मोदी की कहीं कोई लहर नहीं, मुझसे लिखवा लें, चुनाव में बीजेपी की दुर्गति होगी: लालू प्रसाद यादव

लालू यादव का मानना है कि अयोध्या में राम मंदिर के कारण मोदी-भाजपा के पक्ष में लहर की बात सरासर बकवास है। यह सब बीजेपी और मीडिया का फैलाया गया झूठ है।

आरजेडी प्रमुख लालू प्रसाद यादव
आरजेडी प्रमुख लालू प्रसाद यादव
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नलिन वर्मा

लालू प्रसाद यादव का कहना है कि नेता तो अपनी वफादारी बदल सकते हैं लेकिन 2024 में लोगों के ऐसा करने की कोई संभावना नहीं। यह पूछे जाने पर कि कई नेताओं के ‘इंडिया’ गठबंधन को छोड़कर भाजपाबीजेपी का दामन थामने का क्या असर पड़ने जा रहा है, राष्ट्रीय जनता दल (आरजेडी) नेता ने फौरन कहा, ‘इससे कोई फर्क नहीं पड़ने जा रहा क्योंकि लोग मोदी सरकार से नाराज हैं और वे कहीं भी शिफ्ट नहीं होने जा रहे। नेता इधर-उधर जाते रहते हैं।’

वह कहते हैं कि ‘देश के गरीब अभूतपूर्व महंगाई झेल रहे हैं। उनके मौलिक अधिकारों और उनकी आवाज का गला घोंटा जा रहा है। पिछड़े वर्गों के अलावा गरीबों, युवाओं, दलितों और अल्पसंख्यकों पर अब तक की सबसे भयानक क्रूरता की जा रही है। एक राजनीतिक दल के तौर पर, जब लोग अपने जीवन के सबसे बुरे दौर से गुजर रहे हों, तो उनसे जुड़े मुद्दों को छोड़ना सबसे बड़ा पाप है।’

बिहार में नीतीश कुमार, उत्तर प्रदेश में जयंत चौधरी और महाराष्ट्र में अशोक चव्हाण के बीजेपी के पाले में चले जाने के बाद राजद अध्यक्ष पहली बार इस लेखक से खास तौर पर बात कर रहे थे।

नीतीश कुमार के बीजेपी का दामन थामने, जिसके कारण राज्य में महागठबंधन सरकार गिर गई, पर उन्होंने कहा, ‘वह आदतन भगोड़ा है। अपनी आदत से लाचार है। लोगों ने उसे पहचान लिया है; वे उसे भारी दंड देंगे।’ लालू यादव ने कहा, ‘यह विपक्षी दलों और नेताओं का कर्तव्य है कि जब लोग अत्याचार और उत्पीड़न के सबसे बुरे दौर से गुजर रहे हों, तो उनके मुद्दों के लिए खड़े हों। मैंने सांप्रदायिक और दमनकारी ताकतों के साथ कभी समझौता नहीं किया है और न कभी करूंगा, चाहे वे (बीजेपी) मेरे सामने कितनी भी चुनौती पेश करें।’

'मोदी की लहर बकवास, सिर्फ मीडिया का प्रचार'

अयोध्या के राम मंदिर में प्राण प्रतिष्ठा के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के पक्ष में ‘लहर’ के बारे में पूछे जाने पर आरजेडी प्रमुख ने कहा, ‘सब बकवास है। यह तथाकथित लहर केवल मीडिया में है और मीडिया पर तो उन्होंने (बीजेपी ने) कब्जा कर रखा है। भगवान राम हमारे अस्तित्व के कण-कण में हैं। उनका चुनावी लाभ के लिए राजनीतिक ‘लहर’ और आम सहमति बनाने के लिए निंदनीय तरीके से उपयोग नहीं किया जा सकता है।’

लालू यादव ने कहा, ‘मीडिया ने सार्वजनिक हित के मुद्दों को उठाने और अभूतपूर्व बेरोजगारी, समाज में बढ़ती असमानताओं, सत्ता के दुरुपयोग और लोकतांत्रिक संस्थानों की अधीनता, किसानों और खेत-मजदूरों की तकलीफों, असहमति की आवाज पर नकेल कसे जाने का कोई समाधान निकालने में भूमिका निभाने की अपनी जिम्मेदारी से मुंह मोड़ लिया है और वह भी नफरत फैलाने और समुदायों को बांटने के काम में लगा हुआ है।’ 

