इंदिरा गांधी: संवेदनशीलता, हाजिर जवाबी और शासन क्षमता की मिसाल

इंदिरा जी अक्सर बहुत चतुराई के साथ अपनी बातें कह जाती थीं। एक बार उन्होंने टिप्पणी की थी कि हमारे निजी उद्यम में आम तौर पर उद्यमशीलता की तुलना में निजीपन अधिक है।

नवजीवन डेस्क

इंदिरा जी नम्र और मिलनसार थीं और इसीलिए वह काफी लोकप्रिय भी थीं। उनके विरोधी रहे लोग भी उनके गुणों से परिचित थे और वे आज भी उन्हें बहुत विनम्रता के साथ याद करते हैं। लेकिन इंदिरा जी जरूरत पड़ने पर राजनीतिक-शासकीय फैसले लेते समय उतनी ही कठोर हो जाती थीं। लोकतंत्र और धर्मनिरपेक्षता बनाए रखने संबंधी उनके कई निर्णयों ने दूरगामी असर डाला। बांग्लादेश की आजादी के लिए तो उन्हें भुलाना असंभव ही है।

बीजेपी नेता सुषमा स्वराज इंदिरा जी को कुछ इस तरह याद करती हैं, “जिस वक्त मैं फतेहपुर में थी, श्रीमती इंदिरा गांधी भी वहीं थीं। (जनता पार्टी में) हम लोगों के पास कोई संसाधन तो थे नहीं, इसलिए मैंने अपने लोगों से माइक लगी जीप और श्रीमती गांधी के कार्यक्रम की कॉपी का बंदोबस्त करने को कहा।” इसकी वजह भी उन्होंने बताई। इंदिरा जी जहां भी सभाएं करतीं, बस कुछ मिनट बाद ही सुषमा वहां पहुंच जातीं। सुषमा बताती हैं, “मैं वहां तर्क-वितर्क करती। जनता जरा भी नहीं हिलती थी। बड़ा तमाशा हो जाता था।”

एक बार दिल्ली आने के लिए दोनों एक ही ट्रेन में सवार हुए। दोनों के समर्थकों ने नारे लगाए। संयोगवश सुषमा उसी डिब्बे में सवार हो गईं जो इंदिरा जी और उनकी पार्टी के लोगों के लिए रिजर्व था। सुषमा याद करती हैं, “मैं जिस कंपार्टमेंट में थी, उसमें युवक कांग्रेस के तीन लोग भी थे। उनकी मूंछें बड़ी-बड़ी थीं। मैं थोड़ा डरा हुआ महसूस कर रही थी।”

लेकिन उन्हें चिंता करने की जरूरत नहीं थी। कानपुर में जब इंदिरा जी के लिए डिनर परोसा गया, तो उन्होंने अपने साथ चल रहीं गांधीवादी नेता श्रीमती निर्मला देशपांडे को खाना लेकर सुषमा के पास भेजा। सुषमा यह भी बताती हैं, “थोड़ी देर बाद ही निर्मला जी श्रीमती गांधी के दो सेक्योरिटी गार्ड्स के साथ लौटीं और कहा कि आप जगह बदल लें। उन्होंने मुझे बताया कि श्रीमती गांधी को महसूस हुआ कि यह बच्ची उन (मुच्छड़) लोगों के आसपास सो नहीं पाएगी, इसलिए वह दूसरे कंपार्टमेंट में चली जाएं और वहां उसे अंदर से बंद कर लें, ताकि उसे कोई परेशान नहीं करे।”

दूसरे दिन देशपांडे इंदिरा जी से एक टॉवेल लेकर आईं। इंदिरा जी चाहती थीं कि सुषमा डिब्बे से पहले ही उतर जाएं क्योंकि उनकी आगवानी करने वाली भीड़ डिब्बे में घुस आएगी।

सुषमा ने जोड़ा, “यह एक विपक्षी के साथ श्रीमती गांधी का मानवीय रवैया था। इसका मुझ पर गहरा प्रभाव पड़ा।”

