पुण्यतिथि विशेषः भोजपुरी के शेक्सपियर भिखारी ठाकुर, विरह वेदना की गाथा 'बिदेसिया' 109 साल बाद भी अमर

आज जब पति या पत्नी द्वारा द्वारा एक-दूसरे की हत्या जैसे मामले सामने आ रहे हैं, तब भोजपुरी के शेक्सपियर भिखारी ठाकुर का नाटक बिदेसिया एक बार फिर याद आता है। ‘का से कहूं मैं दरददिया हो रामा, पिया परदेस गए’ यह पंक्ति आज भी पति-पत्नी के प्रेम को दिखाता है।

पुण्यतिथि विशेषः भोजपुरी के शेक्सपियर भिखारी ठाकुर, विरह वेदना की गाथा 'बिदेसिया' 109 साल बाद भी अमर
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आज की आधुनिक जिंदगी में रिश्ते बेहद नाजुक हो गए हैं। आए दिन शादियां टूट रही हैं, छोटी-छोटी बातों पर झगड़े हो रहे हैं और कुछ मामलों में पति या पत्नी द्वारा द्वारा एक-दूसरे की हत्या जैसे जघन्य अपराध भी सामने आ रहे हैं। इसी समय में भोजपुरी के शेक्सपियर कहे जाने वाले भिखारी ठाकुर का नाटक बिदेसिया एक बार फिर याद आता है। ‘का से कहूं मैं दरददिया हो रामा, पिया परदेस गए’ यह पंक्ति आज भी पति-पत्नी के प्रेम को दिखाता है।

भिखारी ठाकुर का जन्म 18 दिसंबर 1887 बिहार के सारण (छपरा) जिले के एक गांव में एक नाई परिवार में हुआ था। वे भोजपुरी के महान लोक कलाकार, कवि, गीतकार, नाटककार, अभिनेता, नर्तक और समाज सुधारक थे। उन्होंने शुरुआत में नााई का भी काम किया लेकिन, उन्हें इसमें रूचि नहीं थी। वह कुछ अलग करना चाहते थे लेकिन सामने कोई रास्ता नहीं दिखाई देता था।

इसी दौरान उन्हें रंगमंच (नाटक) में रूचि हुई। शुरूआत रामलीला के मंचन से हुई। हालांकि, परिवार के लोग नाटक मंचन से खुश नहीं थे। लेकिन भिखारी ठाकुर ने तय कर लिया कि वे आगे इसी क्षेत्र में काम करेंगे। उन्होंने भोजपुरी लोकनाट्य (नाच) को नई ऊंचाई दी। उनकी नाटक मंडली ने बिहार, पूर्वांचल, बंगाल और असम तक प्रदर्शन किए। उन्होंने जितनी भी रचनाएं की, उनमें महिलाओं को हमेशा केंद्र बिंदु रखा। बिदेसिया, बेटी-बेचवा, गबरघिचोर, भाई-विरोध, विधवा-विलाप, गंगा-स्नान आदि उनकी प्रमुख रचनाएं और नाटक थे।


उन्होंने भोजपुरी भाषा और संस्कृति को लोकप्रिय बनाया। उन्हें भोजपुरी का शेक्सपियर कहा जाता है क्योंकि उन्होंने भोजपुरी में नाटकों, गीतों और कविताओं के माध्यम से मानवीय भावनाओं (प्रेम, विरह, दुख, सामाजिक कुरीतियां) को गहराई से चित्रित किया, ठीक वैसे जैसे शेक्सपियर ने अंग्रेजी में किया।

भिखारी ठाकुर ने 109 साल पहले पति-पत्नी के बिछोह की पीड़ा को इतनी गहराई से दिखाया था कि आज के इस टूटते रिश्तों के दौर में भी यह नाटक अपनी प्रासंगिकता नहीं खोता। बिदेसिया याद दिलाता है कि जीवनसाथी कितना अनमोल होता है और परदेस या किसी भी परिस्थिति में अलगाव कितना दर्दनाक हो सकता है। यह नाटक सिर्फ विरह की कहानी नहीं बल्कि वैवाहिक जीवन में समझ, सहनशीलता और प्रेम की अहमियत सिखाता है।

वक्त के साथ सब कुछ पीछे छूट जाता है लेकिन कभी-कभी कुछ रचनाएं और नाटक ऐसे होते हैं जो दशकों तक लोगों के दिलों में अमर रह जाते हैं। आज भी जब बिदेसिया रंगमंच पर प्रस्तुत होता है तो पत्नी का वह करुण वियोग दर्शकों को सीट पर जकड़ लेता है। आंखों से आंसू बहने लगते हैं। खासकर आज के दौर में जब बेरोजगारी के कारण यूपी-बिहार और पूर्वांचल से युवा परदेस जाते हैं, तब नई-नवेली दुल्हनों को पति के इंतजार में तड़पना पड़ता है ठीक वैसी ही पीड़ा जो भिखारी ठाकुर ने 109 साल पहले चित्रित की थी।

भिखारी ठाकुर ने महिलाओं की इस अंतहीन पीड़ा को नाटक के माध्यम से बड़े ही मार्मिक ढंग से सामने लाया। शायद उन्होंने अपने बचपन या जवानी में बिहार के गांवों में ऐसी अनेक महिलाओं को देखा था, जिनके पति पेट की आग बुझाने परदेस चले जाते थे और पीछे सिर्फ आंसू, सूना घर और लंबा इंतजार छोड़ जाते थे।


भिखारी ठाकुर की तारीफ करते हुए राहुल सांकृत्यायन जैसे विद्वानों ने उनकी सराहना की और उन्हें अनगढ़ हीरा कहा। भिखारी ठाकुर ने लौंडा नाच को भी प्रचलित किया। आज भी बिहार में लौंचा नाच कराने की परंपरा जारी है। हाल ही में पूर्व सीएम लालू प्रसाद यादव के जन्मदिन के मौके पर दर्शकों के सामने लौंडा नाच का मंचन किया गया था।

भिखारी ठाकुर को यूं तो कई पुरस्कार, सम्मान से नवाजा जा चुका है लेकिन, हाल ही में उन्हें भारत रत्न दिलाने की मांग तेज हो गई है। कलाकारों का मानना है कि भिखारी ठाकुर ने जो भोजपुरी कला क्षेत्र के लिए किया, जो योगदान दिया, उसे कभी भूलाया नहीं जा सकता है। महिलाओं की पीड़ा को अपनी रचनाओं और नाटकों के माध्यम से दुनिया के सामने लाने वाले भिखारी ठाकुर का निधन 10 जुलाई 1971 को हुआ। बिहार के छपरा में आज भी भिखारी ठाकुर की ओर से शुरू किए गए लौंडा नाच की परंपरा जारी है।

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