डॉ. राजेंद्र प्रसाद: स्वतंत्रता संग्राम से राष्ट्रपति भवन तक, शीर्ष पद के बावजूद सरलता और सादगी नहीं बदली

राजेंद्र प्रसाद कई बार कांग्रेस के अध्यक्ष चुने गए। उनकी संगठन क्षमता, शांत स्वभाव और निष्पक्ष दृष्टिकोण ने उन्हें राष्ट्रीय नेतृत्व के शीर्ष पर स्थापित किया। 26 नवंबर 1949 को भारतीय संविधान को अंतिम रूप देने में उन्होंने अध्यक्ष के रूप में कुशल संचालन किया।

डॉ. राजेंद्र प्रसाद: स्वतंत्रता संग्राम से राष्ट्रपति भवन तक, शीर्ष पद के बावजूद सरलता और सादगी नहीं बदली
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नवजीवन डेस्क

भारत की भूमि वीरपुत्रों, स्वतंत्रता सेनानियों और कई ऐसे राजनेताओं से सुसज्जित है जिन्होंने अपना पूरा जीवन केवल देश की सेवा के लिए न्यौछावर कर दिया है। इन्हीं में से एक देशरत्न और भारत के प्रथम राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद भी हैं। आज भारत के इस महान सपूत की पुण्यतिथि है। आइए इस मौके पर जानते हैं उनके जीवन के बारे में जो सरलता और सादगी की मिसाल है।

डॉ. राजेंद्र प्रसाद की सादगी का आलम यह था कि 12 वर्षों तक देश के सर्वोच्च पद (राष्ट्रपति) पर आसीन रहने के बाद भी उनका जीवन दर्शन एक सामान्य जन जैसा ही रहा। उन्होंने अपनी जीवनशैली में उस सरलता को जीवंत रखा, जिससे समाज का निर्धनतम व्यक्ति भी उनसे जुड़ाव महसूस कर सके। उनके निश्छल व्यक्तित्व में किसी के लिए भी दूरी नहीं थी।

उनकी नैतिकता और सादगी की अनूठी मिसाल तब देखने को मिली, जब पदमुक्त होने के बाद बिगड़ते स्वास्थ्य के बावजूद उन्होंने देश-विदेश में उपचार की किसी भी सरकारी सुविधा को स्वीकार करना उचित नहीं समझा। सुख-सुविधाओं का मोह त्यागकर वे पटना स्थित उसी जर्जर खपरैल मकान में लौट आए, जहां से उनका राजनीतिक सफर शुरू हुआ था। अपनी जड़ों के प्रति इसी निष्ठा को व्यक्त करते हुए उन्होंने कहा था, 'लौटकर वहीं जाऊंगा, जहां से चलकर आया हूं।"

डॉ. राजेंद्र प्रसाद उन विरले राष्ट्रपतियों में से थे, जिन्होंने पद के वैभव के स्थान पर जन-सेवा और मितव्ययिता को प्राथमिकता दी। उनके कार्यकाल के दौरान राष्ट्रपति का मासिक वेतन 10,000 रुपये निर्धारित था, किंतु उन्होंने स्वेच्छा से मात्र 5,000 रुपये स्वीकार किए। आदर्शों के प्रति उनकी प्रतिबद्धता ऐसी थी कि कार्यकाल के अंतिम वर्षों में वे अपने वेतन का केवल 25 प्रतिशत (2,500 रुपये) ही लेते थे।


वे अपने अधिकांश व्यक्तिगत कार्य स्वयं करना पसंद करते थे। उन्होंने विलासितापूर्ण सरकारी सुख-सुविधाओं का कभी उपभोग नहीं किया और सहयोग के लिए मात्र एक सहायक रखा। साथ ही, सार्वजनिक जीवन में शुचिता बनाए रखने के लिए वे किसी भी प्रकार के उपहार स्वीकार नहीं करते थे।