वरिष्ठ पत्रकार करन थापर लिखते हैं, “कांग्रेस की कार्यकारी अध्यक्ष रहने के दौरान 1958 में इंदिरा जी येल यूनिवर्सिटी आईं और उन्होंने इलिहू येल का बड़ा-सा पोट्रेट विश्वविद्यालय को भेंट किया। येल ईस्ट इंडिया कंपनी के समय मद्रास में गवर्नर रहे थे। उस वक्त येल में ग्रेजुएट के विद्यार्थी के तौर पर मुझे उनके रिसेप्शन में उनसे मिलने का अवसर मिला। इससे पहले उन्होंने भारत की पहली पंचवर्षीय योजना पर भाषण दिया था। मैंने इस बात के लिए उनका अभिनंदन किया कि उन्होंने अपनी बातें बहुत अच्छे तरीके से रखीं और पूछा कि उन्होंने आबादी की समस्या का जिक्र क्यों नहीं किया जिसका पहली योजना में उल्लेख किया गया है। थोड़ा रुककर उन्होंने कहा, “शायद इसलिए कि मैंने अपना बचपन एक बड़े घर में बहुत अकेलेपन में बिताया है, मेरे लिए यह कल्पना करना मुश्किल है कि भारत में बहुत अधिक आबादी है।”

कांग्रेस नेता जयराम रमेश का कहना है, “श्रीमती गांधी इस बात के प्रति काफी सचेत थीं कि वे एक गरीब देश की प्रधानमंत्री हैं जहां की प्राथमिकता पर्यावरण सुरक्षा नहीं है, बल्कि नौकरियां, संस्थाओं आदि को प्राथमिकता के तौर पर देखा जाता था। अगर आज पर्यावरण की सुरक्षा के लिए मौजूद कानूनों को देखा जाए तो पता चलेगा कि सारी उनके कार्यकाल के समय आई थीं।”-

इंदिरा जी अक्सर बहुत चतुराई के साथ अपनी बातें कह जाती थीं। एक बार उन्होंने टिप्पणी की थी, “हमारे निजी उद्यम में आम तौर पर उद्यमशीलता की तुलना में निजीपन अधिक है।” 1971 में जब एक अमेरिकी पत्रकार ने उनसे पूछा कि उन्होंने पाकिस्तान के जनरल याह्या खान से मिलने से क्यों मना कर दिया, तो उन्होंने जवाब दिया, “बंधी हुई मुट्ठी के साथ हाथ नहीं मिलाया जा सकता।”

उन्होंने एक बार दबी हंसी के साथ चर्चिल के साथ हुई एक मुलाकात का जिक्र किया। चर्चिल ने एक बार उन्हें कहा था कि यह समझने में उन्हें ‘भारी परेशानी’ होती है कि उनके पिता, श्री नेहरू, अंग्रेजों के प्रति नफरत क्यों नहीं रखते। हमने उन्हें जेल में रखा, और फिर भी वह ब्रिटेन के साथ अच्छे रिश्ते बनाए हुए हैं। अगर मैं नेहरू होता, तो मैं ब्रिटेन से घृणा करता। ब्रिटेन के पूर्व प्रधानमंत्री को श्रीमती गांधी का जवाब था, “ऐसा सिर्फ इसलिए है क्योंकि हम भिन्न संस्कृति के लोग हैं।”

बहुत सालों तक उनके निजी चिकित्सक रहे डॉ केपी माथुर ने अपनी आत्मकथा में लिखा है कि 31 अक्टूबर 1984 को जब वे उनके पास पहुंचे तो वे पीटर उस्तीनोव के साथ बीबीसी साक्षात्कार के लिए तैयार हो रही थीं। माथुर ने उनसे कहा कि मैंने सुना है रोनाल्ड रीगन ने साक्षात्कारों के लिए मेक-अप कराने के लिए मना कर दिया। इस पर इंदिरा गांधी का जवाब था, “वह सिर्फ पूरा मेक-अप ही नहीं करते, बल्कि ईयर फोन भी पहनते हैं, ताकि जब पत्रकार कोई मुश्किल सवाल पूछें तो उन्हें पीछे से जवाब बताया जा सके।”

Published: 31 Oct 2018, 1:29 AM
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