कश्मीर से कन्याकुमारी तक अपनी दौड़ के दौरान जाना- जरूरत है कश्मीर के बारे में मानसिकता बदलने की

कश्मीर से कन्याकुमारी तक सूफिया सूफी की दौड़ ‘रन फॉर होप’ का मकसद इंसानियत, एकता, शांति, समता- जैसे मानवीय मूल्यों को बढ़ावा देना था। इसका उद्देश्य लोगों से मिलना, उन्हें जानना, विचारों का आदान-प्रदान और लोगों को सकारात्मक सोच की तरफ ले जाना था।

फोटोः सोशल मीडिया
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नवजीवन डेस्क

मैं मायूस थी अपने देश में फैल रही नफरतों को देखकर। मुझे महसूस हो रहा था कि अपने लिए हर इंसान जी रहा है। देश के लिए कुछ करने का अलग मतलब होता है। इसके लिए मैंने दौड़ने को जरिया बनाया। कोशिश की देश में फैल रही नफरत के खिलाफ अमन और इंसानियत का पैगाम लोगों तक पहुंचाया जाए। यह विचार मुझे 2018 में अपनी 16 दिनों की इंडियन गोल्डेन ट्रैंगल से शुरू की गई 750 किलोमीटर दौड़ के दौरान दिमाग में आया। मेरी दौड़ इंडिया बुक ऑफ रिकॉर्ड में दर्ज हुई थी। फिर कश्मीर से कन्याकुमारी तक ‘रन फॉर होप’ का फैसला लिया।

इस मकसद को पूरा करने के लिए मुझे नौकरी छोड़नी पड़ी। मेरे सामने आर्थिक संकट भी था। पुख्ता इंतजाम न होने के बावजूद बड़े उद्देश्य के लिए मैंने कदम आगे बढ़ाया जिसमें मेरे लाइफ पार्टनर विकास जी ने पूरा सहयोग किया। गाड़ी का इंतजाम न होने की वजह से विकास जी ने स्कूटी पर मुझे सपोर्ट करने की योजना बनाई, लेकिन कश्मीर के लिए एक दिन निकलने से पहले किसी भले इंसान ने हमें अपनी गाड़ी दे दी और गाड़ी से विकास जी मेरे पीछे चलते रहे मुझे सपोर्ट करने के लिए। बाद में कुछ लोगों ने दौड़ में मेरा सहयोग करने के लिए मेरे रुकने की व्यवस्था, भोजन और धन आदि की मदद की, लेकिन सबसे ज्यादा मदद और प्यार-सम्मान आम लोगों ने दिया। इस तरह कुल चार हजार किलोमीटर की यह दौड़ मैंने 87 दिनों में पूरी की।

25 अप्रैल 2019 को मैंने श्रीनगर से जब दौड़ शुरू की, लोगों का सहयोग मिलना शुरू हो गया। सेना, पुलिस और वन विभाग का भी सहयोग मिला। इससे दौड़ पूरी हो सकी। मैंने हर दिन 50 किलोमीटर दौड़ने का लक्ष्य रखा था। 50 किलोमीटर के बाद वहां किसी होटल या रहने की जगह का बंदोबस्त करते थे। उसके बाद वहां से निकलते थे। इस दौड़ का मकसद इंसानियत, एकता, शांति, समता जैसे मानवीय मूल्यों को बढ़ावा देना, जिसे रन फॉर होप नाम दिया। लोगों से मिलना, उन्हें जानना, उनके साथ विचारों का आदान-प्रदान करना और लोगों को एक सकारात्मक सोच की तरफ ले जाना मेरी यात्रा का मकसद था।

