हम हैं कामयाब-16: ‘फ़रीदिया चाइल्ड केयर सेंटर एंड हॉस्पिटल’ ने सेवा-भाव के आधार पर तय किया सफलता का सफर

डॉ. तनवीर फ़रीदी कहते हैं कि ‘‘चिकित्सा पेशा पूरी तरह से जनसेवा है। जिसे जनसेवा करनी हो, उसी को यह पेशा अपनाना चाहिए। मेडिकल प्रोफेशन को व्यापार समझना ही गलत है।’’

फ़रीदिया चाइल्ड केयर सेंटर एंड हॉस्पिटल के संस्थापक डॉ. तनवीर फ़रीदी अलीग
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डॉ. तनवीर फ़रीदी रोजाना 10 बजे सुबह जब अपने अस्पताल पहुंचते हैं तो कई माताएं अपने बीमार बच्चों को लेकर ‘फ़रीदिया चाइल्ड केयर सेंटर एंड हॉस्पिटल’ में पलकें बिछाए उनका इंतजार कर रही होती हैं। उस समय उन माताओं की हालत देखकर वास्तविक अर्थों में इस बात का एहसास होता है कि डॉक्टर इस दुनिया में फरिश्तों का ही एक रूप हैं। डॉक्टर्स एक माध्यम हैं, जिसके द्वारा अल्लाह मरीजों को शिफ़ा देता है, यानी रोगमुक्त करता है। डॉक्टर फ़रीदी को वे हजारों माताएं फरिश्ता ही मानती हैं, जिनके बच्चे समय पर अच्छे इलाज से आज इस दुनिया में सांस ले रहे हैं।

हम हैं कामयाब-16: ‘फ़रीदिया चाइल्ड केयर सेंटर एंड हॉस्पिटल’ ने सेवा-भाव के आधार पर तय किया सफलता का सफर

डॉ. तनवीर फ़रीदी अलीग ने बिहार के बक्सर में ‘फ़रीदिया चाइल्ड केयर सेंटर एंड हॉस्पिटल’ की स्थापना जब 2006 में की थी, तब यह इस जिले का ऐसा पहला अस्पताल था जहां ‘नियोनेटल इंटेंसिव केयर यूनिट’ (एनआईसीयू) मौजूद हो। बच्चों के किसी भी अस्पताल में एनआईसीयू का महत्व इसलिए बहुत अधिक है, क्योंकि समय से पहले पैदा होने वाले बच्चों को अधिकांश आधुनिक उपकरणों पर आधारित विशेष उपचार की आवश्यकता होती है। जन्म के समय कम वजन वाले और सांस लेने में कठिनाई का सामना करने वाले बच्चों को भी एनआईसीयू की आवश्यकता पड़ती है। यही वजह है कि ‘फ़रीदिया चाइल्ड केयर सेंटर एंड हॉस्पिटल’ की स्थापना के बाद बक्सर और आसपास के लोगों को बहुत सुविधाएं मिलीं। डॉक्टर फ़रीदी बताते हैं कि 20 साल पहले सेवा-भाव के साथ एक छोटा-सा अस्पताल खोला था, जो धीरे-धीरे विस्तार करता गया। वे इस बात से बेहद खुश नजर आते हैं कि बच्चों का इलाज कर उन्हें न केवल हार्दिक संतोष मिल रहा है, बल्कि अल्लाह ने अपार सम्मान से भी नवाजा है।

