इंटरव्यू: सनोबर कहकशां, एक हिंदी शिक्षक जो 7 साल की उम्र से जला रहीं शिक्षा की जोत
‘उत्क्रमित मध्य विद्यालय, मुरौवतपुर’ की स्थापना 1960 में हुई। स्कूल के लिए गांव के एक बुजुर्ग हाजी नत्थे खां ने अपनी 8 कट्ठा निजी ज़मीन दान की थी। इसकी आधी ज़मीन में स्कूल और आधी में दुर्गा मंदिर है।
सनोबर कहकशां का संक्षिप्त परिचय:
कोलंबिया में 13 नवंबर 1985 को ‘नेवाडो डेल रुइज़’ ज्वालामुखी ने भयंकर तबाही मचाई थी। इस हादसे में लगभग 25 हजार लोग मारे गए थे। इस दुखद घटना से ठीक एक दिन पहले बिहार राज्य के ऐतिहासिक शहर अज़ीमाबाद (पटना) में एक कहकशां जैसी शख्सियत ने आंखें खोलीं, जिसका नाम सनोबर कहकशां रखा गया। शाह आलम खान और शकीलुन्निसा खानम की लाडली कहकशां आज वैशाली के महनार स्थित ‘उत्क्रमित मध्य विद्यालय’ (मुरौवतपुर) में अध्यापन की जिम्मेदारी निभा रही हैं। उन्हें इस स्कूल में स्थायी नौकरी 2 फरवरी 2022 को मिली, लेकिन अध्यापन से उनका संबंध 7 साल की उम्र से जुड़ा हुआ है। मां शकीलुन्निसा की शिक्षा-दीक्षा और कहकशां की बुद्धिमत्ता का ही असर था कि उन्होंने 6 साल की उम्र में कुरआन भी पूरा कर लिया और उर्दू क़ायदा भी पढ़ लिया। फिर पढ़ने-पढ़ाने का ऐसा सिलसिला शुरू हुआ जो अब तक जारी है।
सनोबर कहकशां वैसे तो स्कूल में हिंदी की शिक्षिका हैं, लेकिन गणित और उर्दू के साथ-साथ जरूरत पड़ने पर अन्य विषयों की कक्षाएं भी लेती हैं। खास बात यह है कि उनका संबंध उर्दू भाषा से बचपन में जो जुड़ा, वह आज तक नहीं टूटा। यही वजह है कि वह उर्दू भाषा ही नहीं, उर्दू भाषा की सेवा करने वालों को भी बहुत सम्मान की नजर से देखती हैं। व्यस्तताओं के कारण उनकी कोई रचनात्मक कृति सामने नहीं आई, लेकिन समय मिलने पर वह उर्दू की किताबें पढ़ती रहती हैं। स्कूल में भी जब उन्हें उर्दू पढ़ाने का अवसर मिलता है, तो वे एक अलग जोश और उत्साह से भर जाती हैं। उनकी शैक्षणिक यात्रा पर नज़र डालें तो मैट्रिक 2000 में (मॉडर्न हाई स्कूल, दरियापुर, पटना), इंटरमीडिएट 2002 में (इंटर प्रेसिडेंसी कॉलेज, न्यू अज़ीमाबाद कॉलोनी, पटना) और बीए 2007 में (आरपीएस कॉलेज, महनार) पूरा किया। 2017 में कहकशां ने बीएड (बिहार कॉलेज ऑफ टीचर एजुकेशन, राजा बाजार, पटना) की डिग्री प्राप्त की, जिसके 5 साल बाद सरकारी स्कूल में स्थायी नौकरी प्राप्त कर ली।
——————————————————————
‘उत्क्रमित मध्य विद्यालय, मुरौवतपुर, महनार’ की स्थापना कब हुई, और इस स्कूल की विशेषताएं क्या हैं?