उन्होंने देश भर के विपक्षी नेताओं और पार्टियों को चेतावनी दी कि ऐसे समय में जब लोगों ने नरेंद्र मोदी सरकार को हराने का मन बना लिया है, तब बीजेपी के पाले में जाने का उन्हें भारी नुकसान उठाना पड़ेगा। लालू ने साफ कहा, ‘मुझसे लिखवा लो, 2024 के चुनावों में बीजेपी को अब तक की सबसे बड़ी हार का सामना करना पड़ेगा। लोगों में मोदी सरकार के खिलाफ गुस्सा भरा हुआ है। …चुनाव होने दीजिए।’


'बिहार में ‘इंडिया’ मजबूत'

‘बिहार में ‘इंडिया’ पूरी तरह से अच्छी स्थिति में है। असलियत तो यह है कि नीतीश के बीजेपी के साथ जाने ने बिहार में ‘इंडिया’ में नई जान फूंक दी है। हम नीतीश से आजिज आ चुके हैं- वह जिस भी गठबंधन में शामिल होते हैं, उसके लिए चिंता का एक स्थायी स्रोत बन जाते हैं। अब हमारे सामने कांग्रेस और वामपंथी दलों का ही विकल्प बचा है, जिनकी धर्मनिरपेक्षता और सामाजिक न्याय के प्रति प्रतिबद्धता अविभाज्य और अटूट बनी हुई है। मुझे राज्य में बीजेपी के खिलाफ लड़ने के लिए सीट बंटवारे और साझा रणनीति के मामले में कहीं कोई समस्या नहीं दिखती।’

यह याद दिलाने पर कि 2019 में एनडीए ने बिहार की 40 लोकसभा सीटों में से 39 पर जीत हासिल की थी, लालू ने कहा, ‘बार-बार बबूल के नीचे आम नहीं मिलता। इस बार बिहार में बीजेपी और उसके साथी कहीं के नहीं रहेंगे।’ 

आडवाणी की यात्रा से बन गया था भय का माहौल

बिहार के मुख्यमंत्री के रूप में लालू प्रसाद यादव ने 34 साल पहले लाल कृष्ण आडवाणी की रथ यात्रा (जो उन्होंने इसलिए की थी कि जहां बाबरी मस्जिद खड़ी थी, वहां राम मंदिर बनाने के मुद्दे पर जनमत जुटाया जा सके) को रोक दिया था और उन्हें उत्तर प्रदेश में घुसने नहीं देकर हिरासत में ले लिया था। अब जब अयोध्या में उसी जगह पर राम मंदिर बन चुका है और पिछले ही माह उसमें प्राण प्रतिष्ठा भी हुई तो उनके विचार क्या हैं?

लालू ने बड़ी बेबाकी से कहा, ‘रथ यात्रा को राजनीतिक या विचारधारा की वजह से नहीं रोका गया था। इसे इसलिए रोका गया था क्योंकि इस बात के विश्वसनीय इनपुट थे कि इससे बिहार में कानून-व्यवस्था के लिए गंभीर खतरा पैदा हो गया था।’ रथ यात्रा ने अपने पीछे भय, हिंसा और मौत के निशान छोड़े थे और यात्रा को स्थगित करने की उनकी अपील को नजरअंदाज कर दिया गया था। उन्होंने कहा, ‘मेरी सबसे बड़ी चिंता नागरिकों और सार्वजनिक संपत्ति की सुरक्षा थी।’

'मंदिर में नहीं बची है राजनीतिक अपील'