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यह अस्पताल आज सफलता के साथ चल रहा है, लेकिन कोई भी सफलता यूं ही प्राप्त नहीं हो जाती। डॉ. तनवीर फ़रीदी को भी इसके लिए काफी त्याग करना पड़ा। यहां यह बताना अनावश्यक नहीं होगा कि उनकी शादी 2004 में हुई, और उसके 2 साल बाद ही उन्होंने चाइल्ड केयर सेंटर की स्थापना कर खुद को पूरी तरह इसमें झोंक दिया। 5 कर्मचारियों के साथ शुरू किए गए इस चाइल्ड केयर सेंटर में वे दिन-रात व्यस्त रहते थे, जिसकी वजह से परिवार के लोगों को समय नहीं दे पाते थे। डॉक्टर फ़रीदी मुस्कुराते हुए बताते हैं कि कई बार उनकी पत्नी नुसरत परवीन ने परिवार को समय न देने पर शिकायत की, लेकिन हर कठिन समय में हौसला भी उन्होंने ही बढ़ाया। वे अपनी पत्नी के इस सहयोग के लिए बेहद आभारी भी नजर आए कि घर की अधिकांश जिम्मेदारियां उन्होंने संभालीं और बच्चों की अच्छी परवरिश भी की। यदि उनका सहयोग प्राप्त न होता तो शायद मुश्किलें और बढ़ जातीं।

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जब डॉक्टर फ़रीदी से यह जानने की कोशिश की गई कि उन्होंने बक्सर में ही यह चाइल्ड केयर सेंटर क्यों खोला, तो वे बताते हैं कि उन्होंने अपना बचपन यहीं बिताया है और बच्चों का कोई अच्छा अस्पताल न होने की कसक वे हमेशा महसूस करते थे। वे यह भी बताते हैं कि कई बार उन्होंने अपने पिता डॉ. जुबैर अहमद फ़रीदी ‘दर्द’ के साथ इस बारे में विचार-विमर्श किया, और जब 2005 में चाइल्ड केयर सेंटर खोलने का पक्का इरादा किया तो पिता ने ही 1 कट्ठा ज़मीन पर एक भवन का निर्माण कराया। यानी ‘फ़रीदिया चाइल्ड केयर सेंटर एंड हॉस्पिटल’ की नींव डॉ. जुबैर अहमद फ़रीदी ने रखी थी, जो स्वयं भी आरएमपी डॉक्टर थे। दिलचस्प बात यह है कि डॉ. जुबैर फ़रीदी चिकित्सा पेशे के साथ-साथ साहित्य से भी बेहद लगाव रखते थे। उनकी गजलों का एक संग्रह ‘दियार-ए-दर्द’ के नाम से प्रकाशित भी हो चुका है। डॉ. जुबैर ने 2024 में इस नश्वर संसार को अलविदा कह दिया, लेकिन डॉ. तनवीर फ़रीदी का कहना है कि अस्पताल में जब वे बैठते हैं तो महसूस होता है जैसे पिता का स्नेहिल हाथ अब भी उनके सर पर मौजूद है।

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‘नवजीवन’ से बातचीत के दौरान डॉ. तनवीर फ़रीदी चिकित्सा पेशे की मौजूदा स्थिति पर बेहद चिंतित नजर आए। उन्होंने कहा कि इस पेशे को कुछ लोगों ने ‘व्यापार’ समझ लिया है, जो दुखद है। वे कहते हैं कि ‘‘चिकित्सा पेशा पूरी तरह से जनसेवा है। जिसे जनसेवा करनी हो, उसी को यह पेशा अपनाना चाहिए। मेडिकल प्रोफेशन को व्यापार समझना ही गलत है।’’ उनका मानना है कि जब आप सेवा-भाव लेकर मरीजों का इलाज करते हैं तो आपके भीतर एक सकारात्मक ऊर्जा पैदा होती है। आपके मन में जनसेवा होगी, तभी आप खुलकर मरीज की सेवा कर पाएंगे, उनका सस्ता इलाज कर पाएंगे और लूटपाट से दूर रहेंगे। इस तरह आपको मानसिक शांति भी मिलेगी और संतोष भी होगा। आपको यह एहसास होगा कि आप अपने जीवन को सही दिशा में ले जा रहे हैं। डॉक्टर फ़रीदी इस बात पर दुख व्यक्त करते हैं कि देश में लगभग 90 प्रतिशत डॉक्टरों ने लूट मचा रखी है, जिससे गरीब और मध्यम वर्ग के मरीजों को गहने और घर तक बेचने की नौबत का सामना करना पड़ता है। डॉक्टरों को यह समझने की जरूरत है कि अल्लाह ही रोज़ी (आजीविका) देने वाला है, और जिसकी किस्मत में जो लिख दिया गया है, वह जरूर मिलेगा। ऐसे में पैसों की लूटमार छोड़कर मरीजों की सेवा करके दुआएं लेनी चाहिए।