श्रीनगर में कई लोगों से मिलने का मौका मिला। मेरी दौड़ को लेकर उनकी प्रतिक्रिया तारीफ के काबिल रही। दौड़ के पहले दिन दो कश्मीरी महिलाएं मिलीं। वे मुझे देखकर बहुत खुश हो रही थीं। उन्होंने मुझे रोका। वे कश्मीरी भाषा में बात कर रही थीं। मैं उन्हें समझने की कोशिश कर रही थी। वो मुझे चाय पिलाने के लिए अपने घर आमंत्रित कर रही थीं। उन्होंने जिस मुहब्बत के साथ आग्रह किया, मैं मना नहीं कर सकी। उनके घर गई। वहां एक अंकल थे जो हिंदी समझते थे। मैंने उन्हें अपने मकसद के बारे में बताया। वो बहुत खुश हुए। उनके विचार जानकर मुझे भी बहुत खुशी हुई कि वे लोग भी देश में अमन और इंसानियत को लेकर अपने विचार रख रहे थे।

उनकी मेहमान नवाजी देखकर मेरा दिल भर सा गया। उन्होंने मेरे सिर पर हाथ रखा और मकसद में सफल होने की दुआएं दीं। यहां मैंने ये सीखा कि हमें कभी भी सुनी-सुनाई बातों पर यकीन नहीं करना चाहिए। जिस तरह लोग कश्मीर और वहां के लोगों के बारे में मानसिकता रखते हैं, उसे बदलने की जरूरत है। कश्मीर से गुजरते हुए किसी ने मुझे या मेरे मकसद के बारे में कुछ भी गलत नहीं कहा, बल्कि हौसला बढ़ाया। शुरुआत में सुरक्षा के लिए जवान तैनात नहीं थे। जब उन्हें मेरे मकसद की जानकारी मिली तो मुझे पूरा सहयोग मिला और आगे की सुरक्षा के लिए उनकी ओर से संदेश भी भेजे गए। यह सब कुछ मेरे लिए यादगार बन गया।

मेरे हिसाब से लोगों का रहन-सहन, पहनावा, वे गांव के हैं अथवा शहर के, पढ़े-लिखे हैं या नहीं, उनका रहने का स्टैंडर्ड ऊंचा है या नीचा, ये सारी चीजें तय नहीं करतीं कि आपकी सोच कैसी है। इसके कई सारे उदाहरण मैंने दौड़ के दौरान देखे। कश्मीर में दो महिलाओं से मिलने की तरह ही राजस्थान के टोंक में भी दो महिलाएं मिलीं। वो जगह सुनसान थी। उन दो महिलाओं ने उस दिन की दौड़ पूरी करवाई। रात का वक्त था और वे स्लीपर्स में थीं। वे मुझे अपने घर लेकर गईं। वहीं मैंने रात्रि विश्राम किया। ये सिलसिला आगे तक चलता रहा। लोग मुझे मदद करने के लिए आते, अपने घर आमंत्रित करते, खाना खिलाते, बातचीत करते। ये सिलसिला कन्याकुमारी तक चला। इस तरह हजारों-लाखों लोगों से मैं जुड़ी।

इस बीच मेरे साथ एक-दो घटनाएं ऐसी भी हुईं, जिसमें मुझे कुछ लोगों ने नीचे गिराने और परेशान करने की भी कोशिश की। लेकिन मैं सकारात्मक सोच के साथ आगे बढ़ी। लोगों ने जिस तरह मुझे प्यार और सहयोग दिया, ऐसा लग रहा था, जैसे मैं उनके परिवार का ही हिस्सा हूं। इस दौड़ के दौरान मुझे कुछ खास अनुभूतियां भी हुईं, जिनका जिक्र करना मैं बहुत जरूरी समझती हूं। हमारा देश बहुत सारी विविधताओं वाला है। थोड़ी-थोड़ी दूरी पर रहन-सहन, खान-पान, रीति-रिवाज, पहनावा, भाषा और प्राकृतिक विविधता देखने को मिलती है।

