पुण्यतिथि विशेष: हंसाया भी, झकझोरा भी और सत्ता को ललकारा भी… उत्पल दत्त सिर्फ कलाकार नहीं, एक आंदोलन थे

उत्पल दत्त को अपने विचारों और राजनीतिक नाटकों के कारण विरोध और मुश्किलों का सामना भी करना पड़ा, जिस वजह से उन्हें 1965 में कई महीनों तक जेल में रहना पड़ा था। लेकिन उन्होंने अपने विचारों से समझौता करने के बजाय अपने रंगमंच को और ज्यादा धार दी।

पुण्यतिथि विशेष: हंसाया भी, झकझोरा भी और सत्ता को ललकारा भी… उत्पल दत्त सिर्फ कलाकार नहीं, एक आंदोलन थे
i

भारतीय रंगमंच और सिनेमा की दुनिया में कुछ कलाकार ऐसे होते हैं, जिन्हें सिर्फ अभिनेता कह देना उनके पूरे व्यक्तित्व को समेट नहीं सकता। उत्पल दत्त भी ऐसे ही कलाकार थे। उन्होंने मंच पर लोगों को हंसाया, फिल्मों में अपने अभिनय से यादगार किरदार निभाए और साथ ही अपने नाटकों के जरिए समाज और राजनीति पर तीखे सवाल भी उठाए। उनकी कला सिर्फ मनोरंजन का जरिया नहीं थी बल्कि लोगों को सोचने और सवाल करने के लिए मजबूर करने का माध्यम भी थी।

उत्पल दत्त का जन्म 29 मार्च 1929 को तत्कालीन बंगाल प्रेसीडेंसी के बरिसाल में हुआ था। बचपन से ही उन्हें साहित्य, रंगमंच और अभिनय में गहरी दिलचस्पी थी। धीरे-धीरे यही रुचि उनके जीवन का सबसे बड़ा हिस्सा बन गई। उन्होंने अंग्रेजी रंगमंच से अपने अभिनय सफर की शुरुआत की और आगे चलकर बंगाली रंगमंच के बड़े नामों में शामिल हो गए।

कॉलेज के दिनों से हुआ थिएटर से जुड़ाव

उन्होंने कोलकाता के सेंट जेवियर कॉलेज से अंग्रेजी साहित्य में स्नातक किया। कॉलेज के दिनों से ही उनका जुड़ाव अंग्रेजी और बंगाली थिएटर से हो गया था, जिस वजह से वह कॉलेज खत्म करने के बाद रंगमंच में शामिल हो गए और खुद की थिएटर मंडली शुरू की। यह मंडली ज्यादातर पश्चिम बंगाल में प्रोफेशनल शो करने लगी और 1949 में इसका नाम 'लिटिल थिएटर ग्रुप' रख दिया गया।

शुरुआत में यह ग्रुप अंग्रेजी में नाटक करता था, खासकर पढ़े-लिखे शहरी लोगों के लिए। बाद में ज्यादा से ज्यादा आम लोगों और मेहनतकश वर्ग तक पहुंचने के लिए ग्रुप ने सिर्फ बंगाली में नाटक करना शुरू कर दिया। दत्त इस ग्रुप में नाटकों का निर्देशन भी करते थे और खुद भी एक्टिंग करते थे। उन्होंने शेक्सपियर, जॉर्ज बर्नार्ड शॉ, मैक्सिम गोर्की और हेनरिक इब्सन जैसे बड़े लेखकों के नाटकों के साथ-साथ रवींद्रनाथ टैगोर और माइकल मधुसूदन दत्त जैसे बंगाली लेखकों के नाटकों को भी मंच पर पेश किया।


नाटकों से राजनीति और समाज पर उठाया सवाल

उत्पल दत्त की खासियत यह थी कि वह अभिनय को केवल डायलॉग बोलने या किरदार निभाने तक सीमित नहीं मानते थे। उनके लिए रंगमंच समाज से बातचीत करने का एक मजबूत माध्यम था। उन्होंने कई ऐसे नाटक किए जिनमें राजनीति, सामाजिक असमानता, शोषण और सत्ता के रवैये पर सवाल उठाए गए।

उनके नाटकों में मनोरंजन जरूर था, लेकिन उसके पीछे एक गंभीर संदेश भी छिपा होता था। यही वजह थी कि उत्पल दत्त को सिर्फ एक अभिनेता नहीं, बल्कि एक रंगकर्मी और विचारशील कलाकार के रूप में भी पहचाना गया। वह अपने विचारों को खुलकर रखने के लिए जाने जाते थे। उनका मानना था कि कलाकार का काम केवल दर्शकों का मनोरंजन करना नहीं, बल्कि उन्हें अपने आसपास की दुनिया के बारे में सोचने के लिए प्रेरित करना भी है।