ऐतिहासिक जिला वैशाली के महनार में स्थित ‘उत्क्रमित मध्य विद्यालय, मुरौवतपुर’ की स्थापना 1960 में हुई। इस स्कूल के लिए गांव के एक बुजुर्ग हाजी नत्थे खां ने अपनी 8 कट्ठा निजी ज़मीन दान की थी। इसकी आधी ज़मीन में स्कूल और आधी में दुर्गा मंदिर है। मंदिर की वजह से यह स्कूल ‘दुर्गा मंदिर स्कूल’ के नाम से भी जाना जाता है।
स्कूल की शुरुआत 2 कमरों से हुई थी और कक्षा 1 से कक्षा 4 तक की शिक्षा दी जाती थी। फिर पांचवीं कक्षा तक और 2004 में आठवीं कक्षा तक पढ़ाई होने लगी। वैसे तो स्कूल ‘प्लस 2’ तक अपग्रेड हो चुका है, लेकिन इसके प्रभारी प्रिंसिपल और प्रबंधन अलग हैं। भवन एक ही है, जहां आधे हिस्से में कक्षा 1 से 8 तक और आधे हिस्से में 9 से 12 तक की कक्षाएं चलती हैं।
मेरी नियुक्ति इस स्कूल में कक्षा 6 से 8 के लिए हिंदी शिक्षिका के रूप में हुई, हालांकि गणित और उर्दू की कक्षाएं भी लेती रही हूं। यहां कक्षा 1 से 8 तक कुल मिलाकर लगभग 1000 बच्चे अध्ययनरत हैं और लगभग 18 शिक्षक अध्यापन का कार्य कर रहे हैं। स्थानीय लोग अपने बच्चों का नामांकन इस स्कूल में कराना पसंद करते हैं, क्योंकि पहली से बारहवीं तक उन्हें किसी दूसरे स्कूल में जाने की जरूरत नहीं पड़ती।
कुछ महीने पहले तक स्कूल की प्रिंसिपल आशा सिन्हा थीं, जिनके नेतृत्व में एक सुखद शैक्षणिक वातावरण बना। वर्तमान प्रिंसिपल जुल्फिकार अहमद अंसारी भी एक सिद्धांतवादी और स्नेही व्यक्तित्व के धनी हैं। उन्होंने स्कूल के वातावरण को शैक्षणिक और प्रशिक्षण दोनों दृष्टि से आदर्श बना दिया है। उनकी अनुपस्थिति में गुलाम हसनैन सर महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां निभाते हैं, जो बेहद अनुभवी व्यक्ति हैं।
आपको अध्यापन के क्षेत्र में आने की प्रेरणा कैसे मिली और अब तक का अनुभव कैसा रहा?
बचपन से ही मुझे पढ़ाने का बहुत शौक रहा, खासकर उर्दू भाषा से अत्यधिक प्रेम रहा है। मेरी उम्र लगभग 7 साल रही होगी, तब से मैं उर्दू पढ़ा रही हूं। दरअसल मेरे ननिहाल में मामू जान (शौकत हयात खान) के पास कुछ बच्चे ट्यूशन पढ़ने आते थे। वे सभी अंग्रेजी माध्यम के बच्चे थे, इसलिए उनकी उर्दू कमज़ोर थी। चूंकि मेरी अम्मी ने मुझे 6 साल की उम्र में ही कुरआन पाक और उर्दू कायदा पूरा करवा दिया था, इसलिए मुझे उर्दू पढ़ने और पढ़ाने में कोई दिक्कत नहीं होती थी। उर्दू पर मेरी पकड़ देखकर मामू जान बहुत खुश होते थे और मुझे बच्चों को ट्यूशन पढ़ाने के लिए कहते थे। वहीं से अध्यापन के प्रति मेरा रुझान बढ़ा और फिर मैं अपने छोटे भाई-बहनों के साथ-साथ पड़ोस के बच्चों को भी पढ़ाने लगी। अध्यापन का यह सिलसिला इस तरह आगे बढ़ा कि आज मैं सरकारी स्कूल में शिक्षिका हूं। स्थायी नौकरी से पहले मैंने पटना के दो निजी स्कूलों में लगभग 6 वर्षों तक अध्यापन किया।
