शख्सियत

पुण्यतिथि विशेषः बापू क्या तुम अब केवल एक छवि हो?

बापू का गुस्सा अजीबोगरीब था। उसमें आग थी, पर ऐसी आग जो कि क्रोध के पात्र को भस्म या अपमानित नहीं, परिवर्तित करती थी ।आज तो बस आग ही आग है... पर यह बापू की आग नहीं। रवींद्रनाथ ने एक कविता में पूछा है, ‘तुमि की के बोली छोबी?’ जिसका अर्थ है- बापू, क्या तुम अब केवल एक छवि हो?

फोटोः सोशल मीडिया

गोपाल कृष्ण गांधी

कोई यह न समझे कि गांधी को गुस्सा नहीं आता था। आता ही नहीं था, बार-बार आता था और जोर का गुस्सा होता था वह। हां, गुस्से में उनके मुंह से ऐसा कोई शब्द नहीं निकलता था, जो कि अशिष्ट हो। पर जो भी तब वह कहते थे- सभ्य वाक्यों में- सुननेवाले को झुलसा देता। और यह बात सिर्फ शब्दों की नहीं। उनकी आंखें भी बहुत कुछ ‘कह’ देती थीं, झुलसा देती थीं। पर कैसी झुलसन?

30 जनवरी, 1948। संध्याकाल। प्रार्थनासभा के लिए 5 बजे पहुंचना था उन्हें। सरदार वल्लभभाई पटेल के साथ वार्ता कुछ लंबी चल गई थी। जब उठे निकलने- कमरे से दूरी कुछ सौ गज की थी- तो देखा देर हो गई है। ‘क्यों नहीं मुझे समय की याद दिलाई?’ कुछ रफ्तार से निकले। पहुंचते-पहुंचते चबूतरे के पास फिर बोले मनु, आभा से (गुजराती में), ‘मने मोडुं थतुं जराए नथी गमतुं’, (मुझे देर से पहुंचना बिलकुल अच्छा नहीं लगता)। दिमाग में, कथन में गुस्सा था, अपने पर ही। फिर, इतिहास साक्षी है।

मनु के हाथ में प्रार्थना के लिए जपमाला थी, आश्रम नोटबुक। ठीक सामने ‘वह’ आया, खड़ा हुआ, ‘भाई देर हो रही है बापू को’..इतना कहना ही था मनु का, कि उसने अपनी कोहनी से मनु के फैले हाथ को झटका मारा। माला और नोटबुक नीचे गिरीं। निस्सन्देह गांधी ने यह सब देखा, सुना होगा। उनकी आंखें जमीन पर पड़ी होंगी, देखा होगा उन्होंने नोटबुक और माला को धराशायी बने हुए। निस्संदेह उनको क्रोध की एक कील ने चुभोया होगा, क्या कर रहे हो?...इस बच्ची को धक्का मारा है तुमने.. कहां है तुम्हारी तमीज.. और प्रार्थना की यह पुस्तिका और जप की... पुण्य दानों की, जिन पर दुआएं पढ़ी जाती हैं,.. उस माला को धरती पर?...

यह या ऐसे ही कुछ खयाल गांधी के उत्तेजित दिमाग में घूम गए होंगे, उस क्षण। उस क्षणिक पल, अर्ध पल में.. फिर सीधे उनके सीने पर.. एक, दो, तीन.. और ‘हे राम!’ शून्य...शांतिमय शून्य। शून्यमय शांति। अर्ध पल में, उस काफूरी क्षण में क्रोध, आघात, क्षमा, आत्मत्याग सब आपस में घुल गए, असीम से कालातीत से जुड़ गए।

गांधी को मृत्यु का कभी डर न था। यानी अपनी मृत्यु का। औरों की मृत्यु से वे दर्द महसूस करते थे जैसे कि कोई भी- हम सब भी करते हैं। और जिन-जिन को सांत्वना देनी होती, उनको देते। सांत्वना ही नहीं, समर्थन और आत्मबल। फिर स्थितप्रज्ञ जो थे, मृत्यु के यथार्थ को स्वीकार करते हुए अपनी अनथक गतिविधियों में तल्लीन हो जाते।

