जयंती विशेष: अपनी मिसाल आप ही थे गणेशशंकर विद्यार्थी!
जो भी युवक किसी भी रूप में स्वतंत्रता संघर्ष से जुड़ना चाहता था, विद्यार्थी जी उसकी मदद में किसी भी सीमा तक जाने से नहीं हिचकते थे। 1924 में, जब भगत सिंह उनके पास पहुंचे तो वहीं के होकर रह गए और आजादी हासिल करने को अपना लक्ष्य बना लिया।

अपने समय के उद्भट सम्पादक और अग्रगण्य स्वतंत्रता सेनानी स्मृतिशेष गणेशशंकर विद्यार्थी की आज जयंती है। इस अवसर पर कोई उनके व्यक्तित्व व कृतित्व पर उड़ती-सी निगाह डालकर भी समझ सकता है कि उनकी देशसेवा की सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि वे अपनी पत्रकारिता व स्वतंत्रता संघर्ष दोनों में किसी भी तरह के मतभेद या विचारभेद को किसी भी रूप में स्वतंत्रता प्राप्ति के लक्ष्य के आड़े आने देने के पूरी तरह खिलाफ थे। यहां तक कि वे अहिंसा व हिंसा के द्वंद्व में भी नहीं फंसते थे और उनका मानना था कि सबसे खास बात तो लक्ष्य की प्राप्ति है। औजार व हथियार तो परिस्थितियों के अनुसार अपनाये व बदले जा सकते हैं।
कानपुर को कर्मभूमि बनाने और मजदूर नेता के रूप में सार्वजनिक जीवन शुरू करने के साथ नौ नवंबर,1913 को वे अपनै 'प्रताप' नामक पत्र (पहले साप्ताहिक, फिर दैनिक) के सम्पादक व संचालक बने तो भी उन्होंने अपनी इसी मान्यता के अनुसार महात्मा गांधी के अहिंसक और क्रांतिकारियों के सशस्त्र क्रांतिकारी संघर्षों का एक जैसा समर्थन व सहयोग किया। अलबत्ता, बाद में उनको लगा कि देश का महात्मा का रास्ते पर चलना ही बेहतर होगा।
बहरहाल, अपनी सम्पादन कुशलता से उन्होंने 'प्रताप' को जल्दी ही 'आजादी की लड़ाई का मुखपत्र’ बना दिया था। इस घोषणा के साथ कि देशहित उसका परमधर्म है, राष्ट्रीयता प्राण और न्यायपथ से विचलित न होना सबसे बड़ा कर्तव्य, उन्होंने 'जिसको न निज गौरव तथा निज देश का अभिमान है, वह नर नहीं, नरपशु निरा है और मृतक समान है' को उसका आदर्श वाक्य बनाया। इसी तरह प्रताप' का ध्येय वाक्य था : ‘दुश्मन की गोलियों का सामना हम करेंगे, आजाद ही रहे हैं, आजाद ही रहेंगे’।
अपने तईं गणेश शंकर विद्यार्थी ने उन किसान आंदोलनों का भी मुखर होकर समर्थन किया, जिनका उन दिनों देशभर में उभार हो रहा था। खासकर अवध सूबे में उग्र किसानों ने गोरी सत्ता की नाक में दम कर रखा था और विद्यार्थी जी और उनके प्रताप को उन आंदोलनों के समर्थन की कोई भी कीमत कम लगती थी।
सम्पादकीय रीति-नीति में उनका सारा जोर इस पर होता था कि स्वतंत्रता संघर्ष के जितने भी रास्ते हो सकते हों, उनमें किसी को भी वीरान न रहने दिया जाए और परिस्थिति के अनुसार हर तरह के अस्त्र-शस्त्र व रणनीतियां इस्तेमाल की जाएं। जाहिर है कि उनके निकट अहिंसा भी एक रणनीति थी और सशस्त्र संघर्ष भी, जिन्हें अलग-अलग स्थितियों में आजमाया जा सकता था।
