हम हैं कामयाब-20: ‘मदरसा तहफ़ीज़ुल क़ुरआन’ गरीबों और मुफलिसों में फैला रहा धार्मिक और आधुनिक शिक्षा का प्रकाश
शैक्षणिक संस्थान ‘मदरसा तहफ़ीज़ुल क़ुरआन’ की स्थापना के पीछे केवल मौलाना इकरामुल हक़ क़ासमी का संघर्ष नहीं है, बल्कि एक दिलचस्प सोच भी शामिल है।

प्रसिद्ध कहानीकार सआदत हसन मंटो ने कहा है “अज्ञानता केवल तभी दूर हो सकती है, जब शिक्षण संस्थानों के सभी दरवाजे जनता के लिए खोल दिए जाएं।” इसी तरह महान दार्शनिक और शिक्षाविद् डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन का कथन है कि “शिक्षक वह नहीं है जो विद्यार्थी के मस्तिष्क में किसी बात को जबरन ठूंस दे, बल्कि सच्चा शिक्षक तो वह है जो उसे आने वाले कल की चुनौतियों के लिए तैयार करे।” ऐसे समय में, जब शिक्षा ने व्यापार का रूप धारण कर लिया है, बहुत कम लोग ऐसे हैं, जो इन कथनों के महत्व को समझते हैं। इन्हीं लोगों में एक मौलाना इकरामुल हक़ क़ासमी हैं, जिन्होंने अथक प्रयासों के बाद ‘मदरसा तहफ़ीज़ुल क़ुरआन’ के नाम से ऐसा शैक्षणिक संस्थान स्थापित किया, जो पिछले 8 वर्षों से सामान्य लोगों के बीच ज्ञान का प्रकाश फैला रहा है। यह शैक्षणिक संस्थान बिहार राज्य के अररिया जिले के बाबुआन गांव (वार्ड संख्या 2, पोस्ट बस्मतिया) में स्थित है और यहां धार्मिक शिक्षा के साथ-साथ गुणवत्तापूर्ण आधुनिक शिक्षा की भी विशेष व्यवस्था है।
इस संस्थान की स्थापना के पीछे केवल मौलाना इकरामुल हक़ क़ासमी का संघर्ष ही नहीं है, बल्कि एक दिलचस्प सोच भी शामिल है। संभवतः 2009 की बात है, जब मौलाना इकरामुल हक़ ने दिल्ली में ‘अल-क़ुरआन एकेडमी ट्रस्ट’ की स्थापना करने के बाद क़ुरआन का अनुवाद पढ़ाने में स्वयं को व्यस्त कर लिया था। उस समय जब वह होटलों में छोटे बच्चों को काम करते देखते, तो यह सोचकर बहुत दुखी होते थे कि शिक्षा प्राप्त करने और खेलने की उम्र में उन्हें काम करना पड़ रहा है। उन्होंने कुछ मित्रों से परामर्श और सहयोग के बाद ऐसे बच्चों को होटलों में ही पढ़ाने की योजना बनाई। एक समय ऐसा भी था, जब 5 शिक्षकों को नियुक्त करके अलग-अलग होटलों में वहां काम करने वाले बच्चों को धार्मिक शिक्षा दी जाने लगी। उनका प्रयास था कि इस सिलसिले को आगे बढ़ाया जाए, ताकि गरीबी के कारण धार्मिक शिक्षा से अनजान बच्चों को इस्लाम धर्म के करीब लाया जा सके। लेकिन कुछ होटल मालिकों की नाराजगी और कुछ बच्चों की अरुचि ने उनका हौसला पस्त कर दिया। हालांकि, इस टूटे हुए हौसले ने प्रकाश की एक नई खिड़की खोल दी। एक नई योजना तैयार हुई और वह योजना थी एक शैक्षणिक संस्थान स्थापित करके गरीब तबके के बच्चों को बेहद कम खर्च में गुणवत्तापूर्ण शिक्षा दिलाने की। ऐसा संस्थान अस्तित्व में लाने की योजना, जहां इन बच्चों के रहने और भोजन की भी व्यवस्था हो और व्यवस्थित तरीके से धार्मिक एवं आधुनिक शिक्षा का प्रकाश भी फैलाया जाए
