शौकिया नृत्य करने वाली कुमकुम मुंबई घूमने आई थीं कुमकुम मां के साथ...

एक डासंर के रूप में फिल्मी कैरियर शुरू किया था कुमकुम ने फिर अभिनय का सिक्का भी जमाया, सह नायिका बनी, नायिका बनी और चरित्र नायिका बनी। लेकिन अब सिर्फ उनकी यादें रह गयी हैं। मुंबई में मंगलवार को उनका निधन हो गया।

फोटो : सोशल मीडिया
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इकबाल रिजवी

तेरा जलवा जिसने देखा वो तेरा हो गया (उजाला), रेश्मी शलवार कुर्ता जाली का (नया दौर) मधुबन में राधिका नाचे रे (कोहिनूर) और मेरा नाम है चमली मैं मालन अलबेली (राजा और रंक) जैसे जिन गीतों पर कुमकुम ने नृत्य किया वो इतने लोकप्रिय हुए कि आज भी याद किये जाते हैं।

पटना के पास हुसैनाबाद में 22 अप्रैल 1934 को जन्मी कुमकुम का नाम ज़ेबुन्निसा था। वे थीं तो ज़मींदार मंजूर हसन खां की बेटी लेकिन ज़मींदारी खत्म होने के बाद घर की सारी रईसी पानी की तरह बह गयी। पिता ने हालात बेहतर बनाने के लिए कोलकाता पहुंचे फिर बनारस और लखनऊ का सफर तय किया। कोलकाता में कुमकुम के पिता ने कुछ समय बाद दूसरी शादी की और पाकिस्तान चले गए। कुमकुम और उनकी छोटी बहन को लेकर मां पहले बनारस फिर लखनऊ में आ गयीं।"

इस अफरा तफरी में कुमकुम की स्कूली शिक्षा ना के बराबर हुई। लेकिन मां ने घर पर ही उन्हें हिंदी और उर्दू की तालीम दी। घर में रोडियो बजा कर गानों पर शौकिया डांस करने वाली कुमकुम को लेकर मां नृत्य गुरू लच्छू महाराज के पास गयीं और कुमकुम ने एक साल तक जी तोड़ मेहनत कर नृत्य सीखा। फिर उन्होंने गुरू के साथ कई बार मंचों पर अपनी प्रतिभा का प्रदर्शन किया।

महज़ 17 साल की उम्र में कुमकुम मां के सात मुंबई घूमने पहुंची। नौशाद उनके परिवार के परिचित थे उनके ही माध्यम से एक दिन निर्देशक शाहिद लतीफ से मुलाकात हो गयी जो उन दिनो फिल्म शीशा (1952) बना रहे थे। उन्हें कुमकुम की नृत्य प्रतिभा का पता चला तो कुमकुम से अपनी फिल्म में एक डांस करवाया। कुमकुम को उनके डांस के लिये सबने सराहा। इस फिल्म में ज़ेबुन्निसा नामकी एक अभिनेत्री काम कर रही थीं इसलिये किशोरी ज़ेबुन्निसा का नाम कुमकुम रख दिया गया।

उस दौर में ज्यादातर अभिनेत्रियां अच्छी नर्तकी नहीं हुआ करती थीं। वैजयंती माला,आशा पारेख और हेमामालिनी जैसी नृत्य में पारंगत अभिनेत्रियों का जमाना नहीं आया था। उस दौर में फिल्मों में सहायक भूमिका में कोई न कोई नर्तकी जरूर रखी जाती थी। शीशा रिलीज़ होने से पहले ही कुमकुम के पास फिल्मों के प्रस्ताव आने लगे। मां ने निर्णय लिया कि लखनऊ वापस लौटने से ज्यादा समझदारी इसमें है कि कुमकुम फिल्मों को कैरियर बनाए। उन्होंने कभी सोचा भी नहीं था कि इतनी आसानी से वो सब कुछ होने लगेगा जिसके बारे में उन्होंने सपने में भी नहीं सोचा था।

इसके बाद कुमकुम ने आंसू, अमर कथा, गवइया जैसी कुछ फिल्मों में नृत्य किया। लेकिन 1954 में आयी फिल्म आर पार में गुरू दत्त ने पता नहीं क्या सोच कर कुमकुम को पांच बच्चों की मां का रोल दे दिया। अब कुमकुम की अभिनेत्री के रूप में भी पहचान बनने लगी। इसी साल सुरैया और भारत भूषण की फिल्म मिर्ज़ा गालिब में उन्हें नृत्य का मौका मिला। फिल्म बहुत लोकप्रिय हुई। 1955 में कुमकुम के नृत्य और अभिनय वाली 13 फिल्में रिलीज़ हुईं। अगले साल वे शम्मी कपूर की मेम साहब में सहायक नायिका बनी। 1957 में वे भारतीय पिल्म इतिहास की महान फिल्म मदर इंडिया का हिस्सा बनीं। फिर वे मुख्य रूप से सह नायिका के रोल में फिल्मों में आने लगीं। दो गुंडे में वे अजित की सहनायिका थीं तो जबसे तुम्हें देखा है में वे शशिकपूर के साथ थी। महबूब खान की फिल्म सन ऑफ इंडिया में कुमकुम नायिका बनी। फिल्म करोड़पति में वे शशिकला के साथ किशोर कुमार की नायिका बनी। किशोर के साथ उनकी बाग़ी शहज़ादा, मि. एक्स इन बॉम्बे, श्रीमान फंटूश, दुनिया नाचेगी, हाय मेरा दिल और गंगा की लहरें जैसी फिल्में आयीं।

हिंदी फिल्मों की दुनिया में जब भोजपुरी फिल्में बनने का दौर शुरू हुआ तो पहली भोजपुरी फिल्म गंगा मैया तोहे पियर चढ़ैबो में नायिका कुमकुम ही बनी। फिर उन्होंने गंगा नाम की भोजपुरी फिल्म में अभिनय भी किया और प्रोड्यूसर भी बनी।

कुमकुम नायिका भी बनी सहायक नायिका भी बनी और नर्तकी तो वे थीं हीं लेकिन उन्होंने खुद को किसी श्रेणी में कैद नहीं होने दिया। वे अपनी सीमाएं जानती थीं। पर्दे पर वे खासी आकर्षक जरूर नज़र आती थीं लेकिन उन्हें एहसास था कि उनकी आंखों, चेहरे या शारीरिक बनावट में कोई असाधारण सुंदरता नहीं है। इसलिये उन्होंने किसी भी तरह के रोल को मना नहीं किया। रामानन्द सागर ने कुमकुम की प्रतिभा पर सबसे अधिक विश्वास किया। उनकी फिल्म गीत, आंखें, ललकार और जलते बदन में कुमकुम ने उनका भरोसा टूटने नहीं दिया। 1970 के आस पास फिल्में रंगीन होने लगी थीं। रंगीन फिल्मों के तेवर और रंग ढंग तेज़ी से बदले। ग्लैमर को प्रमुखता मिलने लगी। 1973 में कुमकुम की दो अंतिम फिल्में आयीं। किरण कुमार के साथ जलते बदन और विनोद खन्ना के साथ धमकी। लेकिन उनकी अंतिम रिलीज़ फिल्म ब्लैक एंड व्हाईट थी। बॉम्बे बाई नाइट नाम की इस फिल्म के हीरो संजीव कुमार थे। फिल्म 1971 में शुरू हुई लेकिन रिलीज़ हुई 1976 में। 1975 में कुमकुम ने सज्जाद अकबर खान से शादी कर हमेशा के लिये फिल्मी दुनिया छोड़ दी।

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