सूरमा भोपाली: जब भीड़ में खड़े होकर ताली बजाने के सिर्फ 3 रुपए मिले थे जगदीप को

फिल्म शोले में सूरमा भोपाली के किरदार से मशहूर दिग्गज कामेडियन जगदीप का बुधवार को निधन हो गया। वह 81 वर्ष के थे। जगदीप ने 1951 में अफसाना फिल्म से अभिनय शुरू किया था। जगदीप ने करीब 400 फिल्मों में काम किया।

फोटो : आईएएनएस
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इकबाल रिजवी

हंसाते हंसाते वो चुप हो गए और ऐसे चुप हुए कि हमेशा के लिये खामोश हो गए। सूरमा भोपली के तौर पर बरसों याद किये जाने वाले जगदीप भी इस तरह चले जाएंगे किसने सोचा था। सूरमा भोपाली की कितनी यादें हैं जो दिमाग़ में कौंध उठती हैं। वे हिंदी सिनेमा के शायद इकलौते ऐसे कलाकार थे जिसने बाल कलाकार की हैसियत से करियर शुरू किया, फिर वे रोमांटिंक हीरो बने, विलेन के किरदार निभाए और कमेडियन की हैसियत से बरसों कहकहे लगवाते रहे।

जगदीप के पिता मध्य प्रदेश की दतिया रियासत में बैरिस्टर थे। अचानक उनकी मौत हो गयी। उसी समय देश का विभाजन हुआ और जगदीप का परिवार बिखर गया। कई सदस्य पाकिस्तान चले गए। आठ साल के जगदीप को लेकर उनकी मां मुंबई चली गयीं जहां जगदीप के बड़े भाई रहते थे, लेकिन बड़े भाई के घर जगदीप और उनकी मां को सहारा नहीं मिल सका। वो दोनोx जेजे अस्पताल के सामने वाले फुटपाथ पर रहने लगे। मां ने इधर-उधर खाना पकाने का काम किया और जगदीप निकल पड़े सड़क पर। उन्होंने साबुन, कंघे और पतंगे बेचना शुरू कर दीं।

अपना सामान बेचते बेचते एक दिन वे यश चोपड़ा की फ़िल्म अफ़साना की शूटिंग देखने पहुंचे। फ़िल्म के एक दृश्य में एक नाटक दिखाया जाना था, जिसमें एक बच्चा बीच में खड़ा हो कर एक डायलाग बोलता है और दूसरे बच्चे ताली बजाते हैं। ताली बजाने वाले बच्चों की भीड़ इकट्ठा करने वाले आर्टिस्ट सप्लायर ने जगदीप का भी ताली बजाने वाले बच्चे के लिये चयन कर लिया। इसके लिये उन्हें तीन रूपए मिलने थे। लेकिन जिस बच्चे को डायलाग बोलना था वह डायलाग अदा नहीं कर पा रहा था। तब जगदीप ने वह डायलाग बोल कर दिखाया, और वह रोल जगदीप को मिल गया इसके लिये उन्हें 6 रूपए दिये गए। इस तरह फ़िल्मों में जगदीप की शुरूआत हो गयी।

फिर जगदीप को जैसे भी रोल मिलते गए वो करते गए क्योंकि उन्हें पैसों की ज़रूरत रहती थी। साल 1957 जगदीप की ज़िंदगी का यादगार साल था। उस साल सर्वश्रेष्ठ बाल फिल्म के पुरस्कार के लिए तीन फिल्मों का चयन हुआ मुन्ना, अब दिल्ली दूर नहीं और हम पंछी एक डाल के और इन तीनों फिल्मों में जगदीप ने काम किया था। फिर हम पंछी एक डाल के लिये उन्हें सर्वश्रेष्ठ बाल कलाकार का पुरस्कार मिला। 17 साल की उम्र में उन्हें नन्दा के साथ फिल्म भाभी में रोमांटिक रोल निभाया। इस फिल्म में उस दौर का चर्चित का गीत “ चली चली रे पतंग मेरी चली रे” जगदीप पर ही फिल्माया गया था। बरखा, नूरमहल और पुनर्मिलन जैसी फिल्मों में भी जगदीप ने रोमांटिक रोल किये।

इतना सब होने पर भी जगदीप ने अपने रोल को लेकर सपना नहीं पाला, क्योंकि उन्हें घर चलाना था। जो मिल गया उसी को मुकद्दर समझ लिया की तर्ज पर जगदीप का सफर आगे बढ़ता रहा। फिर विमल राय ने जगदीप के करियर की दिशा बदल दी। उन्होंने जगदीप से फिल्म दो बीघा में हास्य किरदार अदा करवाया। इस रोल से उन्हें कमेडियन के रूप में पहचान मिलनी शुरू हो गयी। उस दौर में जॉनी वॉकर, आग़ा, गोप और महमूद जैसे श्रेष्ठ हास्य कलकारों के बीच लोगों ने जगदीप की कॉमेडी को खूब सराहा। बचपन में मिली दर दर की ठोकरों, अभावों और अपने से मिले अपमान ने उनके अंदर जो दर्द भर दिया वो जिंदगी भर हंसी के जरिये बाहर निकलता रहा।

करियर के उतार चढ़ाव के बीच ही साल 1975 आया। फिल्म शोले रिलीज़ हुई। परदे पर गब्बर सिंह के बाद सबसे अधिक चर्चित किरदार रहा सूरमा भोपाली का। यह जगदीप के करियर का सर्वश्रेष्ठ रोल था। होना तो यह चाहिये था कि जगदीप को और शानदार रोल मिलते लेकिन हिंदी सिनमा के लिए वह समय ही बड़ा अजीब था। फिल्मों में हिंसा और अशलीलता बढ़ती जा रही थी। साहित्य से सरोकार रखने वाले और फूहड़ता और अच्छे हास्य की समझ रखने वाले निर्देशक और लेखक कम होते जा रहे थे। फिर ऐसा समय भी आया कि जगदीप की लोकप्रियता को भुनाने के लिए उन्हें फिल्मों में तो रख लिया जाता लेकिन उनके लिये कोई अच्छा रोल नहीं होता था कुछ समय तो वे खुद अपने रोल की काट छांट कर उसे सलीके का बनाने का काम करते रहे लेकिन वे लेखक नहीं थे।

इन हालात से जगदीप ऊब गए। निर्देशक उनसे कहते थे अरे तुम पर्दे पर अपने स्टाइल में कुछ भी बोल दो चलेगा। अपना स्टाइल यानी सूरमा भोपाली के लहजे को दोहराते दोहराते जगदीप थक गए, तो उन्होंने एक फिल्म बना डाली जिसका नाम था सूरमा भोपाली। फिल्म नहीं चली। इससे पहले भी उन्होंने एक गंभीर विषय पर फिल्म “टाट का पर्दा” शुरू की थी जिसका एक गीत रिकार्ड भी हो गया था लेकिन उनके हमदर्दों ने उन्हें राय दी कि ऐसे विषय पर इस दौर में फिल्म नहीं चलेगी। इसके बाद जगदीप ने फिल्म बनाने के नाम से ही तौबा कर ली।

नब्बे के दश्क में जगदीप धीरे धीरे सीन से बाहर होने लगे। उन्होंने टीवी धारावाहिकों में भी हाथ आजमाया लेकिन उन्हें सूरमा भोपाली की छाया से बाहर निकालने वाला लेखक और निर्देशक नहीं मिल सका। और सितम ये देखिये कि इलियास हुसैन जाफरी उर्फ जगदीप को सूरमा भोपाली के रूप में ही याद किया जाता है।

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