अतएव उस संध्या, उनकी अंतिम संध्या, उन्होंने निश्चय ही अपने कातिल को अपने तरीके से माफ किया, निःशब्द क्षमा प्रदान की। ‘मेरा कर्मकांड समाप्त हुआ,’ गुजराती में कदाचित् इतना भी सोचा होगा, ‘हवे हरि इच्छा’, अब हरि की इच्छा। यह विचार उनके ‘हे राम!’ में सम्मिलित रहे होंगे, इसमें संदेह नहीं।

लेकिन, अंतिम क्षण के पूर्व जो क्षणिक घटना घटी, जिससे गांधी को निरूसंदेह गुस्सा आया था, एक बुजुर्ग का गुस्सा, अपने घर की बच्ची के साथ किसी के द्वारा की गई बदसलूकी पर, उस घटनाचक्र को उन्होंने माफ नहीं किया। प्रार्थना के असबाब को, दुआ के साधनों को जमीन पर गिराने को उन्होंने माफ नहीं किया। उस हिंसात्मक कार्रवाई को उन्होंने माफ नहीं किया ।

अगर बाद में जो हुआ वह नहीं हुआ होता, अगर गांधी प्रार्थना सभा में पहुंच जाते, प्रवचन दे पाते, तो मुझे यकीन है, वे इस घटना को अपने प्रवचन का विषय बनाते और कहते कुछ इस तरह के शब्द- ‘मैं प्रार्थना सभा में देर से आया। गलती मेरी है। समय से रहना, समय से आना मात्र नियम की बात नहीं, वह औरों के लिए सम्मान की बात है। आपके, सबके समय के आदर की बात है। आपका आदर मैं करता, तो मनु के साथ यह अनादर न होता। ईश्वर की प्रार्थना की माला का अनादर न होता। मैं खुद को गुनहगार समझता हूं। लेकिन उस युवक से पूछता हूं, क्या एक निहत्थी लड़की को इस तरह झटके से गिराने की कोशिश करना.. यह क्या तमीज है? यह कहां का नियम है? यह कैसी रीत है? अगर जपमाला और भजनों की किताब के लिए आदर नहीं होगा तो ईश्वर के प्रति कैसी भावना होगी ? ईश्वर के ही बनाए हुए हम यह क्या कर रहे हैं? मनु को तो झटका लगा। बस। लेकिन कितनी ही लड़कियों का अपहरण हुआ है। वे न हिंदू लड़कियां हैं, न मुस्लिम, न सिख। वे लड़कियां हैं। बच्चियां...हम सबकी बच्चियां। हमारी बहनें। मेरा खून उबल रहा है। मुझे कुछ सूझता नहीं। क्या करूं? उपवास करूं?..कर सकता हूं। आज इस घटना के गहरे अर्थ पर पहले सोचूंगा। क्या हम, हमारा समाज, इतना बुरा है?...इतना भयंकर?...मेरी मां हर रोज मंदिर जाती थी। हम वैष्णव घर के हैं। जपमाला लेती हुई, युवती थी वह... मां थी, पर उम्र में युवती। मैं भी उसके साथ उछलता-कूदता जाते रहता था। ..हवेली कहते थे हम उस जगह को जहां पूजा होती थी। प्रणामियों का मंदिर भी था। अगर, अगर मैं कहता हूं...कोई युवक मेरी मां को धकेलता और उसकी माला गिरती, तो मैं कहता हूं, मैं तो बच्चा था...मैं उस पुरानी तस्वीर को अपनी आंखों से देख रहा हूं। मैं वैसा कर रहे आदमी के ऊपर अपने छोटे हाथों से... तो मेरी मां जरूर मुझे ‘मोनियो (लाड़ का घरेलू नाम) रेवा दे...’ यानी मोनिये रहने दे। मां मुझे मोनिया कह कर बुलाती थी। ‘मोनियो ऐने भान नथी’ यानी उसको भान नहीं है।

आज युवक से, जिसने यह किया है उससे, मैं पूछता हूं, तुझे भान है? तुझे मालूम है कि तू क्या कर रहा है? तू हमारी मर्यादाओं को झटका दे रहा है। हमारे उसूलों को, हमारी माकूलियत को, माकूलियत यानी शिष्टता। मैंने मौलाना शिब्ली की किताबों से कुछ-कुछ उर्दू सीखने की कोशिश की है। सलीका, शाइस्तगी।