जब तक वे इस संसार में रहे, कानपुर स्थित 'प्रताप' कार्यालय क्रांतिकारियों के पहचान छिपाकर रहने, छद्म नाम से लिखने व काम करने का केन्द्र बना रहा। 'प्रताप' द्वारा महात्मा गांधी, कांग्रेस, क्रांतिकारियों व किसानों के आंदोलनों से खुले समर्थन से चिढ़ी गोरी सरकार के दमन व उत्पीड़न (जिसमें बार-बार जमानत मांगना और जेल भेजना भी शामिल था) के विरुद्ध उन्होंने जैसा निर्भय व दो टूक दृष्टिकोण अपनाया और उसके अनेक कोप झेले, उसकी दूसरी मिसाल दुर्लभ है।
उस दौर में भागलपुर में स्वतंत्रता सेनानी बटुकदेव शर्मा क्रांतिकारियों की एक मासिक पत्रिका निकालते थे। बढ़ती पुलिस सरगर्मी के बीच उनको अपने पकड़े जाने का अंदेशा सताने लगा और एक शुभचिंतक के कहने पर उन्होंने गुप्त पत्र लिखकर छुपने का ठौर मांगा तो विद्यार्थी जी ने उन्हें 'प्रताप' कार्यालय के उस खास कमरे में छुपाया, जिसमें किसी को भी जाने की इजाजत नहीं थी। अनंतर, बटुकदेव अपना नाम बदलकर 'प्रताप' में काम करने लगे।
उन दिनों जो भी युवक किसी भी रूप में स्वतंत्रता संघर्ष से जुड़ना चाहता था, विद्यार्थी जी उसकी मदद में किसी भी सीमा तक जाने से नहीं हिचकते थे। 1924 में, जब भगत सिंह अभी पढ़ ही रहे थे, अपने परिजनों के शादी कर लेने के दबाव से नाराज हुए और क्रांतिकारी बनने के इरादे से घर छोड़कर विद्यार्थी जी के पास पहुंचे तो उन्होंने उनसे कहा, “देख लड़के, आजादी की चाहत ऐसी है, मानो कोई परवाना शमा पर फ़ना हो जाना चाहता हो। जलती हुई शमा में एक बार दाखिल हो गए, तो यह उम्मीद मत रखना कि बाक़ियों के पास जाकर उन्हें भी शमा तक लेकर आऊंगा. एक बार जलने की ठान ली तो वापसी का रास्ता बंद कर लेना ही ठीक है।”
धुन के धनी भगत सिंह ने यह रास्ता बंद करके अपना नाम बलवंत सिंह रख लिया और ढाई वर्ष तक इसी नाम से 'प्रताप' में लिखने व काम करने लगे। वहीं उनकी बटुकेश्वर दत्त, चंद्रशेखर आज़ाद, और बिजॉय कुमार सिन्हा जैसे क्रांतिकारियों से मुलाकात हुई।
विद्यार्थी जी के रहते कानपुर शहर से क्रांतिकारियों का जैसा गहरा नाता बना, वे नहीं होते तो क्या पता वह संभव भी होता या नहीं और उनके संरक्षण के बगैर क्रांतिकारी उस रूप में अपनी भूमिका निभा भी पाते या नहीं। भगत सिंह तो उनके साथ काम करके ही यह समझ पाये थे कि क्रांतिकर्म में शरीर या अस्त्र-शस्त्रों की ताकत ही निर्णायक नहीं होती। विचारों की ताकत न हो तो बड़े बदलाव संभव नहीं होते। उनकी यही समझदारी बाद में उनके इस बयान के रूप में सामने आई कि क्रांति की तलवार विचारों की सान पर तेज होती है और बम व पिस्तौल क्रांति नहीं लाते।
