शख्सियत

कला के जितने भी रूप हैं, उन्हें आगे बढ़ाने के लिए सरकार को जरूर काम करना चाहिए: प्रसिद्ध मूर्तिकार राम सुतार

राम सुतार<b> </b>जाने-माने मूर्तिकार हैं। उन्होंने भारत की कई बड़ी राजनीतिक हस्तियों की मूर्तियां बनाई हैं, जिनमें महात्मा गांधी, जवाहर लाल नेहरू, इंदिरा गांधी, डॉ भीमराव आंबेडकर, भगत सिंह और सरदार पटेल शामिल हैं। पेश है उनसे राम शिरोमणि शुक्ल की बातचीत।&nbsp;

फोटो: सोशल मीडिया

राम शिरोमणि शुक्ल

आज पूरी दुनिया में आपकी कला की बहुत प्रशंसा होती है। आप क्या सोचकर इस क्षेत्र में आए, क्या सोचा था कि भविष्य में क्या करेंगे?

मूर्ति कला में मेरी शुरू से ही रुचि रही है। इसलिए इस माध्यम में काम शुरू किया। मेरा बचपन से यह सोचना रहा है कि आप जो चाहते हो, वह करते जाओ। मन से काम करोगे, तो आपको सफलता मिलेगी। मैं लोगों से भी यही कहता हूंं कि किसी भी काम को गंभीरता से करो। जब आप ऐसा करोगे, तो लोग उसे महसूस करेंगे और उसका सम्मान भी करेंगे। फिर आपके काम से ही आपकी पहचान बनेगी।

आप अपने कुछ ऐसे काम के बारे में बताएं जिसे आपने बहुत मन से शुरूकिया और बनने के बाद वह बहुत अच्छा लगा?

महात्मा गांधी। मैंने जो सबसे बढ़िया काम किया और जो लोगों को भी काफी पसंद आया। मेरे मन में गांधीजी को लेकर बहुत सम्मान था, इसलिए कि वह बहुत बड़ा काम कर रहे थे। मेरे मन में शुरू से इच्छा थी कि महात्मा गांधी की मूर्ति बनाऊंगा। बचपन में सबसे पहले 1948 में गांधीजी की मूर्ति बनाई। इस मूर्ति को बनाने में मुझे बहुत आत्मिक संतोष मिला।

आपका स्टूडियो बहुत समृद्ध है। इसमें आपकी बनाई बहुत सारी मूर्तियां हैं जो खुद ही गवाही देती हैं कि आपने कितना काम किया है। इस स्टूडियो के बारे में भी कुछ बताइए?

हां, अब तो यह स्टूडियो हो गया है। इसके अलावा भी कुछ और स्टूडियो हैं। पहले तो हमारे पास कुछ नहीं था। सिर्फ दो कमरे का मकान था। वहां से सब शुरू हुआ। महात्मा गांधी के बाद मेरी दूसरी बड़ी मूर्ति गोविंद बल्लभ पंत की थी। जब हम लाजपत नगर में रहते थे, तब हमारे पास जगह नहीं थी। फिर हमने एक किराये का मकान लिया। वहां एक कार रखने की जगह थी। तो उस कार रखने की जगह को मैंने स्टूडियो बना लिया और वहीं पंत जी की मूर्ति बनाई। यह एक बड़ा काम था। उसके बाद लक्ष्मी नगर में एक जगह मुझे मिली। वहां स्टूडियो बना लिया। वहां पर महात्मा गांधीजी की मूर्ति, नेहरूजी की, इंदिराजी की और बहुत सारी मूर्तियां बनाईं। उसके बाद मेरा संपर्क मायावती जी से हुआ। लखनऊ में आंबेडकर की मूर्ति लगनी थी। उसी समय मैंने यह सोचा कि अगर कहीं कोई बड़ी जगह मिल जाती तो अच्छा रहता।

मैंने उनके सामने बात रखी। मायावती ने आश्वासन दिया कि आप यह काम ठीक से और समय से कर दीजिए, हम आपको जमीन दिलाएंगे। उसके बाद नोएडा में यह जगह मिली। पैसे मैंने दिए। मुफ्त में नहीं मिली जमीन। उसके बाद मैंने यहां स्टूडियो बनाया।

कभी किसी सरकार ने यह नहीं सोचा कि आपकी इस कला को आगे बढ़ाने के लिए जो जरूरतें हैं, वह आपको उपलब्ध कराई जाएं?