श्रीनगर (कश्मीर) जहां से मैंने दौड़ शुरू की, मौसम बहुत सुकून वाला था और वहां प्राकृतिक संसाधनों की कमी नहीं थी। लेकिन कुछ जगहों पर भूस्खलन के कारण सड़कें खराब थी। ट्रकों की वजह से धूल और प्रदूषण का सामना करना पड़ा। वहां के लोगों का जीवन काफी सरल और सीधा था। वहां के लोगों का मेहमाननवाजी का कोई मुकाबला नहीं था। पंजाब में प्रवेश करते ही गर्मी से सामना हुआ जिसकी वजह से मेरी तबियत खराब हो गई और मुझे अस्पताल में भर्ती होना पड़ा। चार दिन तक मैं अस्पताल में भर्ती रही और जो डॉक्टर मेरा इलाज कर रही थीं वह फरिश्ते जैसी थीं। उन्होंने मुझे दौड़ने से नहीं रोका जबकि मैं उस वक्त चल भी नहीं पा रही थी। उन्होंने मुझे अपने परिवार की तरह रखा और मुझे चार दिन बाद दौड़ने लायक बनाया। मेरा हौसला बढ़ाया और मुझ से कोई फीस भी नहीं ली। पंजाब के लोग बहुत खुले दिल वाले और हर वक्त मदद के लिए तैयार रहने वाले थे। कई जगह अहसास हुआ कि वहां पौधारोपण की जरूरत है।

पंजाब से होकर दिल्ली और दिल्ली से राजस्थान की ओर बढ़ी तो कोटा-बूंदी-झालावाड़ के रास्ते कई जगह जंगली रास्ते से गुजरना पड़ा। वहां वन विभाग के लोगों का सहयोग तो मिला ही, वनों के बारे में बहुत सारी जानकारियां भी मिलीं। वो मेरे साथ मेरे मकसद में कन्याकुमारी तक शामिल रहे। चूंकि मैं खुद भी अजमेर (राजस्थान) की हूं, इसलिए मुझे पानी की अहमियत पता है। यहां पानी की कितनी किल्लत होती है और लोगों को कितनी परेशानियां झेलनी पड़ती हैं, इसका मुझे अंदाजा था। वहां लोगों से पता चला कि बीसलपुर बांध से राज्य के कई जिलों में पानी जाता है। वह बांध एकदम सूखने के कगार पर पहुंच गया है।

राजस्थान से आगे बढ़ी तो मध्य प्रदेश में एक ऐसी सच्चाई से रूबरू हुई जो परेशान कर देने वाली थी। वहां एक कुआं दिखा जिससे लोग पानी निकाल रहे थे। मैंने कुआं देखा तो दंग रह गई। पानी तलहटी में और मटमैला था। पूछने पर पता चला कि वही पानी लोग पीते हैं। वह भी काफी दूर से आकर इस कुएं से ले जाते हैं। मुझे बहुत दुख हुआ। लगा कि यह कितनी चिंता का विषय है कि लोगों को पीने के पानी तक के लिए जूझना पड़ रहा है।

दक्षिण भारत में प्राकृतिक सौंदर्य देखने लायक था। खान-पान, रहन-सहन, बोली-भाषा और वेशभूषा सब कुछ बदला हुआ मिला। इस कारण थोड़ी दिक्कतें भी हुईं लेकिन लोगों का भरपूर सहयोग मिला और वहां के बारे में बहुत कुछ सीखने को भी मिला। तमिलनाडु में बड़ी-बड़ी विंड मिलें नजर आईं। कन्याकुमारी में जहां हमारे देश का अंतिम प्वाइंट है, मैंने 21 जुलाई 2019 को दौड़ पूरी की। वहां महसूस हुआ कि इतनी विविधताओं के बावजूद हमारा देश एकता के सूत्र में बंधा है, जहां हर धर्म, जाति के लोग विभिन्न संस्कृतियों के बीच, अलग-अलग रीति-रिवाजों के साथ एक होकर रहते हैं। यही हमारे देश की सबसे बड़ी खासियत है।

(नवजीवन के लिए गिनीज वर्ल्ड रिकॉर्ड बनाने वाली धावक सूफिया सूफी का लेख)

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