23 मार्च, 1931 को भगत सिंह के साथ सुखदेव व राजगुरु शहीद कर दिए गये तो उद्वेलित कानपुरवासियों ने गोरी सत्ता के खिलाफ मोर्चा खोल दिया। कांग्रेस के बंद के आह्वान के बीच अंग्रेज कलेक्टर जार्ज बेली ने देखा कि स्थिति कर्फ्यू लगाने के बावजूद नियंत्रण में नहीं आ रही तो उसने अपनी सीआईडी को हिन्दुओं व मुस्लिमों को आपस में भिड़ा देने का षड्यंत्र रचने को कह दिया। उसके कहे मुताबिक सीआईडी ने परेड चौराहे पर गाय काटे जाने की अफवाह फैला दी तो अंग्रेजपरस्त धर्मांधों ने दोनों समुदायों को एक दूसरे की जान का दुश्मन बना देने में कतई देर नहीं की।
'प्रताप बाबा' के नाम से प्रसिद्ध विद्यार्थी जी के लिए परिस्थितियों के समक्ष आत्मसमर्पण करके चुपचाप घर में बैठे रहना मुमकिन नहीं हुआ तो अपनी ओर से अमन-चैन बहाली के बहुविध प्रयत्न करते हुए 25 मार्च की सुबह 9 बजे वे शहर के डिप्टी कलेक्टर के पास गये और साम्प्रदायिक तत्वों पर अंकुश लगाने को कहा। इससे पहले ऐसे ही एक मौके पर साम्प्रदायिकता भड़की तो प्रशासन ने तेजी से कार्रवाई कर बात को बिगड़ने से रोक दिया था। लेकिन विद्यार्थी जी ने पाया कि इस बार उसके सुर बदले हुए हैं।
वहां से निराश होकर वे गिनती के सहयोगियों के साथ मारकाट रोकने और निर्दोषों को बचाने निकल पड़े। कई जगह वे ऐसा करने में सफल भी हुए, लेकिन उसके बाद हालात की भयावहता को देखकर उनके सहयोगियों की हिम्मत भी पस्त हो गई और वे उन्हें एकदम से अकेला कर गये। इसके बावजूद वे पूरी निर्भयता से दंगाइयों को समझाते-बुझाते और रोकते रहे। तभी उन पर प्राणांतक हमला हुआ।
इस हमले के प्रत्यक्षदर्शी बता गये हैं कि वे कुछ भी कर गुजरने पर आमादा दो तरफ़ा भीड़ के बीच फ़ंस गये तो कुछ शुभचिंतकों ने उनकी रक्षा के लिए उन्हें एक अपेक्षाकृत सुरक्षित गली में ले जाना चाहा। लेकिन वे यह कहते हुए दोनों भीड़ों को समझाने-बुझाने में लगे रहे कि अपनी जान बचाने के लिए कायरों की तरह भागना क्या, एक न एक दिन तो सबको मर ही जाना है।
इसी के बाद एक भीड़ उन पर हमलावर हो उठी। उससे निकलकर एक दंगाई ने उन्हें चाकू भोंका, फिर दूसरे ने कुल्हाड़ी से वार किया। इसके बाद तो उन पर होने वाले प्रहारों की गिनती ही नहीं रह गई। कई दिनों बाद दंगा थमा तो उनका पार्थिव शरीर एक अस्पताल में लाशों के ढेर में मिला।
कई दिनों तक उस ढेर में पड़े रहने के कारण शरीर की हालत इतनी खराब हो चुकी थी कि उनके खादी के कपड़ों से ही उसे पहचाना जा सका। तिस पर दंगे की विभीषिका के कारण उनकी अन्त्येष्टि उनके निधन के चार दिनों बाद 29 मार्च को सम्भव हो पायी। बताते हैं कि जाति और धर्म के भेद से परे, वचन, लेखनी और कर्म की एकता को अलंकृत करने वाली उनकी इस शहादत ने कानपुर के अमनपसंद निवासियों और सिविल सोसायटी को ग्लानिग्रस्त करके रख दिया था। इस कारण और कि उस दंगे में विद्यार्थी जी इकलौते ऐसे शख्स थे, जिन्होंने निर्बल व निर्दोष नागरिकों को बचाते हुए निर्भयतापूर्वक क्रूर दंगाइयों के हाथों अपनी जान गंवाई।