बिहार के सीवान जिले के जीरादेई गांव में जन्मे डॉ. राजेंद्र प्रसाद के पिता महादेव सहाय संस्कृत और फारसी के विद्वान थे। डॉ. राजेंद्र प्रसाद भी बचपन से ही मेधावी थे। मात्र पांच वर्ष की आयु में उन्होंने फारसी की शिक्षा प्रारंभ कर दी थी। प्रारंभिक शिक्षा छपरा जिला स्कूल से पूरी करने के बाद उन्होंने कलकत्ता (अब कोलकाता) के प्रतिष्ठित प्रेसीडेंसी कॉलेज में प्रवेश लिया।

वर्ष 1902 में इंटरमीडिएट परीक्षा प्रथम श्रेणी से उत्तीर्ण होने पर उन्हें रॉबर्ट फैलोशिप से सम्मानित किया गया। आगे चलकर उन्होंने अर्थशास्त्र में एमए और 1915 में विधि स्नातक (एलएलबी) में स्वर्ण पदक प्राप्त किया। इलाहाबाद विश्वविद्यालय से डॉक्टर ऑफ लॉ की उपाधि पाने वाले वे पहले व्यक्ति थे।

वकालत के क्षेत्र में अपार सफलता मिलने के बावजूद उनका मन राष्ट्रसेवा की ओर आकर्षित हुआ। महात्मा गांधी के विचारों से प्रभावित होकर उन्होंने स्वतंत्रता आंदोलन में सक्रिय भागीदारी निभाई। 1920 में असहयोग आंदोलन के दौरान उन्होंने अपनी सफल वकालत छोड़ दी और पूरी तरह देश की आजादी के लिए समर्पित हो गए। चंपारण सत्याग्रह, नमक सत्याग्रह, भारत छोड़ो आंदोलन और व्यक्तिगत सत्याग्रह जैसे आंदोलनों में उनकी भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण रही। जेल यात्राओं और कठिन परिस्थितियों के बावजूद वे कभी विचलित नहीं हुए।


डॉ. प्रसाद भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अध्यक्ष कई बार चुने गए। उनकी संगठन क्षमता, शांत स्वभाव और निष्पक्ष दृष्टिकोण ने उन्हें राष्ट्रीय नेतृत्व के शीर्ष पर स्थापित किया। संविधान निर्माण की प्रक्रिया में भी उनकी भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण रही। 26 नवंबर 1949 को संविधान को अंतिम रूप देने में उन्होंने अध्यक्ष के रूप में कुशल संचालन किया।

26 जनवरी 1950 को भारत के गणतंत्र बनने के साथ ही डॉ. राजेंद्र प्रसाद देश के प्रथम राष्ट्रपति बने। वे एकमात्र ऐसे राष्ट्रपति हैं जिन्हें लगातार दो कार्यकाल के लिए चुना गया। राष्ट्रपति भवन में रहते हुए भी उन्होंने सादा जीवन जिया, खादी के वस्त्र, शाकाहारी भोजन और नियमित प्रार्थना उनके दैनिक जीवन का हिस्सा थे। राष्ट्रपति होने के अलावा, उन्होंने भारत के पहले मंत्रिमंडल 1946 और 1947 में कृषि और खाद्य मंत्री पद भी संभाला था। 1962 में उन्हें भारत रत्न से सम्मानित किया गया।

राष्ट्रपति पद से अवकाश लेने के बाद वे 14 मई 1962 को पटना लौट आए और सदाकत आश्रम में रहने लगे। 28 फरवरी 1963 को बिहार विद्यापीठ परिसर में उन्होंने अपनी अंतिम सांस ली। उनके निधन के बाद जिस कक्ष में उन्होंने जीवन का अंतिम समय बिताया, उसे संग्रहालय का रूप दे दिया गया, जहां आज भी उनकी स्मृतियां जीवित हैं।

‘देशरत्न’ के नाम से विख्यात डॉ. राजेंद्र प्रसाद का जीवन त्याग, सादगी और कर्तव्यनिष्ठा का अनुपम उदाहरण है। स्वतंत्रता संग्राम से लेकर गणतंत्र भारत के निर्माण तक उनका योगदान अविस्मरणीय है। आज उनकी पुण्यतिथि पर पूरा राष्ट्र कृतज्ञता के साथ उन्हें याद कर रहा है, और उनकी जीवनगाथा आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा स्रोत बनी हुई है।

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