जॉनी वॉकर: जिनके पर्दे पर आते ही आने लगती थी हर किसी को हंसी

फिल्मों में जॉनी वॉकर मीठी फुहार की तरह दर्शकों को तब राहत देने आते थे, जब दर्शकों को फ़िल्म की गंभीरता से उबरना मुश्किल लगने लगता था। जॉनी वाकर की हर फिल्म में एक या दो गीत उन पर अवश्य फिल्माए जाते थे ,जो काफी लोकप्रिय भी हुआ करते थे।

फोटो सौजन्य : इकबाल रिज़वी
फोटो सौजन्य : इकबाल रिज़वी

इकबाल रिजवी

उनका चेहरा देखते ही हंसी आने लगती थी उनकी हंसाने की अदा इतनी असरदार थी कि वे कॉमेडियन से हीरो बन गए। पर बदरूद्दीन जमालुद्दीन काजी उर्फ जॉनी वॉकर को पता था कि वे हंसाने के लिये ही जन्मे हैं, इसलिये हीरो बनने के बावजूद वे हास्य अभिनय करते रहे।

जानी वॉकर का जन्म इंदौर में 11 नवंबर 1920 को एक मध्यम वर्गीय परिवार में हुआ था। बचपन आम बच्चों की तरह शरारतें करते गुज़रा। लेकिन, इस बच्चे में एक ख़ास आदत थी लोगों की नकल उतारना। बड़ी बहन मुम्ताज़ बेगम के निकाह के समय तो उन्होंने कुछ देर के लिये सबको आतंकित कर दिया। वे एक पठान की वेशभूषा में आए और आवाज़ बदल कर चीखने लगे कि ये निकाह नहीं हो सकता जब तक मेरे उधार लिये पैसे सूद समेत अदा नहीं किए जाते, तब तक निकाह नहीं होने दूंगा। बाद में उनका राज़ खुलने पर वे अब्बा के हाथों लगभग पिटने के करीब पहुंच गए, लेकिन हंसी के मारे बेहाल रिश्तेदारों ने उन्हें अब्बा के कहर से बचा लिया।

जॉनी वाकर के पिता जिस कपड़ा मिल में काम करते थे, वह बंद हो गयी। इसके बाद रोजगार की तलाश में उन्हें बड़ौदरा होते हुए मुंबई आना पड़ा। वे चाहते थे कि घर का खर्च चलाने के लिये जॉनी कोई काम करे. जानी वाकर ने छोटे मोटे सामान ले कर फेरी लगाना शुरू कर दी । वे जहां-तहां भटकते थे और यही भटकना उनके लिए सबसे बड़ा इंस्टीट्यूट ऑफ़ एक्टिंग साबित हुआ। किसी अलग तरह के करेक्टर को देखते ही उसकी बारीक स्टडी शुरू कर देना जॉनी के मिज़ाज का हिस्सा बन चुका था। तरह-तरह का माल बेचने के दौरान इतनी तरह के करेक्टर मिलते थे कि उनके अनुभव का ख़जाना बढ़ता ही गया।

कई तरह के काम करने के बाद उन्हें बस कंडक्टर की नौकरी मिल गयी। फिल्मों में काम करने की ज़बरदस्त इच्छा रखने वाले जॉनी को नौकरी पा कर सबसे अधिक खुशी इस बात की हुई कि इस तरह उन्हें मुम्बई के रास्ते समझ में आ जाएंगे और ये पता चल जाएगा कि कौन स्टूडियो कहां है। फिर जॉनी ने छुट्टी के वक्त स्टूडियो के चक्कर लगाने शुरू कर दिये। उन्हें कुछ फिल्मों में एक्स्ट्रा का काम भी मिला। जॉनी वाकर का कंडक्टरी करने का अंदाज निराला था, वे सवारियों का जमकर मनोरंजन करते थे।