विद्यार्थी जी का जन्म 26 अक्टूबर, 1890 को इलाहाबाद के अतरसुइया मुहल्ले में स्थित अपनी ननिहाल में हुआ था। उनके पिता मुंशी जयनारायण पास के फतेहपुर जिले में हथगांव के निवासी थे और ग्वालियर रियासत में मुंगावली के ऐंग्लो वर्नाक्युलर स्कूल में हेडमास्टर पद पर नियुक्त थे। विद्यार्थी का बाल्यकाल उनके गांव में ही बीता और वहीं उनकी प्रारंभिक शिक्षा-दीक्षा भी हुई। जैसी कि उन दिनों रवायत थी, उनकी शिक्षा उर्दू की पढ़ाई से शुरू हुई और 1905 में उन्होंने मिडिल की परीक्षा पास की। उनके पत्रकारीय जीवन की शुरुआत यों हुई कि 1907 ई. में कानपुर से एंट्रेंस पास करके आगे की पढ़ाई के लिए वे फिर इलाहाबाद गये और कायस्थ पाठशाला में नाम लिखाया तो उन्हें प्रख्यात लेखक सुंदरलाल के साप्ताहिक ‘कर्मयोगी’ में काम का अवसर हाथ लगा।
इस बीच छोटी-मोटी नौकरियां करते, अंग्रेज अधिकारियों से झगड़कर उन्हें छोड़ते व परिपक्व होते हुए वे ‘स्वराज्य’ तथा ‘हितवार्ता’ वगैरह अपने समय के जाने-माने पत्रों में भी लिखने लगे। 1911 में वे पंडित महावीर प्रसाद द्विवेदी के सम्पादकत्व में लब्धप्रतिष्ठ पत्रिका ‘सरस्वती’ से जुड़े, जिसमें थोड़े ही दिनों बाद ‘आत्मोत्सर्ग’ शीर्षक से उनका पहला बहुचर्चित लेख प्रकाशित हुआ। इससे पहले मात्र सोलह साल की उम्र में वे ‘हमारी आत्मोत्सर्गता’ शीर्षक पुस्तक लिख चुके थे।
लेकिन ‘सरस्वती’ से उनका जुड़ाव लम्बा हो पाता, इससे पहले ही वे उसे छोड़कर महामना मदनमोहन मालवीय के साप्ताहिक ‘अभ्युदय’ में चले गये, जहां सितंबर, 1913 तक रहे। ‘अभ्युदय’ उन दिनों हिन्दी के गिने-चुने ऐसे पत्रों में से एक था, जो खराब आर्थिक स्थिति के बावजूद अपने लेखकों को मानदेय देता था। उसमें किसान चेतना से जुड़ी भरपूर सामग्री होती थी, जिसके प्रसार के लिए उसके मुखपृष्ठ पर पाठकों से अपील छपा करती थी कि वे उसे पढ़ने के बाद कृपापूर्वक किसी किसान को दे दिया करें।
लेकिन ‘सरस्वती’ की ही तरह उनकी ‘अभ्युदय’ की पारी भी लम्बी नहीं हो पायी। 9 नवम्बर, 1913 को उन्होंने कानपुर से अपना खुद का ‘प्रताप’ निकाला, जो जल्दी ही देश की जनता पर अंग्रेजों व देसी रियासतों के अत्याचारों के विरुद्ध तीखे क्रांतिकारी विचारों का संवाहक बन गया। फिर तो वे सरदार भगत सिंह समेत अनेक कां्रतिकारी विभूतियों को उससे जोड़ने में सफल रहे और उसमें क्रांतिकारी रामप्रसाद ‘बिस्मिल’ की आत्मकथा भी छापी।