यह योजना 2012 में बनी, जब होटलों में बच्चों को शिक्षा देने का लगभग 3 वर्ष पुराना सिलसिला समाप्त हो गया। तत्काल पहला कदम यह उठाया गया कि बाबुआन गांव में लगभग साढ़े तीन कट्ठा जमीन खरीदी गई। यदि आप यह सोच रहे हैं कि मौलाना इकरामुल हक़ क़ासमी आर्थिक रूप से मजबूत थे, इसलिए आसानी से अपनी योजना को साकार करते चले गए, तो आप गलत हैं। यह मुस्लिम बच्चों को शिक्षा के क्षेत्र में आगे बढ़ाने और अशिक्षा के भंवर से निकालने का उनका जज्बा ही था कि वह अपने मित्रों और परिचितों की मदद से आगे बढ़ते गए। यदि उनकी आर्थिक स्थिति से जुड़े संघर्ष को यहां प्रस्तुत किया जाए, तो एक अलग कहानी सामने आएगी। बस इतना समझ लीजिए कि 2006 से 2012 के बीच उन्हें बेहद तंगी का सामना करना पड़ा और बड़ी मुश्किल से दिन गुजर रहे थे। आप कह सकते हैं कि ईश्वर ने उन्हें निष्ठा और सद्भावना का ऐसा जज्बा दिया था, जिसने मुश्किल समय में भी उनके कदमों को डगमगाने नहीं दिया। 2010 के बाद मौलाना इकरामुल हक़ की आर्थिक स्थिति धीरे-धीरे बेहतर होने लगी थी और 2012 तक उन्होंने स्वयं को इस योग्य बना लिया था कि एक शैक्षणिक संस्थान स्थापित करके उसका प्रबंधन और संचालन देख सकें।
मैं आपको यह बताना तो भूल ही गया कि मौलाना इकरामुल हक़ क़ासमी का जन्म भी बाबुआन में ही हुआ था और इसी कारण उन्होंने सोचा कि क्यों न इस नेक काम की शुरुआत अपने ही गांव से की जाए। 1979 में जन्म के बाद उन्होंने अपना बचपन इसी गांव में बिताया। फिर उच्च शिक्षा प्राप्त करने के उद्देश्य से ऐतिहासिक संस्थान दारुल उलूम देवबंद में प्रवेश लिया। वहां से 1998 में फ़ाज़िल की उपाधि प्राप्त कर उन्होंने शिक्षा पूरी की और उसके बाद से वह शिक्षण एवं अध्ययन के क्षेत्र में सक्रिय रूप से लगे हुए हैं। दारुल उलूम देवबंद में रहकर उन्होंने जो कुछ पढ़ा और सीखा, उसी का प्रचार-प्रसार अपना उद्देश्य बनाकर उन्होंने 1999 में राजस्थान के एक मदरसे में पहली नौकरी की। 2005 में वह दिल्ली आए, जहां ‘मदरसतुल-बनात’ में शिक्षक नियुक्त हुए और सहीह बुखारी तथा सहीह मुस्लिम का पाठ पढ़ाने लगे। यहां एक वर्ष ही बीता होगा कि मौलाना अब्दुल करीम पारिख द्वारा संचालित कार्यक्रम ‘200 घंटों में क़ुरआन का अनुवाद सीखें’ से प्रभावित होकर उन्होंने क़ुरआन का अनुवाद सिखाने की कक्षाएं शुरू करने का विचार किया। अरबी के कुछ विशेषज्ञों ने मिलकर एक टीम बनाई और फिर 