गुरुदत्त: एक बेचैन और काबिल फिल्म मेकर, जो आज भी अबूझ पहेली है

ये जानना बहुत मुश्किल था कि गुरुदत्त के मन में क्या चल रहा है। ये बेचैन और काबिल शख्सियत अपने तनावपूर्ण वैवाहिक रिश्ते, वहीदा रहमान के साथ अपने पेचीदा लगाव के बीच अपनी रचनात्मक ऊर्जा और भावनात्मक आवेग के बीच तालमेल ना बैठा पाया। आज गुरुदत्त का जन्मदिन है।

“मुझे किसी इंसान से कोई शिकायत नहीं है...मुझे शिकायत है समाज के उस ढांचे से जो इंसान से उसकी इंसानियत छीन लेता है...मुझे शिकायत है उस संस्कृति से जहाँ मुर्दों को पूजा जाता है और जिंदा इंसान को पैरों तले कुचला जाता है...जहाँ किसी के दुःख दर्द पे दो आंसू बहाना बुजदिली समझा जाता है...ऐसे माहौल में मुझे कभी शांति नहीं मिलेगी...’

फिल्म ‘प्यासा’ का ये संवाद गुरु दत्त की शख्सियत के एक अहम् हिस्से को बयान करता है, जिनकी सपनीली आँखें एक हलकी सी मुस्कराहट से दमक उठती थीं। 9 जुलाई 1925 को जन्मे गुरु दत्त को अपने बचपन में माँ-बाप के तनावपूर्ण रिश्तों का ताप झेलना पड़ा। लगता है इसका असर उनकी बेचैन शख्सियत पर ताउम्र रहा। आज तक उनकी शख्सियत फिल्म इंडस्ट्री के लोगों, फिल्मों के समीक्षकों और जानकारों और प्रशंसकों के लिए भी एक पहेली ही रही है।

अपने काम में नुक्ता चीनी करने की हद तक वो पूर्णता वादी थे। हर चीज़ ठीक वैसे ही होनी चाहिए जैसा वो चाहते हैं, वरना वो उसे बीच में ही छोड़ देते थे। फिर वो चाहें फिल्म का एक विजुअल हो, स्क्रिप्ट हो या संगीत। लेकिन दिक्कत ये थी कि वो खुद ये ठीक ठीक नहीं जानते थे कि वो क्या चाहते हैं। नसरीन मुन्नी कबीर ने गुरु दत्त की जीवनी गुरुदत्त: अ लाइफ इन सिनेमा में इस बात का ज़िक्र किया है।

लेकिन हाँ, अगर एक बार उन्हें कोई दृश्य, या एक ख़ास तरह की लाइटिंग पसंद आ गयी तो वो दिनों दिन जुट जाते थे, उसी इफेक्ट को कैमरे के ज़रिये परदे पर लाने में।

उनके ख़ास कैमरा मैन वी के मूर्ति ने एक बार अपना अनुभव बताया था कि किस तरह फिल्म कागज़ के फूल के मशहूर गाने ‘वक्त ने किया, क्या हसीं सितम..’ को फिल्माया गया था.

एक बार फिल्म की पूरी टीम स्टूडियो में बैठी फिल्म पर चर्चा कर रही थी कि गुरुदत्त ने स्टूडियो की छत में एक छोटी सी दरार से आते रौशनी के एक गोले को देखा और तुरंत पूछा ‘इस तरह की रौशनी कैसे क्रिएट की जा अक्ती है?”

मूर्ति ने कहा, “अरे, छत पर कोई छोटा सा छेद होगा जब सूरज एक ख़ास जगह पर पहुंचता होगा तो उस दरार से निकल कर इस तरह की रोश्नी आती होगी..”