समय के साथ अध्यापन में मेरी रुचि इसलिए भी बढ़ती गई क्योंकि मुझे अक्सर कुछ नया सीखने को मिलता था। नई पुस्तकें और नई जानकारियां मुझे और सीखने के लिए प्रेरित करती रहीं। इस तरह मैंने हमेशा महसूस किया कि एक शिक्षक भी छात्र ही होता है। पाठ्यक्रम बदलता है, तकनीक बदलती है और इनके साथ शिक्षक को भी स्वयं को अपडेट करना पड़ता है।
मेरी खुशकिस्मती है कि मुझे स्कूलों में अच्छे सहकर्मी मिले। वर्तमान में मेरे सहकर्मी शिक्षक उस्ताद गयासुद्दीन अहमद एक बेहद ईमानदार और मेहनती व्यक्ति हैं, जो उर्दू भाषा पर अच्छी पकड़ रखते हैं। अंग्रेजी शिक्षिका गीता सिन्हा खुशमिजाज व्यक्तित्व की धनी हैं, जो हमेशा वातावरण को आनंदमय बना देती हैं। इसी तरह सामाजिक विज्ञान की शिक्षिका कल्याणी सिन्हा सरल और सहयोगी स्वभाव की हैं। विज्ञान के शिक्षक राम बाबू रजक नियमों पर विशेष ध्यान देते हैं और सहकर्मियों को भी इसके प्रति जागरूक करते रहते हैं। अन्य शिक्षक भी अपनी जिम्मेदारियां ईमानदारी से निभाते हैं और अच्छे आचरण के धनी हैं।
प्राथमिक व मध्य विद्यालय के बच्चों को पढ़ाते समय सबसे बड़ी चुनौती क्या होती है?
प्राथमिक व मध्य विद्यालय के बच्चों को पढ़ाते समय शिक्षकों के सामने कई चुनौतियां होती हैं। इस उम्र के बच्चों को पढ़ाने के लिए ज्ञान से अधिक धैर्य व समझ की जरूरत होती है। उन्हें 40 मिनट तक एक जगह बैठाए रखना और उनकी रुचि बनाए रखना कठिन होता है। यदि पाठ रोचक न हो तो बच्चे जल्दी ऊब जाते हैं। इसके अलावा एक ही कक्षा में अलग-अलग स्तर के बच्चे होते हैं… कुछ जल्दी सीखते हैं, जबकि कुछ को बार-बार समझाने की जरूरत होती है।
कक्षा में अनुशासन बनाए रखते हुए मित्रतापूर्ण वातावरण बनाना भी चुनौतीपूर्ण होता है। इस उम्र में बच्चे अपनी पहचान बनाने की कोशिश करते हैं, जिससे कभी-कभी वे विरोधी व्यवहार दिखाते हैं। आज के समय में मोबाइल और इंटरनेट का प्रभाव भी बहुत है। बच्चों को स्क्रीन से हटाकर किताब की ओर आकर्षित करना और लिखने के लिए प्रेरित करना कठिन है। प्राथमिक व मध्य कक्षाओं में पढ़ाने वाले शिक्षकों के लिए बच्चों में सीखने की रुचि विकसित करना और उनके चरित्र निर्माण पर ध्यान देना भी जरूरी होता है। हमारे स्कूल में अधिकतर बच्चे अशिक्षित परिवारों से आते हैं, इसलिए अभिभावकों का सहयोग भी बहुत कम मिलता है।
स्कूल में उर्दू शिक्षा का वातावरण कैसा है? बच्चों में अन्य विषयों की तुलना में उर्दू के प्रति कैसा रुझान है?