200 घंटों में क़ुरआन का अनुवाद सिखाने का कार्य शुरू हो गया। जल्द ही मौलाना इकरामुल हक़ क़ासमी ने महसूस किया कि स्वयं एक संस्थान बनाकर क़ुरआन का अनुवाद सिखाया जाए और फिर ‘अल-क़ुरआन एकेडमी ट्रस्ट’ अस्तित्व में आया। वह बताते हैं कि 2009 में अल-क़ुरआन एकेडमी ने औपचारिक रूप से 200 घंटों में क़ुरआन का अनुवाद सिखाने का काम शुरू कर दिया और यह प्रक्रिया 11 महीनों में पूरी हो जाती है। यानी यह संस्थान एक वर्ष के भीतर क़ुरआन का अनुवाद सिखाने का कार्य करता है और यह सिलसिला अब भी जारी है। वर्तमान में इस संस्थान में लगभग 500 विद्यार्थी क़ुरआन का अनुवाद सीख रहे हैं।
‘मदरसा तहफ़ीज़ुल क़ुरआन’ की स्थापना में मौलाना इकरामुल हक़ को ‘अल-क़ुरआन एकेडमी ट्रस्ट’ से प्राप्त अनुभवों का बहुत लाभ मिला। साथ ही उन्हें दो असफलताओं से प्राप्त अनुभवों का भी लाभ हुआ। पहली असफलता होटलों में बच्चों को पढ़ाने का सिलसिला समाप्त होना है, और दूसरी असफलता विधवाओं तथा अनाथों को पका हुआ भोजन निःशुल्क उपलब्ध कराने से जुड़ी है। दरअसल, 2010 के आसपास ही मौलाना इकरामुल हक़ ने अपने कुछ संपन्न मित्रों के साथ मिलकर विधवाओं और अनाथों के लिए पका हुआ भोजन तथा सूखा राशन बांटने का सिलसिला शुरू किया था। इसके लिए दिल्ली में दो रसोइये और भोजन बांटने के उद्देश्य से कुछ लोगों को नियुक्त किया गया था। दिल्ली की सैकड़ों जरूरतमंद महिलाएं इससे लाभान्वित होती थीं। समय बीतने के साथ पका हुआ भोजन बांटने में कई तरह की जटिलताएं सामने आने लगीं, जिसके कारण कुछ वर्षों में यह सिलसिला बंद हो गया। हालांकि, सूखा राशन बांटने का सिलसिला अब भी जारी है, लेकिन यह 35-40 विधवा महिलाओं तक सीमित हो गया है। अच्छी बात यह है कि इस योजना से लाभान्वित होने वाली ये महिलाएं केवल दिल्ली से ही नहीं, बल्कि बिहार और पश्चिम बंगाल से भी संबंध रखती हैं।
बहरहाल, मौलाना इकरामुल हक़ क़ासमी ने अपनी सफलताओं और असफलताओं से प्राप्त अनुभवों को ध्यान में रखते हुए अपना अधिकांश ध्यान धन जुटाने पर लगाया। 2012 से 2017 के बीच वह लोगों से मिलते रहे और उन्हें अपनी योजनाओं के बारे में बताते रहे। भागदौड़ का लाभ मिला और इतनी राशि एकत्र हो गई कि भवन का निर्माण शुरू किया जा सके। इस कार्य में उनके करीबी मित्रों के साथ-साथ ऐसे परिचितों ने भी सहायता की, जो विदेशों में काम कर रहे हैं। पर्याप्त धन एकत्र होने के बाद जब ‘मदरसा तहफ़ीज़ुल क़ुरआन’ का 16 कमरों वाला भवन 2018 में तैयार हुआ, तो एक सादे लेकिन गरिमापूर्ण समारोह के माध्यम से नेक काम की शुरुआत भी हो गई। शुरु में लगभग 35 बच्चों के लिए दो शिक्षक नियुक्त किए