फिल्मों में भी अपनी अलग पहचान बनाई

रंगमंच के साथ-साथ फिल्मों में भी उत्पल दत्त ने अपनी अलग पहचान बनाई। खासकर हिंदी फिल्मों में उन्होंने ऐसे-ऐसे किरदार निभाए, जिन्हें दर्शक आज भी याद करते हैं तो या तो सोचने पर मजबूर हो जाते हैं या फिर हंस-हंस कर लोटपोट हो जाते हैं। उनकी आवाज, चेहरे के हाव-भाव और संवाद बोलने का अंदाज उन्हें बाकी कलाकारों से अलग बनाता था।

उनकी कॉमेडी की बात करें तो उत्पल दत्त ने पर्दे पर ऐसा हास्य पेश किया, जिसमें सिर्फ हंसी नहीं थी बल्कि किरदार की अपनी एक अलग दुनिया होती थी। कभी वह सख्त पिता बने, कभी परेशान अधिकारी, कभी चालाक व्यक्ति तो कभी ऐसा किरदार जिसकी हरकतें दर्शकों को हंसने पर मजबूर कर देती थीं। उनका अभिनय इतना सहज लगता था कि कई बार दर्शक भूल जाते थे कि वे एक कलाकार को देख रहे हैं।

इसे भी पढ़ेंः यादों में शम्मी कपूरः पिता के थिएटर में 50 रुपए थी तन्ख्वाह, फिर ऐसे बने बॉलीवुड के 'याहू स्टार'


'गोलमाल' में भवानी शंकर का किरदार आज भी लोकप्रिय

ऋषिकेश मुखर्जी की फिल्मों में उत्पल दत्त के कई किरदार खास तौर पर याद किए जाते हैं। 'गोलमाल' में भवानी शंकर का उनका किरदार आज भी हिंदी सिनेमा की सबसे लोकप्रिय कॉमेडी भूमिकाओं में गिना जाता है। बड़ी-बड़ी मूंछें, सख्त अंदाज, संस्कारों को लेकर उनके अजीबोगरीब नियम और सामने वाले पर लगातार रौब जमाने का तरीका- इस किरदार ने उन्हें घर-घर में लोकप्रिय बना दिया।

उनका रंगमंच राजनीतिक चेतना से काफी प्रभावित था। उन्होंने सत्ता, व्यवस्था और सामाजिक अन्याय को लेकर अपनी बात नाटकों के जरिए कही। उनके नाटक कई बार सीधे राजनीतिक सवालों से टकराते थे। यही कारण था कि उनका रंगकर्म सिर्फ कला की दुनिया तक सीमित नहीं रहा बल्कि सामाजिक और राजनीतिक बहस का हिस्सा भी बना।

इसे भी पढ़ेंः जन्मदिन विशेष: जिस फिल्म ने श्रीदेवी को बनाया स्टार, उसी को मानती थीं बदकिस्मत, फिर बनीं पहली महिला सुपरस्टार

नाटकों के कारण कई महीनों तक जेल में भी रहना पड़ा

उत्पल दत्त का सफर आसान नहीं था। अपने विचारों और राजनीतिक नाटकों के कारण उन्हें विरोध और मुश्किलों का सामना भी करना पड़ा, जिस वजह से उन्हें 1965 में कई महीनों तक जेल में रहना पड़ा था। लेकिन उन्होंने अपने विचारों से समझौता करने के बजाय अपने रंगमंच को और ज्यादा धार दी। उनके लिए मंच सिर्फ रोशनी, पर्दे और संवादों की जगह नहीं था बल्कि वह समाज का आईना था।

उनकी अभिनय प्रतिभा को राष्ट्रीय स्तर पर भी सम्मान मिला। थिएटर में आजीवन योगदान के लिए 1990 में अकादमी फैलोशिप से सम्मानित किए गए। उत्पल दत्त ने फिल्म 'भुवन शोम' (1969) में बेहतरीन अभिनय के लिए सर्वश्रेष्ठ अभिनेता का राष्ट्रीय पुरस्कार जीता था। हालांकि, उन्हें ऋषिकेश मुखर्जी की फिल्म गोलमाल (1979) में 'भवानी शंकर' के सख्त और मजाकिया किरदार के लिए सबसे ज्यादा याद किया जाता है। उन्हें ‘गोलमाल’ के लिए सर्वश्रेष्ठ हास्य अभिनेता का फिल्मफेयर पुरस्कार मिला और बाद में उन्हें पद्मश्री से भी सम्मानित किया गया।

हालांकि पुरस्कारों से कहीं ज्यादा बड़ी उनकी पहचान दर्शकों के बीच बनी रही। 9 अगस्त 1993 को उत्पल दत्त का निधन हो गया लेकिन उनके अभिनय और रंगमंच की विरासत आज भी जिंदा है। उनकी फिल्मों के किरदार आज भी लोगों को हंसाते हैं और उनके नाटक आज भी रंगमंच की दुनिया में चर्चा का विषय हैं।

इसे भी पढ़ेंः यादों में केष्टो मुखर्जीः हिंदी सिनेमा का मासूम शराबी, ऑडिशन में कुत्ते की आवाज ने बदल दी किस्मत

प्रिय पाठकों हमारे टेलीग्राम (Telegram) चैनल @navjivanindia से जुड़िए और पल-पल की ताज़ा खबरें पाइए