गणेश शंकर विद्यार्थीः एक क्रांतिकारी पत्रकार, जिसने मजहबी एकता के लिए जीवन बलिदान कर दिया

उस समय के साक्षात्कारों में एक चर्चा उभरती है कि कानपुर की अनेक बस्तियों में पहले से कहा जा रहा था कि आज कानपुर का शेर मार दिया जाएगा। यह कहने की जरूरत नहीं है कि कानपुर के शेर से तात्पर्य विद्यार्थी से ही था। और वास्तव में विद्यार्थी की हत्या कर दी गई।

फोटोः सोशल मीडिया
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भारत डोगरा

आज 25 मार्च को देश एक ऐसे महान स्वतंत्रता सेनानी को श्रद्धांजलि दे रहा है जिसने सांप्रदायिक सद्भावना के लिए और विशेषकर हिंदू-मुस्लिम एकता को मजबूत करने के लिए पहले अपना पूरा जीवन समर्पित कर दिया और फिर युवावस्था में ही अपने प्राण भी न्यौछावर कर दिए। जी हां, 91 वर्ष पहले 25 मार्च 1931 को गणेश शंकर विद्यार्थी ने सांप्रदायिक हिंसा को रोकने के लिए अपना जीवन बलिदान कर दिया था।

‘यंग इंडिया’ में गांधीजी ने उनकी शहादत पर टिप्पणी करते हुए लिखा था- “...उसका खून अंत में दोनों मजहबों को आपस में जोड़ने के लिए सीमेंट का काम करेगा। कोई कृत्रिम समझौता हमारे हृदयों को आपस में नहीं जोड़ सकता। पर गणेश शंकर विद्यार्थी ने जिस वीरता का परिचय दिया है, वह अंत में पत्थर से पत्थर हृदय को भी पिघलाकर एक कर देगी। ...वह मरे नहीं, आज हम सबसे कहीं अधिक सच्चे रूप में जीवित हैं। जब तक हमने उन्हें भौतिक शरीर में जीवित देखा, तब तक हमने उन्हें नहीं पहचाना।”

पंडित जवाहरलाल नेहरु ने उनकी हत्या पर शोक व्यक्त करते हुए कहा था- “...यकीन नहीं आता था कि गणेश जी गुजर गए।... जवां मर्द और निडर। दूरदर्शी और निहायत अक्लमंद सलाहकार, कभी हिम्मत न हारने वाले, चुपचाप काम करने वाले, नाम-पद-प्रसिद्धि से दूर भागने वाले... शान से वह जिए और शान से वह मरे। और मरकर जो उन्होंने सबक सिखाया वह हम बरसों जिंदा रहकर क्या सिखाएंगे।”

गणेश शंकर विद्यार्थी का नाम अमिट रूप से महानतम स्वतंत्रता सेनानियों और संपादकों की प्रथम पंक्ति में अंकित है। उन्होंने बहुत कम समय में बहुपक्षीय अमूल्य योगदान दिए। यह सुनकर आश्चर्य होता है कि मात्र 40 वर्ष की अल्पायु में उन्होंने कितने विभिन्न क्षेत्रों में महान उपलब्धियां प्राप्त कीं- स्वतंत्रता समर में, समाज सुधार में, राष्ट्रीय एकता के क्षेत्र में, संपादन और साहित्य के क्षेत्र में।