अयोध्या में राम मंदिर को लेकर जिस तरह का राजनीतिक माहौल खड़ा किया जा रहा है, उसका उपहास करते हुए राजद प्रमुख कहते हैं कि उन्हें लोगों का एक बड़ा समुदाय मिलता है जो इस मामले में बढ़ा-चढ़ाकर किए जा रहे  प्रचार-प्रसार और राजनीतिकरण को अच्छी तरह समझता है। वह कहते हैं, ‘कुछ दुखी हैं और कुछ गुस्से में जबकि कुछ श्रद्धालु वास्तव में खुश हैं लेकिन वे सड़कों पर उतरकर नारे नहीं लगा रहे हैं। भाजपा ने सारे प्रयास कर लिए क्योंकि उसे लगा कि इसका राजनीतिक लाभ मिल सकता है।’ फिर वह मुस्कुराते हुए कहते हैं कि मंदिर ने अपनी भावनात्मक और राजनीतिक अपील खो दी है।

दार्शनिक अंदाज में आरजेडी प्रमुख कहते हैं कि उनका यकीन है कि राजनीति और शासन आम लोगों के जीवन को बेहतर बनाने और एक सामंजस्यपूर्ण समाज बनाने के लिए होते हैं। वह कहते हैं, ‘जो लोग हर कीमत पर सत्ता चाहते हैं, वे मतदाताओं का शोषण करने के लिए भावनात्मक मुद्दे पैदा करके चुनाव जीतने के लिए किसी भी हद तक चले जाते हैं। वे आग को बुझाने के बजाय उसमें घी डालते हैं। जब वे लोगों के जीवन में कोई बदलाव लाने में असफल हो जाते हैं, तो अपनी विफलताओं के लिए दूसरों को दोषी ठहराने लगते हैं।’ 

थोड़ा रुककर और मुस्कुराहट के साथ बीजेपी के बारे कहते हैं, ‘यह एक अनोखी पार्टी है जो हमेशा गुस्से में रहती है, हमेशा अनाप-शनाप बोलती है और हमेशा किसी को दोषी ठहराने की फिराक में रहती है।' आज की बीजेपी 1980 की बीजेपी से कितनी अलग है, इस सवाल के जवाब में वह हंसते हुए कहते हैं- शाखा नहीं, पेड़ देखिए। 


वह बताते हैं कि यह आरएसएस ही है जो सारे फैसले लेता है। संघ समय की जरूरत के मुताबिक रणनीति और चेहरों को बदलने में माहिर है लेकिन कुछ चीजें नहीं बदलीं: एक, वंचितों-उत्पीड़ितों की कीमत पर अभिजात वर्ग का आधिपत्य बनाए रखना; दो, समाज और शासन के सभी हिस्सों में- पड़ोस से लेकर उच्चतम सरकारी कार्यालयों तक- लगातार अपना प्रभाव बढ़ाना और अंतत: व्यवसायी वर्ग के साथ मिलकर काम करना- पहले सत्ता में आने के लिए उनसे धन लेना फिर सत्ता में आने पर उन्हें कई गुना वापस करना। 

वह कहते हैं, ‘मैं हमेशा लोगों से संघ के एजेंडे को समझने के लिए गोलवलकर की किताब पढ़ने के लिए कहता हूं। लोग आते रहेंगे, पर संघ का काम चलता रहेगा। यह विपक्ष, नागरिक समाज और लोगों के सामने सबसे बड़ी चुनौती है।’ 

'बीजेपी नैरेटिव से उलट एकजुट है विपक्ष'

जब उनका ध्यान इस ओर दिलाया जाता है कि विपक्ष तो अव्यवस्थित दिख रहा है, तो वह नाराज हो जाते हैं। उनका कहना है कि यह नैरेटिव बीजेपी द्वारा फैलाया गया है और मीडिया ने इसे प्रचारित किया है। वह दृढ़ता से कहते हैं, विपक्ष में कहीं कोई भ्रम नहीं है। वह कहते हैं, ‘हकीकत तो यह है कि बीजेपी के भीतर भ्रम और यहां तक कि डर भी है। अगर उन्हें लोगों के समर्थन का भरोसा होता तो वे विपक्षी नेताओं के पीछे नहीं पड़ते, सिविल सोसाइटी और विश्वविद्यालयों के विरोध प्रदर्शनों को रोकते नहीं और मीडिया पर कड़ा नियंत्रण नहीं बनाए रखते।’ 