अंग्रेजों की दासता के खिलाफ निर्भीक टिप्पणियों व अग्रलेखों के चलते वे पांच बार जेल गए और ‘प्रताप’ से कई बार जमानत मांगी व जब्त की गई, जिसे जनता के सहयोग से जैसे-तैसे वे बार बार जमा करते रहे। गोरी सरकार द्वारा बारम्बार उत्पीड़न और दमन के बावजूद ‘प्रताप’ के पाठक उसमें प्रकाशित उनके विचारों से प्रभावित हो रहे थे और पत्र के रूप में वह जन चेतना के विकास में सहायक हो रहा था। उसकी बढ़ती स्वीकार्यता के ही मद्देनजर, उसकी स्थापना के सात साल बाद, 1920 ई. में विद्यार्थी ने यत्नपूर्वक उसे दैनिक कर दिया और ‘प्रभा’ नाम की एक पत्रिका भी निकाली। मालवीय जी के ‘अभ्युदय’ की ही तरह ‘प्रताप’ भी किसानों और मजदूरों का हिमायती पत्र था और अंग्रेजों की अमानुषिकता के साथ देसी रियासतों की प्रजा के कष्टों को लेकर भी सतर्क रहता था। ‘चिट्ठी पत्री’ स्तंभ उसकी खास विशेषता थी।
सात जनवरी, 1921 को रायबरेली के मुंशीगंज में अंग्रेजों ने किसानों पर बर्बर गोलीबारी कराकर उनके आन्दोलन को कुचलने की बेहद निर्मम कोशिश की तो विद्यार्थी ने ही ‘प्रताप’ में बेबाक अग्रलेख लिखकर उस किसान संहार को सबसे पहले ‘एक और जलियांवाला कांड’ की संज्ञा दी थी।
उन्होंने लिखा था, ‘वहां {जलियांवाला में} एक घिरा हुआ बाग था, जबकि यहां {रायबरेली में} सई नदी का किनारा और क्रूरता, निर्दयता और पशुता की मात्रा में किसी प्रकार की कमी नहीं थी।’ उल्लेखनीय यह कि जब इसकी कीमत चुकाने का वक्त आया तो मुकदमे और जमानत जब्ती के साथ लम्बी सजा झेलकर भी कोई समझौता नहीं किया।
‘प्रताप’ के सम्पादनकर्म ने विद्यार्थी को तो बड़ा पत्रकार बनाया ही, उसकी मार्फत कितने ही नवयुवकों को पत्रकार, लेखक और कवि वगैरह बनने की प्रेरणा तथा प्रशिक्षण मिला। पत्रकारों व साहित्यकारों की नयी पीढ़ी ने उससे रिपोर्टिंग व लेखन को रुचिकर और भाषा की सरल बनाना सीखा। सच कहें तो प्रताप ने सरल, मुहावरेदार और लचीलापन लिए हुए चुस्त हिंदी की एक नई शैली का प्रवर्तन किया। विद्यार्थी उसमें उपनामों से भी लिखा करते थे।
वैचारिक दृष्टिकोण पर जायें तो विद्यार्थी पत्रकारिता को स्वतंत्रता संघर्ष का सबसे धारदार हथियार मानते थे। लोकमान्य तिलक उनके राजनीतिक गुरू थे और उनकी ही प्रेरणा से उन्होंने कोरे पत्रकार बनने के बजाय मैदानी स्वतंत्रता संघर्ष और राजनीति में भी हिस्सेदारी की।
श्रीमती एनी बेसेंट के ‘होमरूल’ आंदोलन में तो उन्होंने बहुत लगन से काम किया ही, अपनी दुर्धर्ष संघर्षशीलता व विश्वसनीयता के चलते जल्दी ही कानपुर के मजदूर वर्ग के एकछत्र नेता बन गये। उन दिनों उन्हें उत्तर प्रदेश (तब संयुक्त प्रात) के चोटी के कांग्रेस नेताओं में गिना जाता था। 1925 ई. में वे कांग्रेस के कानपुर अधिवेशन की स्वागत-समिति के प्रधानमंत्री बने तथा 1930 ई. में प्रांतीय कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष। इसी नाते सन् 1930 के सत्याग्रह आंदोलन में गांधी जी ने उत्तर प्रदेश की कमान उन्हीं के हाथ में दी थी।
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