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डॉ. तनवीर फ़रीदी इस समय लगभग 25 कर्मचारियों के साथ ‘फ़रीदिया चाइल्ड केयर सेंटर एंड हॉस्पिटल’ में अपनी सेवाएं दे रहे हैं। चाइल्ड केयर सेंटर का भवन भी अब 3 मंजिला हो चुका है और लोगों की भीड़ भी खूब देखने को मिलती है। क्षेत्र में डॉक्टर फ़रीदी के इलाज के तरीके, ईमानदार व्यवहार और मिलनसार स्वभाव की खूब चर्चा होती है। इसके लिए वे अपनी मां का शुक्र अदा करते हैं जिन्होंने उनकी परवरिश धार्मिक माहौल में की। वे कहते हैं कि ‘‘मां की अच्छी परवरिश के कारण ही मेरे भीतर जनसेवा का भाव पैदा हुआ। भागदौड़ भरी इस जिंदगी में कभी जब निराशा मुझे अपने घेरे में लेती है तो मैं उन्हें याद करता हूं। उनकी बातें और शिक्षा मुझे हमेशा सीधा रास्ता दिखाती हैं। उन्होंने हमेशा नमाज़ की पाबंदी के लिए कहा, और आज भी मैं अपनी व्यस्तताओं में से समय निकालकर पास की मस्जिद में नमाज पढ़ने जाता हूं। थोड़े समय के इस विराम से ताजगी का एहसास होता है और इलाज में भी एकाग्रता प्राप्त होती है।’’

हम हैं कामयाब-16: ‘फ़रीदिया चाइल्ड केयर सेंटर एंड हॉस्पिटल’ ने सेवा-भाव के आधार पर तय किया सफलता का सफर

50 वर्षीय डॉ. तनवीर फ़रीदी अब इस चिंता में रहते हैं कि उनके बाद इस चाइल्ड केयर सेंटर को कौन चलाएगा! उनके जुड़वां बच्चे (बेटा रेहान तनवीर और बेटी अलमास तनवीर) लगभग 20 साल के हो चुके हैं, लेकिन रेहान की चिकित्सा में रुचि नहीं है। डॉक्टर तनवीर चाहते थे कि बेटा उनकी विरासत को आगे बढ़ाए, लेकिन बेटे की इच्छा का सम्मान करते हुए उसे पसंद का विषय पढ़ने की अनुमति दी। आज रेहान तनवीर बीबीए की शिक्षा प्राप्त कर रहे हैं। सुखद बात यह है कि बेटी अलमास तनवीर ने चिकित्सा की ओर कदम बढ़ा दिए हैं। वह नीट की तैयारी कर रही है, जिससे डॉ. तनवीर फ़रीदी के सपनों को पंख लग गए हैं। वे अपनी बेटी के लिए खूब दुआएं करते हैं और इस बात से बेहद खुश हैं कि अलमास ने अपनी इच्छा से चिकित्सा पेशा अपनाने की योजना बनाई है।

बहरहाल, डॉ. तनवीर फ़रीदी इस समय पूरी तन्मयता के साथ जनसेवा में व्यस्त हैं। उन्हें बच्चों का इलाज करके बहुत शांति मिलती है। वे कहते हैं कि उन्हें कभी भी सर्जन बनना पसंद नहीं था, वे हमेशा से नवजात बच्चों की जान बचाना चाहते थे। आज जब वे माताओं को अस्पताल से स्वस्थ बच्चा और चेहरे पर खुशी लिए हुए जाते देखते हैं, तो जिस संतोष का एहसास होता है, उसे शब्दों में बयान नहीं किया जा सकता।

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