नहीं, कोई नहीं सोचता। कभी मैंने किसी से यह जरूर कहा था कि अगर कोई जगह मुझे उपलब्ध करा दी जाए, तो वहां मैं अपनी मूर्तियों को सहेज कर रख सकूंगा। लेकिन तब मुझसे कह दिया गया कि किसी अकेले को जमीन नहीं दी जा सकती। अब यह उनकी समझ की बात है कि कलाकार कोई अकेला व्यक्ति नहीं होता। कलाकार तो समाज के लिए होता है और वह समाज के लिए काम करता है। आखिर मूर्तियां और मूर्तिकला कोई हमारी थोड़े ही होती है। वह तो लोगों के लिए होती हैं। लोग उन्हें देखते हैं और खुश होते हैं। जिन्हें देना है अगर वह नहीं देते तो क्या किया जा सकता है।

आपकी बनाई मूर्तियां जो जगह-जगह लगी हैं, उन्हें आप पहले बनाते हैं और लोग आपसे ले जाते हैं या वे संपर्क करते हैं तब आप उनके लिए मूर्तियां बनाते हैं?

हम तो मूर्तियां बनाते ही रहते हैं। लेकिन लोग हमसे संपर्क करते हैं कि हमें यह मूर्ति और इस तरह चाहिए। उनकी अपनी कल्पना और योजना होती है। उन्हें लगता है कि हम यह मूर्ति बनाएं, तो वे मुझसे संपर्क करते हैं। उसके बाद हमारा कांट्रेक्ट होता है और हम उनके लिए मूर्ति बनाते हैं। इस तरह हमारी मूर्तियां कोलकाता, लखनऊ और अहमदाबाद से लेकर अनेक स्थानों पर लगी हैं।

निकट भविष्य में आपके पास ऐसे कोई कांट्रेक्ट्स हैं, जिनकी मूर्तियां आपको बनानी हैं?

हां, अटल बिहारी वाजपेयी की छोटी मूर्ति बना रहा हूं। वह काफी प्रसिद्ध व्यक्ति हैं। उनकी मूर्ति बनवाने के लिए जरूर कोई आएगा।

एक सवाल अक्सर उठाया जाता है कि जो आप बना रहे हैं उसे मूर्ति कहा जाए या प्रतिमा, क्योंकि माना जाता है कि मूर्तियां देवी-देवताओं की होती हैं। अन्य लोगों की प्रतिमा होती है?

दोनों ही शब्द हैं। एक संस्कृत शब्द है। ऐसी कोई बात नहीं है कि मूर्ति कहने का मतलब भगवान या देवी-देवता का ही समझा जाए। कोई इन्हें मूर्ति भी कह सकता है या प्रतिमा भी कह सकता है। अब जैसे हाथी की प्रतिमा को भी लोग मूर्ति ही कहते हैं। शायद यही आसानी से उन्हें समझ में आता होगा।

किसी भी कला के बारे में आमतौर पर यह पाया जाता है कि वह किसी खास वर्ग तक सीमित रहती है। मूर्तियों के बारे में आमलोगों की समझ को कैसे लेते हैं?

ये मूर्तियां बनाने और लगाने के पीछे सबसे बड़ा उद्देश्य यह है कि इनको और इनके किए कामों को याद रखा जाए। इतना ही नहीं, लोग उनसे प्रेरणा भी लेते रहें। वैसा ही काम हम भी करें।

आपके स्टूडियो में एक तस्वीर लगी है राजकपूर की फिल्म ‘मेरा नाम जोकर की’। क्या इस पर भी कोई काम कर रहे हैं?