गणेश शंकर विद्यार्थी की विशेष पहचान थी कि इन्हें क्रांतिकारियां और कांग्रेस के शीर्ष नेताओं दोनों का गहरा विश्वास और सम्मान प्राप्त होता रहा था। बहुत कम आयु में ही वे पूरे संयुक्त प्रांत (आज के उत्तर प्रदेश) के कांग्रेस के अध्यक्ष बन गए थे। संपादक और लेखक के रूप में भी वे ब्रिटिश साम्राज्यवाद पर गहरा प्रहार करते रहते थे। विभिन्न धर्मों की एकता के वे प्रबल समर्थक थे। अतः ब्रिटिश शासकों को डर था कि यह व्यक्ति एक दिन कांग्रेस और क्रांतिकारियों को नजदीक लाकर बहुत बड़ा आंदोलन करने में प्रमुख भूमिका निभा सकता है और साथ ही संयुक्त प्रान्त जैसे महत्त्वपूर्ण क्षेत्र में हिंदू-मुस्लिम एकता को मजबूत कर इस आंदोलन को और व्यापक बना देगा। अतः आजाद और भगत सिंह के साथ विद्यार्थी भी औपनिवेशिक शासन के विशेष निशाने पर थे।

विद्यार्थी से उन्हें यह डर भी था कि भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव की फांसी के विरुद्ध सबसे बड़े विरोध का आयोजन वे ही करेंगे क्योंकि उनकी पंहुच कांग्रेस के साथ क्रांतिकारियों के समर्थकों तक भी थी। इन सब स्थितियों को देखते हुए ही औपनिवेशिक शासकों ने भगत सिंह की फांसी की तिथि तय करते समय ही कानपुर में बड़ा सांप्रदायिक दंगा फैलाने की योजना भी बना ली। उनकी सोच यह थी कि यदि इसी समय दंगा हो गया तो कानपुर (जो कि विद्यार्थी का प्रमुख कार्य क्षेत्र था) में विरोध प्रदर्शनों की कोई संभावना नहीं रहेगी।

इतना ही नहीं, औपनिवेशिक शासकों की योजना संभवतः इससे एक कदम और आगे गई थी। विद्यार्थी को इससे कुछ पहले ही जेल से रिहाई मिली थी। यह मानी हुई बात थी कि दंगा भड़कने पर वे दंगा प्रभावितों की सहायता और बचाव के लिए दंगा प्रभावित क्षेत्रों में अवश्य पहुचेंगे। दंगों की स्थिति में उनकी हत्या करवाना औपनिविशेक शासकों की नजर में अपेक्षाकृत आसान था क्योंकि ऐसे में अनेक असामाजिक तत्त्व और अपराधी वैसे ही सक्रिय होते हैं। ऐसी स्थिति में हत्या होने पर इसे दंगे में हुई हत्या माना जाना था और ब्रिटिश शासन इतने लोकप्रिय नेता की हत्या की साजिश के आरोप से भी बच सकता था।

उस समय के साक्षात्कारों से एक चर्चा यह उभरती है कि कानपुर की अनेक बस्तियों में पहले से कहा जा रहा था कि आज कानपुर का शेर मार दिया जाएगा। यह कहने की जरूरत नहीं है कि कानपुर के शेर से तात्पर्य विद्यार्थी से ही था। वास्तव में यही हुआ और विभिन्न दंगा पीड़ितों को बचाने में लगे हुए गणेश शंकर विद्यार्थी की हत्या कर दी गई।


पूरा घटनाक्रम इस तरह का है कि ब्रिटिश औपनिवशिक शासन की किसी गहरी साजिश का संकेत मिलता है। खैर, अब तो बहुत वक्त बीत गया। पर 91 वर्ष बाद भी हम विद्यार्थी के महान बहुपक्षीय योगदान से अनेक स्तरों पर प्रेरणा ले सकते हैं। चाहे आजादी की लड़ाई में उनके अद्वितीय योगदान को याद करें या पत्रकारिता और लेखन-संपादन में, समाज-सुधार में या हिंदू-मुस्लिम एकता में, सभी स्तरों पर उनका योगदान बहुमूल्य था।

आज हमारा देश जिस दौर से गुजर रहा है उसमें गणेश शंकर विद्यार्थी जी के योगदान को और सामाजिक आर्थिक न्याय और राष्ट्रीय एकता के प्रति उनकी गहरी प्रतिबद्धता को याद रखना और उससे प्रेरणा प्राप्त करना और भी जरूरी हो गया है।

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