सभी सरकारी स्कूलों की तरह यहां भी उर्दू के विकास के लिए एक व्यवस्थित ढांचा है। उर्दू को दूसरी भाषा के रूप में पढ़ाया जाता है और सरकार द्वारा उपलब्ध कराई गई उर्दू की पाठ्यपुस्तकें यहां मौजूद हैं। ये पुस्तकें आधुनिक शैक्षणिक आवश्यकताओं के अनुसार तैयार की गई हैं। उल्लेखनीय बात यह है कि हमारे स्कूल में उर्दू शिक्षा केवल पुस्तकों तक सीमित नहीं है। राष्ट्रीय पर्वों और अन्य अवसरों पर उर्दू कविताएं, भाषण, शायरी आदि के माध्यम से बच्चों में रुचि बढ़ाई जाती है।
वास्तव में अन्य विषयों की तरह ही बच्चों में उर्दू सीखने का भी रुझान है। यहां तक कि संस्कृत पढ़ने वाले कई बच्चे भी उर्दू सीखने में रुचि दिखाते हैं। हमारे स्कूल के बच्चे घरों में स्थानीय बोलियां बोलते हैं, इसलिए उन्हें ‘पुस्तकीय उर्दू’ समझने में थोड़ी कठिनाई होती है। ऐसे में जरूरी होता है कि उर्दू पढ़ाते समय उसे स्थानीय भाषा से जोड़ा जाए ताकि बच्चों को समझने में आसानी हो।
अभिभावकों और शिक्षकों के बीच संपर्क कितना महत्वपूर्ण है, और आप इसे कैसे बनाए रखती हैं?
शैक्षणिक यात्रा में शिक्षक और अभिभावक का संबंध एक त्रिकोण की तरह होता है, जिसका तीसरा कोण छात्र होता है। जब दोनों एक ही दिशा में काम करते हैं तो बच्चे के शैक्षणिक और नैतिक विकास में आने वाली बाधाएं जल्दी दूर होती हैं। शिक्षक और अभिभावक के बीच संपर्क इसलिए भी जरूरी है क्योंकि शिक्षक बच्चे की पढ़ाई को देखता है, जबकि अभिभावक उसके घर के व्यवहार से परिचित होते हैं। दोनों के संवाद से बच्चे का समग्र विकास संभव होता है। यदि बच्चा किसी मानसिक दबाव या शैक्षणिक कमजोरी से जूझ रहा हो तो समय पर संवाद मददगार साबित होता है।
एक सक्रिय शिक्षक विभिन्न तरीकों से अभिभावकों को शिक्षण प्रक्रिया का हिस्सा बनाता है। मैं भी इसी प्रकार नियमित अभिभावक-शिक्षक बैठक (पीटीएम) आयोजित करती हूं और हर शनिवार किसी न किसी अभिभावक से मिलती हूं, जिसमें बच्चे की प्रगति और कमियों पर चर्चा होती है।
मैं अभिभावकों से संपर्क के लिए आधुनिक माध्यमों का उपयोग करती हूं। सत्र की शुरुआत से ही अभिभावकों के नंबर अपने मोबाइल में सहेजती हूं और उन्हें व्हाट्सऐप समूह से जोड़ती हूं। इस समूह के माध्यम से स्कूल की गतिविधियों की जानकारी साझा करती हूं। यदि कोई बच्चा अच्छा कार्य करता है तो उसके अभिभावकों को संदेश भेजकर उसकी सराहना करती हूं। साथ ही अभिभावकों के सुझावों को भी महत्व देती हूं। सच तो यह है कि एक सफल शिक्षक वही है जो अभिभावकों को अपना सहयोगी समझे, न कि आलोचक। जब दोनों पक्ष एक-दूसरे का सम्मान करते हैं और निरंतर संपर्क में रहते हैं तो इसका सीधा लाभ छात्र को मिलता है।
Google न्यूज़, नवजीवन फेसबुक पेज और नवजीवन ट्विटर हैंडल पर जुड़ें
प्रिय पाठकों हमारे टेलीग्राम (Telegram) चैनल से जुड़िए और पल-पल की ताज़ा खबरें पाइए, यहां क्लिक करें @navjivanindia