राजकपूर की मूर्ति बनानी है। यह किसी रूसी फिल्म संस्था का कांट्रेक्ट है। वहां कोई फिल्म से संबंधित आयोजन होना है और वहीं इसे लगाया जाना है। रूसी लोग भी हमारी फिल्मों और खासकर राजकपूर को बहुत प्यार करते हैं।

आपकी बनाई मूर्तियों में राजनीतिक व्यक्तियों की मूर्तियां ज्यादा हैं। क्या अन्य क्षेत्र के लोगों की भी  मूर्तियां इतनी हैं?

सिर्फ राजनीतिक व्यक्तियों की ही मूर्तियां नहीं हैं। अन्य क्षेत्रों की भी मूर्तियां बनाई हैं। हां, यह जरूर है कि राजनीतिज्ञों की ज्यादा हैं।

क्या कोई ऐसी योजना आपके दिमाग में हैं जिसे भविष्य में आप करना चाहते हैं?

आजकल मॉडर्न शब्द बहुत प्रचलित है। मॉडर्न का मतलब है पहले की तरह नहीं, बल्कि कुछ अलग। इस तरह की हमारी एक कल्पना है प्रोग्रेस को लेकर। आदमी के नीचे से ऊपर जाने की कल्पना। जैसे बच्चा पहले घर में घूमेगा, बड़ा होकर बाहर जाएगा। फिर गांव के बाहर जाएगा।जंगल में भी जा सकता है। पहाड़ पर भी चढ़ सकता है। वह अंतरिक्ष में भी जाएगा। इस तरह की आदमी की विकास यात्रा को लेकर एक सोच है जिस पर काम करना है।

कुछ आम लोगों की मूर्तियां भी बनाईं? जैसे किसी आम बच्चे, बूढ़े, महिला की अथवा किसी किसान-आदिवासी की?

ऐसा कुछ खास नहीं बनाया। अपने माता-पिता की और अपने एक रिश्तेदार के बच्चे की मूर्तियां बनाई है। भगत सिंह की मूर्ति बनाई है, जो संसद में लगी है। आईटीओ के पास एक पार्क में भी भगत सिंह की प्रतिमा लगी है। लेकिन बहुतायत में इस दिशा में काम नहीं किया है।

अगर कोई सरकार आपके सामने यह प्रस्ताव रखे कि मूर्तिकला के बारे में क्या किया जा सकता है, तो आप क्या कहेंगे?

मूर्ति कला के स्कूल खोले जाने चाहिए। जिन बच्चों के भीतर इसके गुण हों, उनको विकसित किया जाना चाहिए। कला के जितने भी रूप हैं, उन्हें आगे बढ़ाने के लिए सरकार को जरूर ही काम करना चाहिए तभी प्रतिभाएं भी सामने आ सकेंगी और अच्छे काम भी हो सकेंगे।

आपने आजाद भारत की तकरीबन सभी सरकारें देखी होंगी। किस सरकार ने इस तरह की कलाओं को आगे बढ़ाने के लिए ज्यादा काम किया?

सरकारों के बारे में तो नहीं कह सकता। हां, इस बारे में मैं हमेशा महात्मा गांधी को याद करता हूं। गांधीजी इसके बारे में हमेशा सोचते थे। वह चाहते थे कि कलाओं और कलाकारों का सम्मान हो। उनकी लगातार यह कोशिश भी रहती थी कि हर तरह की कला को आगे बढ़ाने के लिए अवसर और साधन उपलब्ध कराए जाने चाहिए। इसीलिए मेरे मन में सबसे पहले गांधीजी की मूर्ति बनाने की इच्छा थी। वह बनाई और संसद परिसर में लगी भी। मैंने गांधीजी की दो मूर्तियां बनाई। एक चलते हुए और एक बैठे हुए। गांधीजी का एक बड़ा मंत्र था अश्पृश्यता निवारण। उसको ध्यान में रखकर गांधीजी और दो गरीब बच्चों - एक लड़का और एक लड़की के साथ एक खड़ी मूर्ति बनाई थी। बैठी हुई मूर्ति को मोरारजी देसाई ने पास किया था। फिर इंदिराजी ने पास किया। ये शांति का संदेश देने वाली मूर्ति है और मैं कह सकता हूं कि गांधीजी के शांति के विचार से ही दुनिया में शांति आ सकती है।

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