गए, लेकिन बाद में बच्चों की बढ़ती संख्या को देखते हुए शिक्षकों की संख्या भी बढ़ाई गई। आवश्यकता को ध्यान में रखते हुए 2019 तक भवन की पहली मंजिल भी तैयार हो गई। फिर वह दौर आया, जब कोरोना ने पूरी दुनिया को तहस-नहस कर दिया। लॉकडाउन और लोगों के बीच शारीरिक दूरी ने ‘मदरसा तहफ़ीज़ुल क़ुरआन’ के प्रबंधन को भी प्रभावित किया, लेकिन मौलाना इकरामुल हक़ ने इस कठिन समय में बेहद समझदारी का परिचय दिया। उन्होंने अपने-अपने घर लौट चुके शिक्षकों के लिए इंटरनेट की व्यवस्था की और जिन बच्चों के पास स्मार्टफोन नहीं थे, उन्हें स्मार्टफोन उपलब्ध कराए। इस तरह उन्होंने किसी भी प्रकार से शिक्षा का नुकसान नहीं होने दिया। मौलाना इकरामुल हक़ बताते हैं कि “हम लोग हमेशा स्थानीय थाने के संपर्क में रहते थे। जब भी लॉकडाउन की घोषणा हुई, सभी शिक्षकों और बच्चों को घर भेज दिया गया। लॉकडाउन समाप्त होने के बाद स्थानीय प्रशासन जितने लोगों को एक जगह रहने की अनुमति देता था, उतने ही शिक्षकों और बच्चों को बुलाया जाता था।”
‘मदरसा तहफ़ीज़ुल क़ुरआन’ में 2019 से आधुनिक शिक्षा की भी व्यवस्था की जानी थी, लेकिन कोरोना के कारण इसमें देरी हुई। 2022 में इस शैक्षणिक संस्थान ने पहली से आठवीं कक्षा तक सीबीएसई बोर्ड की शिक्षा देनी शुरू की और अब यहां विद्यार्थियों की संख्या तेजी से बढ़ रही है। वर्तमान में यहां लगभग 400 बच्चे शिक्षा प्राप्त कर रहे हैं, जिनमें 318 बच्चों के रहने और भोजन की व्यवस्था है। इन बच्चों को पढ़ाने के लिए वर्तमान समय में 21 शिक्षक और देखभाल के लिए लगभग एक दर्जन कर्मचारियों की सुविधा उपलब्ध कराई गई है। खास बात यह है कि मौलाना इकरामुल हक़ ने अपनी देखरेख में ‘मदरसा तहफ़ीज़ुल क़ुरआन’ को सफलता की राह पर आगे बढ़ाकर अब स्वयं को अन्य सेवाओं में व्यस्त कर लिया है। उनका अधिकांश समय दिल्ली में ही बीतता है, लेकिन बाबुआन में मौजूद मौलाना अख्तर हुसैन (मदरसे के प्रबंधक), मौलाना क़मरुज़्ज़मां नोमानी (प्रधान शिक्षक) और मुफ्ती अब्दुल हसीब (शिक्षा प्रभारी) ने ‘मदरसा तहफ़ीज़ुल क़ुरआन’ की जिम्मेदारी अच्छी तरह संभाल ली है। यदि कोई कठिनाई आए या सलाह-मशविरा करना हो, तो मौलाना इकरामुल हक़ फोन पर हमेशा उपलब्ध रहते हैं। अक्सर वह बाबुआन का दौरा भी करते हैं और अब उनका इरादा अपने पैतृक गांव में लड़कियों के लिए विशेष शैक्षणिक संस्थान बनाने का है। सुखद बात यह है कि उन्होंने इस उद्देश्य से जमीन का एक टुकड़ा खरीद भी लिया है। यानी एक नई यात्रा की शुरुआत हो चुकी है और मौलाना इकरामुल हक़ क़ासमी दुआओं के आकांक्षी हैं।
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