूल हमसफर भी पा सके। पर शिखर को छू लेने वाले सुरेश सिन्हा के लिए यह भी संभव नहीं है, और शिखर के जीवन की विसंगतियां उन्हें हमसफर मिलने पर भी उससे दूर कर देती हैं। इस स्थिति में शिखर पर रहते हुए भी संवेदनशील सुरेश की स्थिति निरंतर ठोकर खाने वाले विजय से भी अधिक त्रासद है और उसका अंत भी अति त्रासद है।

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