बिहार में था। वहां के दंगे। एक जगह मुझे बताया गया, एक सौ साल से ऊपर की एक औरत का खून हुआ था। मैंने लोगों से पूछा... बताओ किसने यह भयानक काम किया है, किसने?... सब खामोश... सब चुप। फिर पूछा मैंने, बोलो, कौन जिम्मेदार है इस खून के लिए? कोई भी आगे नहीं आया। मैंने फिर कहा, मैं इस औरत की हड्डियों से पूछूंगा बोल वालिदा (मां)... तुझे किसने मारा?... नोआखाली में भी यही। कितने घिनौने कांड। वहां बूढ़े, बच्चे, महिलाएं, कत्ल.. अपहरण...। हम क्या हो गए हैं ? हम आदमी हैं या जानवर? ‘जानवर’, मैंने कहा। पर गलत कहा। जानवर ऐसा नहीं करते हैं। हां, भूख के लिए जंगलों में जानवर, जानवर का शिकार करता है, पर ऐसे तो नहीं।

नोआखाली में एक गांव में गया। एक घर में हरेक का खून हो गया था। एक भी सदस्य नहीं बचा था। मैं बाहर आया तो एक कुत्ता भागता चला आया। वह मुझे कुछ कहना चाहता था। उसकी आंखों में कुछ बात थी। दुम हिला रहा था। मैंने साथियों से पूछा, ‘आ कईंक कहेवा मांगे छे?’ यह कुछ कहना चाहता है...‘ऐना साथे जईने जोइये’, उसके साथ जा कर देखें। गए हम उस कुत्ते के पीछे। वह ले गया सीधे एक कोने में। हड्डियों का एक ढांचा पड़ा था। उसके स्वामी या स्वामिनी की हड्डियां.. ’इन्हें आप देखना चूक गए,’ वह कह रहा था मुझको, ‘यह भी’। उस कुत्ते की आंखों में गुस्सा भी था, करुणा भी, भान भी...भान, चलिए बहुत बोल चुका हूं ।

मनु, तू माफ कर दे उस युवक को। उसको मुझ पर नाराजगी थी। तू मात्र रास्ते में आ गई उसके। उसकी नाराजगी के बारे में मुझे सोचना है। पुलिस से मेरी अपील है उसे गिरफ्तार न करे। वल्लभभाई को कहूंगा। वल्लभभाई को उस पर बहुत गुस्सा आएगा, इसलिए नहीं, कि वे गृहमंत्री हैं, इसलिए कि वे मुझे प्यार करते हैं। उनकी आत्मा मेरी आत्मा में मिली हुई है। आज नहीं, बरसों से। ‘बापू मारा हाथ केम बांधी रह्य छो?’- बापू मेरे हाथ क्यों बांधे रखते हो? वे फिर पूछेंगे। उनको भी कहूंगा, मैं इस युवक से बात करना चाहता हूं। हिंसा से हिंसा दूर नहीं हो सकती। और बढ़ती है। चलो, बहुत हुआ। मनु, आभा, शुरू करो रामधुन। आज जो पंक्ति थी शुरू करो, ईश्वर अल्लाह थी..’। तो कुछ ऐसा होता उनका, बापू का, वह 30 जनवरी का काल्पनिक प्रवचन।

उनके यह अनकहे शब्द क्या आज ‘प्रासंगिक’ हैं? यह पूछना अनावश्यक है। प्रासंगिक-अप्रासंगिक, यह उन चीजों के लिए कहा जा सकता है जो कि नीतियों से जुड़े होते हैं। बात नीतियों की नहीं है। बात अपने निज की है। बापू का गुस्सा अजीबोगरीब था। उसमें आग थी, पर ऐसी आग जो कि क्रोध के पात्र को भस्म या अपमानित नहीं, परिवर्तित करती थी ।

आज तो बस आग है। आग ही आग... पर यह बापू की आग नहीं। रवींद्रनाथ ने एक कविता में पूछा है, ‘तुमि की के बोली छोबी?’

बापू, क्या तुम अब केवल एक छवि हो?

(लेखक गांधी जी के पुत्र देवदास गांधी के पुत्र हैं और पश्चिम बंगाल के पूर्व राज्यपाल, भारतीय प्रशासनिक सेवा के पूर्व अधिकारी और पूर्व डिप्लोमेट रह चुके हैं।)

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