विपक्ष का रोडमैप सार्वजनिक संकट का जवाब देना है- बेरोजगारी, महंगाई और सबसे अहम बात, लोगों की गरिमा लूटी जा रही है। बीजेपी लोगों को अपनी जागीर मानती है और उम्मीद करती है कि सरकार करदाताओं के पैसे से जो कुछ भी करती है, उसके लिए वे आभारी हों; वह उम्मीद करती है कि लोगों को ‘मोदी जी के उपहार और मोदी की गारंटी’ के तौर पर जो कुछ भी थोड़ा-बहुत दिया गया है, उससे वे खुश हों। लेकिन लोग नाराज हैं।’

राशन की दुकानों के बाहर कतार में खड़े लोगों से लेकर हवाई यात्रियों तक एक आम धारणा है कि भारत में आम लोगों के पास आज कोई आवाज नहीं है और उनके लिए लड़ने वाला कोई नहीं है। लालू जोर देकर कहते हैं ‘हमारे मुद्दे रोटी, कपड़ा, मकान; बिजली, पानी, सड़क; आमदनी और इज्जत, शिक्षा और स्वास्थ्य थे और रहेंगे। हम बेवजह का एजेंडा नहीं बनाएंगे और भावनात्मक मुद्दे तैयार करके जनता को गुमराह नहीं करेंगे।’ 

लालू मानते हैं कि राहुल गांधी बहुत अच्छा काम कर रहे हैं और इसे कहने में वह हिचकते भी नहीं। वे कहते हैं, ‘वह (राहुल) लोगों तक पहुंच रहे हैं, उनकी पीड़ा और संकट को साझा कर रहे हैं। वह वही कर रहे हैं जो एक जिम्मेदार विपक्षी नेता को करना चाहिए...लोगों को जगाने का काम कर रहे हैं।’


यूपीए शासन के दौरान रेल मंत्री रहते हुए भ्रष्टाचार और ‘नौकरी के बदले जमीन’ सौदे वगैरह के अस्पष्ट और पुराने आरोपों को सीबीआई और ईडी द्वारा उठाए जाने के बावजूद लालू प्रसाद कांग्रेस और गांधी परिवार के समर्थन में दृढ़ता के साथ खड़े रहे हैं। वैसे, यह विडंबना ही है क्योंकि यह वही थे जिन्होंने 1990 में बिहार में कांग्रेस-शासन का दौर खत्म किया था। कांग्रेस नेता के साथ उनके रिश्ते कितने सहज-स्वाभाविक हैं, इस बात का अंदाजा हाल ही में राहुल गांधी द्वारा साझा किए गए एक वीडियो से लगता है जिसमें लालू यादव राहुल को मटन पकाने की बारीकियां समझाते दिख रहे हैं।

लालू के बेटे और बिहार विधानसभा में विपक्ष के नेता तेजस्वी यादव भी इसी परंपरा को आगे बढ़ा रहे हैं। इस माह की शुरुआत में वह ‘भारत जोड़ो न्याय यात्रा’ में न केवल शामिल हुए बल्कि राहुल गांधी जिस जीप में यात्रा कर रहे थे, उसकी स्टेयरिंग भी खुद थामी। 

उन्होंने ऐसा क्यों कहा कि उनके दरवाजे नीतीश कुमार के लिए हमेशा खुले रहेंगे, इसके जवाब में कहते हैं, ‘मैं अमित शाह जैसा नेता नहीं हूं जो कहता कुछ है और करता कुछ और है। शाह ने कहा था कि नीतीश कुमार के लिए भाजपा के दरवाजे हमेशा के लिए बंद हो गए हैं।… मैंने कुछ भी नया नहीं कहा। मैंने अपने पूरे जीवन में सांप्रदायिक ताकतों के खिलाफ लड़ाई लड़ी है और सामाजिक न्याय, शांति तथा सद्भाव के लिए काम करने वाले हर किसी का हमेशा स्वागत किया है।’ 

(नलिन वर्मा वरिष्ठ पत्रकार, लेखक, मीडिया शिक्षक और लोककथाओं के स्वतंत्र शोधकर्ता हैं। इस इंटरव्यू का संक्षिप्त संस्करण सबसे पहले ‘द वायर’ में प्रकाशित हुआ।)

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