अब गुरुदत्त को धुन चढ़ गयी कि उसी तरह का इफ़ेक्ट इस गाने के लिए परदे पर क्रिएट करना है. अब सारी टीम इसी उधेड़बुन में लग गयी कि ऐसी लाइटिंग कैसे की जाये. बहुत मगजमारी और काफी दिनों के बाद ये जुगत लगायी गयी कि शीशे का इस्तेमाल करके रौशनी के परावर्तन से इस तरह की लाइटिंग की जा सकती है। और इस तरह इस गाने को इतनी ख़ूबसूरती से फिल्माया गया जिसकी मिसाल आज तक दी जाती है।

गुरुदत्त क्लोज अप और सुन्दर लाइटिंग के उस्ताद के तौर पर मशहूर हैं। सिर्फ गुरुदत्त और ऋत्विक घटक ही शायद ऐसे भारतीय फिल्म निर्देशक हैं जो मेलोड्रामा का बखूबी इस्तेमाल कर सके और कमर्शियल सिनेमा में कलात्मक फिल्मे बना सके।

गुरुदत्त हिंदी सिनेमा में ना सिर्फ क्राइम थ्रिलर लाने वाले पहले निर्देशक थे बल्कि ‘जाल’ में एंटी हीरो को भी सबसे पहले वही लेकर आये। लेकिन उन फिल्मों के बारे में लोगों को ज्यादा जानकारी नहीं है जिनकी शुरुआत तो उन्होंने की लेकिन बीच में ही छोड़ दिया। उनमे से कुछ पर तो बाद में हिट फ़िल्में भी बनायीं गयीं।

इन फिल्मों में सबसे अहम् है विल्की कॉलिंस के उपन्यास ‘द वुमन इन वाइट’ पर आधारित फिल्म जिसे गुरुदत्त, सुनील दत्त और वहीदा रहमान को लेकर बनाना चाहते थे। उन्होंने फिल्म की शुरुआत भी कर दी थी लेकिन उसे बीच में ही छोड़ दिया क्योंकि वे फिल्म की शूटिंग से संतुष्ट नहीं थे। बाद में यही फिल्म ‘वो कौन थी’ नाम से राज खोसला ने साधना और मनोज कुमार को लेकर बनायी और ये फिल्म बड़ी हिट साबित हुयी।

ऐसी ही फिल्म थी ‘गौरी’ जो वे अपनी पत्नी गीता दत्त के साथ बनाना चाहते थे। फिल्म की कहानी दिलचस्प थी और अगर ये फिल्म बनती तो भारत की पहली सिनेमास्कोप फिल्म यही होती। वैसे पहली सिनेमास्कोप फिल्म होने का श्रेय भी गुरुदत्त की कागज़ के फूल’ को ही है।

ऐसी ही फिल्म थी प्रोफेसर जिसे पहले गुरुदत्त ने किशोर कुमार और वहीदा रहमान के साथ शुरू किया था लेकिन बीच में ही छोड़ दिया। 1962 में लेख टंडन ने इसी फिल्म को शम्मी कपूर के साथ बनाया और ये फिल्म भी हिट हुयी. यही हश्र ‘कनीज़’ ‘पिकनिक’ और मोती की मौसी’ का हुआ. फ़िल्में शुरू तो हुयी पर अंजाम तक ना पहुँच सकीं।

ये जानना बहुत मुश्किल था कि गुरुदत्त के मन में क्या चल रहा है. ये बेचैन और काबिल शख्सियत अपने तनावपूर्ण वैवाहिक रिश्ते, वहीदा रहमान के साथ अपने पेचीदा लगाव के बीच झूलता रहा और अपनी रचनात्मक ऊर्जा और भावनात्मक आवेग के बीच तालमेल ना बैठा पाया. आखिरकार, 10 अक्टूबर 1964 को उन्होंने इस दुनिया को अलविदा कह दिया.

‘नादान तमन्ना रेती में, उम्मीद की कश्ती खेती है/ इक हाथ से देती है दुनिया, सौ हाथों से लेती है/ ये खेल है कब से जारी/ बिछड़े सभी, बिछड़े सभी बारी बारी...’

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