एक बार बलराज साहनी ने उसी बस में सवार हुए जिसमें जॉनी वाकर कंक्टर थे। वे जॉनी के बात चीत करने के अनोखे अंदाज से काफी प्रभावित हुए। बलराज सहानी के बताए तरीके पर चल कर जॉनी वॉकर को गुरुदत्त की फिल्म बाज़ी मिल गयी। 1951 में आई 'बाजी' के बाद जॉनी वॉकर बतौर हास्य कलाकार अपनी पहचान बनाने में कामयाब रहे। जॉनी वॉकर ने इसके बाद गुरूदत्त की कई फिल्मों मे काम किया। इनमेंं 'आरपार', 'मिस्टर एंड मिसेज 55', 'प्यासा', 'चौदहवी का चांद', 'कागज के फूल' जैसी सुपर हिट फिल्में शामिल है। जॉनी वाकर को उनका नाम गुरू दत्त ने ही दिया था।

फिल्मों में जॉनी वॉकर मीठी फुहार की तरह दर्शकों को तब राहत देने आते थे, जब दर्शकों को फ़िल्म की गंभीरता से उबरना मुश्किल लगने लगता था। जॉनी वाकर की हर फिल्म में एक या दो गीत उन पर अवश्य फिल्माए जाते थे ,जो काफी लोकप्रिय भी हुआ करते थे।

1956 में रिलीज़ हुई गुरूदत्त की फिल्म सीआईडी में उन पर फिल्माया गाना' ऐ दिल है मुश्किल जीना यहां, जरा हट के जरा बच के ये है बंबई मेरी जान' ने धूम मचा दी। उन्होंने अपने चेहरे के हाव भाव की बदौलत ही 'जाने कहां मेरा जिगर गया जी' (मिस्टर एंड मिसेज 55), 'सिर जो तेरा चकराए या दिल डूबा जाए' (प्यासा) और 'ऐ दिल है मुश्किल जीना यहां' जैसे गीतों को सदा के लिए अमर कर दिया।

जॉनी वॉकर पहले हास्य कलाकार थे जिनके नाम पर नटराज प्रोडक्शन ने सन 1957 में “जॉनी वॉकर ” नाम की फिल्म बनाई। फिल्म की सफलता से उत्साहित निर्देशक वेद मदान ने अपनी अगली फिल्म “मिस्टर कार्टून एम” में भी जॉनी वॉकर को शीर्ष भूमिका के लिए चुना। “मिस्टर जॉन ”, “नया पैसा ” “जरा बच के ” “रिक्शा वाला” “उड़न छू” आदि फिल्मो में भी उन्होंने मुख्य भूमिका निभाई थी.

उन्हें फिल्म मधुमति के लिए सर्वश्रेष्ठ सहायक अभिनेता का फ़िल्मफ़ेयर पुरस्कार और फिल्म शिकार के लिए सर्वश्रेष्ठ हास्य अभिनेता का फ़िल्मफ़ेयर पुरस्कार मिला। उन्होंने कई फिल्में भी बनाईं और फिल्म 'पहुंचे हुए लोग' का निर्देशन किया। उन्होंने 35 वर्षों में करीब ३२५ फिल्मो में काम किया, लेकिन 70 का दशक आते-आते कॉमेडी के स्तर में गिरावट आने लगी थी, जिसके बाद जॉनी वॉकर ने फिल्मों मे काम करना काफी कम कर दिया। गुलज़ार और कमल हासन के बहुत जोर देने पर साल 1998 में रिलीज फिल्म चाची 420 में उन्होंने एक छोटा सा भावनात्मक रेल निभाया था।

1955 'आर पार' की शूटिंग के दौरान जॉनी वाकर की मुलाकात नायिका शकीला की छोटी बहन नूरजहां से हुई, जिसका एक गीत नूरजहाँ और वाकर पर फिल्माया जाना था। यह मुलाकात पहले मोहब्बत और फिर निकाह में बदल गई। जॉनी वाकर और नूर छह बच्चों के मां बाप बने। सारी ज़िंदगी लोगों को हंसाने वाले जॉनी वाकर का 29 जुलाई 2003 को निधन हो गया।

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